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32 साल पहले मिली थी आजीवन कारावास की सजा, अब आरोपों से बरी
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Sat, 12 Aug 2017 08:32 PM IST
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राजस्थान हाईकोर्ट ने हत्या के मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी को 32 साल बाद इस मामले से बरी कर दिया है। हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा कि कहा कि घटनास्थल से मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में फिंगर और फुट प्रिंट नहीं लिए गए थे। ऐसे में इस साक्ष्य को अभियुक्त के खिलाफ माना जा सकता है।
इसके साथ ही अदालत ने 32 साल पहले निचली अदालत की ओर से दी गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द करते हुए अपीलार्थी को दोषमुक्त कर दिया है। न्यायाधीश केएस अहलुवालिया और न्यायाधीश जीआर मूलचंदानी की खंडपीठ ने यह आदेश पप्पू उर्फ राजवीर की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि घटना पर पहुंचने वाली मृतक की पत्नी व चाचा की गवाही संदेहास्पद है। ऐसे में उन पर यकीन नहीं किया जा सकता। इसलिए अदालत को परिस्थितजन्य साक्ष्य पर विचार करना पड़ेगा। वहीं मौके से मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में नमूने नहीं उठाए गए। ऐसे में अपीलार्थी को दोषमुक्त किया जाता है।
अपील में अधिवक्ता मोहित बलवदा ने अदालत को बताया कि 10 मार्च 1982 को अलवर के कोटकासिम थाना इलाके में रहने वाले खिल्लु की हत्या हो गई थी। मृतक की पत्नी ने निचली अदालत में दिए बयान में बताया कि वह पड़ोसी के घर हुए बच्चे के समारोह से रात दो बजे घर आ रही थी। इसी दौरान मृतक के चाचा भी चौपाल से लौट रहे थे।
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घर आते ही दोनों ने देखा की अपीलार्थी व तीन अन्य युवक उसके घर से बाहर निकल रहे हैं। अंदर जाने पर उसके पति की लहुलुहान लाश पड़ी मिली। अपीलार्थी की ओर से अदालत को बताया गया कि घटना के बाद दर्ज एफआईआर में भी उसका नाम नहीं था। इसके अलावा दोनों गवाहों के बयान भी संदेहास्पद हैं। वहीं पुलिस ने मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में नमूने नहीं उठाए। ऐसे में निचली अदालत की ओर से 1 मार्च 1985 को सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द किया जाए। जिस पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए अपीलार्थी को हत्या के आरोप से दोषमुक्त कर दिया है।
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इसके साथ ही अदालत ने 32 साल पहले निचली अदालत की ओर से दी गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द करते हुए अपीलार्थी को दोषमुक्त कर दिया है। न्यायाधीश केएस अहलुवालिया और न्यायाधीश जीआर मूलचंदानी की खंडपीठ ने यह आदेश पप्पू उर्फ राजवीर की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि घटना पर पहुंचने वाली मृतक की पत्नी व चाचा की गवाही संदेहास्पद है। ऐसे में उन पर यकीन नहीं किया जा सकता। इसलिए अदालत को परिस्थितजन्य साक्ष्य पर विचार करना पड़ेगा। वहीं मौके से मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में नमूने नहीं उठाए गए। ऐसे में अपीलार्थी को दोषमुक्त किया जाता है।
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अपील में अधिवक्ता मोहित बलवदा ने अदालत को बताया कि 10 मार्च 1982 को अलवर के कोटकासिम थाना इलाके में रहने वाले खिल्लु की हत्या हो गई थी। मृतक की पत्नी ने निचली अदालत में दिए बयान में बताया कि वह पड़ोसी के घर हुए बच्चे के समारोह से रात दो बजे घर आ रही थी। इसी दौरान मृतक के चाचा भी चौपाल से लौट रहे थे।
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घर आते ही दोनों ने देखा की अपीलार्थी व तीन अन्य युवक उसके घर से बाहर निकल रहे हैं। अंदर जाने पर उसके पति की लहुलुहान लाश पड़ी मिली। अपीलार्थी की ओर से अदालत को बताया गया कि घटना के बाद दर्ज एफआईआर में भी उसका नाम नहीं था। इसके अलावा दोनों गवाहों के बयान भी संदेहास्पद हैं। वहीं पुलिस ने मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में नमूने नहीं उठाए। ऐसे में निचली अदालत की ओर से 1 मार्च 1985 को सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द किया जाए। जिस पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए अपीलार्थी को हत्या के आरोप से दोषमुक्त कर दिया है।