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'दशरथ मांझी' से कम नहीं है ये शहीद का पिता
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Thu, 20 Jul 2017 08:53 PM IST
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मंत्री यूनूस खान के साथ शहीद के पिता
- फोटो : अमर उजाला
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दशरथ मांझी का नाम तो आपने सुना ही होगा, जिन्होंने पहाड़ को काटकर अकेले ही गांव के लिए सड़क बना दी थी। यह शख्स भी किसी दशरथ मांझी से कम नहीं है जिसने अपने गांव में सड़क बनाने के लिए दस—बारह साल से अपना संघर्ष जारी रखा और यह सपना सच होने वाला है।
यह शख्स है कन्हैया लाल सिहाग, जो कि बीकानेर के श्रीडूंगरगढ़ तहसील के बिग्गावास रामसर का रहने वाला है। इनके बेटे कैप्टन चंदर चौधरी साल 2002 में जम्मू कश्मीर के नोशेरा सेक्टर में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। इसके बाद से ही बेटे की शहादत से प्रेरणा लेकर शहीद के पिता कन्हैया लाल सिहाग ने गांव तक सड़क लाने के लिए सालों तक संघर्ष किया। दस—बारह साल तक सरकार का दरवाजा खटखटाया, कार्यालयों के चक्कर काटे और अब जाकर यह संघर्ष सफल होने जा रहा है। आज पीडब्ल्यूडी मंत्री यूनूस खान ने 8 किलोमीटर सड़क बनाने के लिए स्वीकृति दे दी है। इस सड़क का उद्घाटन शहीद के जन्मदिन पर ही होगा।
मंत्री खान ने बताया कि राज्य सरकार शहीदों की शहादत और उनके परिवारों के प्रति पूरा सम्मान रखती है और जब उन्होंने देखा की शहीद के पिता गांव के लोगों को पक्की सड़क की सुविधा दिलाने के लिए वृ़द्धावस्था में भी संघर्ष कर रहे हैं तो वे उनके जज्बे से बहुत प्रभावित हुए।
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यह शख्स है कन्हैया लाल सिहाग, जो कि बीकानेर के श्रीडूंगरगढ़ तहसील के बिग्गावास रामसर का रहने वाला है। इनके बेटे कैप्टन चंदर चौधरी साल 2002 में जम्मू कश्मीर के नोशेरा सेक्टर में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। इसके बाद से ही बेटे की शहादत से प्रेरणा लेकर शहीद के पिता कन्हैया लाल सिहाग ने गांव तक सड़क लाने के लिए सालों तक संघर्ष किया। दस—बारह साल तक सरकार का दरवाजा खटखटाया, कार्यालयों के चक्कर काटे और अब जाकर यह संघर्ष सफल होने जा रहा है। आज पीडब्ल्यूडी मंत्री यूनूस खान ने 8 किलोमीटर सड़क बनाने के लिए स्वीकृति दे दी है। इस सड़क का उद्घाटन शहीद के जन्मदिन पर ही होगा।
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मंत्री खान ने बताया कि राज्य सरकार शहीदों की शहादत और उनके परिवारों के प्रति पूरा सम्मान रखती है और जब उन्होंने देखा की शहीद के पिता गांव के लोगों को पक्की सड़क की सुविधा दिलाने के लिए वृ़द्धावस्था में भी संघर्ष कर रहे हैं तो वे उनके जज्बे से बहुत प्रभावित हुए।
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घट गई 50 किमी की दूरी
शहीद कैप्टन चंदर चौधरी
- फोटो : अमर उजाला
बीकानेर जिले की श्रीडूंगरगढ़ तहसील में बिग्गावास रामसरा से अमृतवासी तक 8 किमी. सड़क की स्वीकृति मिलने के बाद शहीद के पिता कन्हैयालाल सिहाग जनसुनवाई के दौरान मंत्री यूनूस खान से उनके निवास पर मिले। सिहाग ने बताया कि इस समय बिग्गावास गांव के लोगों को बीदासर-लाडनूं-नागौर की तरफ जाने के लिए डूंगरगढ़ होकर जाना पड़ता है, जिससे करीब 50 किमी की दूरी ज्यादा तय करनी पड़ती है। यही नहीं, दो घंटे का समय अतिरिक्त भी लगता है।
उन्होंने बताया कि आजादी के इतने साल बाद भी यहां पक्की सड़क नहीं है। इसलिए पिछले 10-12 साल से केन्द्र सरकार और कई मंत्रियों के पास जा-जाकर इस सड़क के लिए मांग कर रहे थे। अब बिग्गावास रामसरा से अमृतवासी तक 8 किलोमीटर की सड़क बन जाने से रास्ता सीधा हो जाएगा और सुजानगढ़-नागौर-लाडनूं दो घंटे पहले पहुंच जाएंगे।
उन्होंने बताया कि आजादी के इतने साल बाद भी यहां पक्की सड़क नहीं है। इसलिए पिछले 10-12 साल से केन्द्र सरकार और कई मंत्रियों के पास जा-जाकर इस सड़क के लिए मांग कर रहे थे। अब बिग्गावास रामसरा से अमृतवासी तक 8 किलोमीटर की सड़क बन जाने से रास्ता सीधा हो जाएगा और सुजानगढ़-नागौर-लाडनूं दो घंटे पहले पहुंच जाएंगे।
कलाम ने भी दिया था सम्मान
मंत्री यूनूस खान के साथ शहीद के पिता
- फोटो : अमर उजाला
शहीद के पिता कन्हैयालाल सिहाग ने बताया कि उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ जब मंत्री यूनूस खान ने जून में उन्हें बुलाकर कहा कि आपकी सड़क स्वीकृत कर रहा हूं और 5 जुलाई को सड़क स्वीकृत कर दी। सिहाग ने बताया कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी उनके बेटे की शहादत को सम्मान देते हुए उनके गांव में विजयंत टैंक रखवाया और आज यह दूसरा बड़ा काम हुआ है जिसमें गांव के लिए आठ किलोमीटर सड़क मिली है।
उधर, मंत्री यूनूस खान का कहना है कि शहीद के पिता ने बिना किसी प्रतिनिधिमण्डल या समूह, बिना किसी जनप्रतिनिधि की सिफारिश, अकेले ही आकर उनसे तीन-चार बार मुलाकात की। इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक निर्माण विभाग के अधिकारियों को मौका देखने भेजा और पाया कि वास्तव में गांव में सड़क जरूरी है। बजट की व्यवस्था होते ही 5 जुलाई को सड़क की स्वीकृति जारी कर दी गई है।
उधर, मंत्री यूनूस खान का कहना है कि शहीद के पिता ने बिना किसी प्रतिनिधिमण्डल या समूह, बिना किसी जनप्रतिनिधि की सिफारिश, अकेले ही आकर उनसे तीन-चार बार मुलाकात की। इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक निर्माण विभाग के अधिकारियों को मौका देखने भेजा और पाया कि वास्तव में गांव में सड़क जरूरी है। बजट की व्यवस्था होते ही 5 जुलाई को सड़क की स्वीकृति जारी कर दी गई है।