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शिक्षा मंत्री ने कहा था न्यूटन ने नहीं दी 'लॉ आॅफ ग्रेविटी' इस प्रोफेसर ने तर्क देते हुए ठहराया सही

Wed, 10 Jan 2018 10:24 AM IST
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर Updated Wed, 10 Jan 2018 10:24 AM IST
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rajasthan jaipur ministers claims about law of gravity backs by this historian
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लॉ आॅफ ग्रेविटी यानी गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत पर एक शिक्षा मंत्री के बयान से जहां उनकी चौतरफा आलोचना हो रही है वहीं एक प्रोफेसर ने शिक्षा मंत्री के बयान को तर्क के साथ पेश किया है। बात की जा रही है राजस्थान के शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी की जहां वो एक बार फिर से विवादों में आ गए हैं। इस बार उन्होनें दुनिया को गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत देने वाले न्यूटन को इसका आविष्कारक ना बताते हुए बल्कि भारतीय गणितज्ञ और ज्योतिष ब्रहृम्गुप्त द्वितिय को इसका प्रणेता बताया है।
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जहां देवनानी के इस बयान की चौतरफा आलोचना हो रही है वहीं राजस्थान विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष के.जी शर्मा ने देवनानी की पीठ थपथपाते हुए कहा है गुरुत्वाकर्षण के बारे में सबसे पहले ब्रहृमगुप्त द्वितिय द्वारा 628 ईसवी में लिखी गई किताब 'ब्रहृमस्फूटसिद्धांता' में बताया जा चुका है।
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उन्होनें किताब से ही संस्कृत में लिखे एक सूत्र का अनुवाद करते हुए बताया कि जिस तरह पानी का स्वभाव  निरंतर बहना है ठीक उसी तरह  पृथ्वी का भी यहीं स्वभाव है की वो हर चीज को अपनी ओर खींचती है। प्रोफेसर केजी शर्मा ने कहा है कि ब्रहृमगुप्त की गुरुत्वाकर्षण को लेकर जो सूत्र दिए थे वो सब बाद में एक और ज्योतिष भास्कर द्वितिय ने 1150 ईसवी में अपनी किताब 'सूर्य सिद्धांत' में दे चुके हैं। इससे ये साबित होता है कि धरती पर गुरुत्वाकर्षण के बारे में सबसे पहले भारत ने ही दुनिया को समझाया था। 
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ब्रहृमगुप्त की किताबों को विदेशियों ने आधार बनाकर लिख डाली किताबें

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प्रोफेसर शर्मा ने दावा किया है कि ब्रहृमगुप्त की ज्योतिषि पर लिखी गई कई किताबों को अरब के बुद्धिजीवियों ने आधार बनाया और उससे आधुनिक किताबें लिख डाली जिनका प्रभाव आज भी मुस्लिम और ईसाई समुदाय में दिखाई देता है।


गौरतलब है कि राजस्थान के शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी ने राजस्थान विश्विद्यालय के 72वें स्थापना दिवस पर बोलते हुए कहा था कि धरती पर गुरुत्वाकर्षण के बल का सिद्धांत सर आइजक न्यूटन ने नहीं ​बल्कि भारत के ब्रहृमगुप्त द्वितिय ने दिया था। देवनानी ने अपने आलोचकों से कहा है कि आलोचना करने से पहले जरा वो ब्रहृगुप्त की किताबें पढ़े और बाद में किसी निष्कर्ष पर पहुंचे। 
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