Rajasthan: वेतन के लिए तरस रहे राजस्थान के विद्युत कर्मचारी, गहलोत सरकार को ठहराया वित्तीय प्रबंधन के लिए दोषी
राजस्थान राज्य विद्युत कर्मचारी संघ का कहना है कि विद्युत प्रशासन की लापरवाही की सजा कर्माचारियों क्यों मिल रही है ? जो वित्तीय घाटा हो रहा है, उससे कर्मचारियों क्या लेना-देना है ?
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राजस्थान में कोयले की आपूर्ति सही से नहीं होने से बिजली संकट से जूझना पड़ता है। वहीं राजस्थान राज्य विद्युत कर्मचारी संघ के महामंत्री अमित मल्होत्रा ने विद्युत विभाग के कर्मचारियों की तनख्वाह रोकने पर रोष जताया है। इसके साथ ही उन्होंने गहलोत सरकार को वित्तीय प्रबंधन के लिए दोषी करार दिया।
राजस्थान राज्य विद्युत कर्मचारी संघ के महामंत्री अमित मल्होत्रा ने सवाल उठाए कि क्या सरकार को पिछले एक साल से नहीं पता था कि कोयले की अपूर्ति ठीक प्रकार से नहीं हो रही है। विद्युत प्रशासन की लापरवाही की सजा कर्माचारियों क्यों मिल रही है। अमित मल्होत्रा ने विद्युत प्रशासन के वित्तीय प्रबंधन को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि जब विद्युत प्रशासन 12 रुपये और 20 रुपये के दर से बिजली खरीद कर रहा है। ऐसे में जो वित्तीय घाटा हो रहा है, उससे कर्मचारियों क्या लेना-देना है। इसका पैसा सरकार को देना चाहिए।
बता दें कि साल जुलाई 2000 में सरकार ने राजस्थान स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड को भंग करते हुए पांच नई कंपनी बनाई थी। जिसमें से राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड का काम सिर्फ ऊर्जा का उत्पादन करना और और उसको बेचने और उपयोग के लिए आगे देना है। इस कंपनी के पास राजस्थान में 30 यूनिट है, जहां ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है। राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड के 21 यूनिट ही चालू हैं।
वहीं दूसरी कंपनी राजस्थान विद्युत प्रसारण निगम बनाई गई थी। जिसका काम विद्युत का प्रसारण करना है, जो कि तार और अन्य माध्यमों विद्युत के प्रसारण का काम करती है। इसी के साथ डिस्कॉम जयपुर, डिस्कॉम अजमेर और डिस्कॉम जोधपुर को भी बनाया गया, जो कि आखिरी उपभोक्ताओं तक बिजली आपूर्ति करने, उनको नए कनेक्शन देने और उनसे बिजली के शुल्क की वसूली करना और राजस्व की अपूर्ति करना और मेंटेनेन्स आदि कार्य तय किए गए थे।
डिस्कॉम राजस्थान ऊर्जा विकास निगम से अपनी बिजली की खरीद करती है और उसको आम उपभोक्ताओं तक अपूर्ति करती है। जिसके बदले डिस्कॉम को एक तय रकम राजस्थान ऊर्जा विकास निगम को देनी होती है। डिस्कॉम की ओर से उपभोक्ताओं से जो दर वसूली करनी है, उसका निर्धारण सरकार द्वारा विद्युत नियामक आयोग की स्वीकृति से किया जाता है। चूंकि उपभोक्ता को नियमित बिजली आपूर्ति करना अनिवार्य है। इसलिए डिस्कॉम को अपने लोड के अनुसार बिजली की जरूरत होती है। जरूरत और पूर्ति की बात की जाए तो अपूर्ति 22 हजार मेगावाट की है लेकिन डिमांड 14 हजार मेगावाट की थी।
बाहर से खरीदी जा रही बिजली
आज की स्थिति में जब नौ यूनिट बंद है। इसलिए बिजली को बाहर से खरीद किया जाता है। जिसकी कीमत 12-18 रुपए प्रति यूनिट है। जबकि राजस्थान उत्पादन निगम से बिजली की खरीद 4 रुपये प्रति यूनिट पर होती है। जिसके चलते डिस्कॉम पर निरंतर वित्तीय बोझ बढ़ रहा है।
बिजली चोरी भी घाटे का एक कारण
डिस्कॉम के बढ़ते हुए घाटे के लिए बिजली चोरी भी एक अहम फैक्टर है। जिसके चलते भी डिस्कॉम निरंतर घाटे में आ जाता है। बिजली छीजत 20 प्रतिशत से लेकर कई जगह 50 प्रतिशत तक हैं, जिसको 15 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य सरकार की ओर विद्युत निगमों को दिया गया हैं पर राजनीतिक दबाव के चलते प्रबंधन को कार्य करने की स्वतंत्रता नहीं मिल पाती हैं और घाटा बढ़ता जा रहा हैं।
उपभोक्ता दो गुने, कर्मचारी पूरा नहीं
डिस्कॉम के ऊपर निरंतर बढ़ते काम के बोझ के चलते उपभोक्ता तो दो गुना हो चुके हैं लेकिन स्टाफ आज भी पूरा नहीं है। राजस्थान विद्युत कर्मचारी संघ के महामंत्री अमित मल्होत्रा का कहना है कि स्टाफ पूरा नहीं होने से भी राजस्व को वसूली पर असर पड़ता है और सरकार इसके प्राइवट मोड पर करने के लिए तत्पर बनी रहती है।
घाटे के कारणों पर सरकार को श्वेत पत्र जारी करना चाहिए
अमित मल्होत्रा के अनुसार इस घाटे का सारा बोझ अंत में उपभोक्ताओं को ही उठाना पड़ेगा। प्राइवट होने पर सरकार के हाथ से लगाम छूट कर प्राइवट कंपनी के पास पहुच जाएगी जिसके बाद सभी घाटा पूर्ति के लिए उपभोक्ताओं की जेब पर ही बोझ बढ़ाया जाएगा। सरकार को सन 2000 से लेकर अब तक एक लाख करोड़ के घाटे के कारणों पर श्वेत पत्र जारी करना चाहिए और घाटे के कारणों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।