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JLF: साहित्यकार यतींद्र ने कहा, ऐसी फिल्मों के गीत तो स्कूलों के सिलेबस में भी शामिल होने चाहिए
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Sun, 28 Jan 2018 04:35 PM IST
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साहित्यकार यतींद्र मिश्र
- फोटो : File
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साहिर लुधियानवी जैसे गीतकारों के फिल्मी गीत स्कूलों के सिलेबस में शामिल होने चाहिए। ये कहना है साहित्यकार यतींद्र मिश्र का।
मिश्र आज जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान चलो एक बार फिर से: सेलिब्रिटी पोयट्री सेशन में बोल रहे थे। मिश्र के साथ इस सेशन में वाणी त्रिपाठी टिक्कू भी मौजूद थी। यतींद्र मिश्र ने साहिर लुधियानवी के फेमस गीत तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा, इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा का जिक्र करते हुए कहा कि ये ऐसे गीत हैं जो हमे भाईचारा, मानवता और सदाचार सिखाते है। इस तरह के फिल्मी गीत समाज को एक करते है और धर्मनिरपेक्ष बनाते है।
मिश्र ने कहा कि लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी या फिर हो नौशाद, इनके गाये गए और लिखे गीत सामाजिक संदेश देने वाले हैं। ऐसे में इन गीतकारों के गीतों को स्कूलों के सिलेबस में शामिल किया जाना चाहिए।
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मिश्र आज जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान चलो एक बार फिर से: सेलिब्रिटी पोयट्री सेशन में बोल रहे थे। मिश्र के साथ इस सेशन में वाणी त्रिपाठी टिक्कू भी मौजूद थी। यतींद्र मिश्र ने साहिर लुधियानवी के फेमस गीत तू हिन्दू बनेगा ना मुसलमान बनेगा, इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा का जिक्र करते हुए कहा कि ये ऐसे गीत हैं जो हमे भाईचारा, मानवता और सदाचार सिखाते है। इस तरह के फिल्मी गीत समाज को एक करते है और धर्मनिरपेक्ष बनाते है।
मिश्र ने कहा कि लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी या फिर हो नौशाद, इनके गाये गए और लिखे गीत सामाजिक संदेश देने वाले हैं। ऐसे में इन गीतकारों के गीतों को स्कूलों के सिलेबस में शामिल किया जाना चाहिए।
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इसलिए याद हैं अंताक्षरी के समय पुराने गीत
लिटरेचर फेस्टिवल के लिए तैयार किया गया स्वागत द्वार
- फोटो : Amar Ujala
साहित्यकार यतींद्र मिश्र ने कहा कि जब कभी हम अंताक्षरी खेलते है तो सबसे ज्यादा पुराने गीत ही याद आते है। दरअसल, पुराने गीतों में एक संदेश छिपा हुआ है। इन्हीं लोगों ने ले लिया दुपट्टा मेरा गीत का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें भी सामाजिक संदेश है।
उन्होंने कहा कि आज के गीत क्षणिक है जबकि पुराने गीत—कविताओं को सुनते समय ऐसा लगता है मानों खुद शायर पीछे खड़ा है।
उन्होंने कहा कि आज के गीत क्षणिक है जबकि पुराने गीत—कविताओं को सुनते समय ऐसा लगता है मानों खुद शायर पीछे खड़ा है।