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पूर्व केन्द्रीय मंत्री के मामले में जांच बंद करने पर कोर्ट ने मांगा जवाब
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Mon, 28 Aug 2017 07:35 PM IST
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bhanwar jitendra singh
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राजस्थान हाईकोर्ट ने अलवर में कब्रिस्तान और पहाड़ की भूमि के स्वामित्व से जुड़े पूर्व केन्द्रीय मंत्री भंवर जितेन्द्रसिंह के मामले में जांच बंद करने पर राज्य के प्रमुख गृह सचिव और एसीबी के डीजी से जवाब मांगा है।
न्यायाधीश वीके व्यास की एकलपीठ ने यह आदेश अशोक पाठक की ओर से दायर आपराधिक याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए दिए। याचिका में कहा गया कि 1998 में भंवर जितेन्द्रसिंह ने एसडीएम कोर्ट में दावा पेश कर कहा कि उसकी अलवर स्थित जमीन को जमाबंदी में गलती से कब्रिस्तान, गैर मुमकिन रास्ता और पहाड़ के रूप में दर्ज किया गया है। ऐसे में जमाबंदी में संशोधन किया जाए। जिसे 1999 में एसडीएम ने खारिज कर दिया। इस दावे को पुन: सुनने के लिए जितेन्द्रसिंह की ओर से पेश प्रार्थना पत्र को भी एसडीएम ने 65 सुनवाई के बाद 29 जून 2005 को खारिज कर दिया। याचिका में कहा गया कि 28 अक्टूबर 2009 को जितेन्द्रसिंह ने प्रार्थना पत्र पेश कर कहा कि दूसरी बार पेश प्रार्थना पत्र की पत्रावली गायब हो गई है।
ऐसे में उसके वकील के पास मौजूद पत्रावली के आधार पर पुन: सुनवाई की जाए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि तत्कालीन एसडीएम नारायणसिंह से मिलीभगत कर 2005 में प्रार्थना पत्र खारिज होने का तथ्य छिपा लिया गया और सुनवाई 1999 से आगे बढ़ाते हुए 13 जून 2013 को जितेन्द्रसिंह के पक्ष में डिक्री जारी कर दी। याचिका में कहा गया कि इसकी शिकायत एसीबी में करने पर जांच अधिकारी ने दोनों को दोषी मानते हुए जजेज प्रोटेक्शन एक्ट का हवाला देकर मामला एसीबी मुख्यालय भेज दिया। जहां एसीबी के एडीजी ने 5 अगस्त 2016 को प्रकरण बंद करने का निर्णय लिया।
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याचिका में गुहार की गई है कि एसीबी को मामले की जांच के आदेश दिए जाएं और हाईकोर्ट अपनी निगरानी में जांच कराए। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने प्रमुख गृह सचिव और एसीबी डीजी को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
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न्यायाधीश वीके व्यास की एकलपीठ ने यह आदेश अशोक पाठक की ओर से दायर आपराधिक याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए दिए। याचिका में कहा गया कि 1998 में भंवर जितेन्द्रसिंह ने एसडीएम कोर्ट में दावा पेश कर कहा कि उसकी अलवर स्थित जमीन को जमाबंदी में गलती से कब्रिस्तान, गैर मुमकिन रास्ता और पहाड़ के रूप में दर्ज किया गया है। ऐसे में जमाबंदी में संशोधन किया जाए। जिसे 1999 में एसडीएम ने खारिज कर दिया। इस दावे को पुन: सुनने के लिए जितेन्द्रसिंह की ओर से पेश प्रार्थना पत्र को भी एसडीएम ने 65 सुनवाई के बाद 29 जून 2005 को खारिज कर दिया। याचिका में कहा गया कि 28 अक्टूबर 2009 को जितेन्द्रसिंह ने प्रार्थना पत्र पेश कर कहा कि दूसरी बार पेश प्रार्थना पत्र की पत्रावली गायब हो गई है।
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ऐसे में उसके वकील के पास मौजूद पत्रावली के आधार पर पुन: सुनवाई की जाए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि तत्कालीन एसडीएम नारायणसिंह से मिलीभगत कर 2005 में प्रार्थना पत्र खारिज होने का तथ्य छिपा लिया गया और सुनवाई 1999 से आगे बढ़ाते हुए 13 जून 2013 को जितेन्द्रसिंह के पक्ष में डिक्री जारी कर दी। याचिका में कहा गया कि इसकी शिकायत एसीबी में करने पर जांच अधिकारी ने दोनों को दोषी मानते हुए जजेज प्रोटेक्शन एक्ट का हवाला देकर मामला एसीबी मुख्यालय भेज दिया। जहां एसीबी के एडीजी ने 5 अगस्त 2016 को प्रकरण बंद करने का निर्णय लिया।
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याचिका में गुहार की गई है कि एसीबी को मामले की जांच के आदेश दिए जाएं और हाईकोर्ट अपनी निगरानी में जांच कराए। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने प्रमुख गृह सचिव और एसीबी डीजी को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।