Diwali: 157 साल पुराने इस मंदिर में बिना विष्णु अकेली महालक्ष्मी हैं विराजमान, गज स्वरूपा है मां की प्रतिमा
दिवाली पर जयपुर के महालक्ष्मी मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है। मंदिर की खास बात यह है कि यहां अविवाहित लड़कियां अपनी जल्दी शादी कराने के लिए माता का दर्शन करने आती हैं।
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राजस्थान की राजधानी जयपुर में ऐतिहासिक, धार्मिक स्थलों की कमी नहीं है। यहां कई मंदिर, महल हैं, जिसे देखने के लिए विदेशों से लोग खींचे चले आते हैं। जयपुर में ही सबसे पुराना और अनूठा लक्ष्मी मंदिर है। मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां मां की प्रतिमा गज लक्ष्मी के रूप में विराजित है। महालक्ष्मी के दोनों तरफ हाथी हैं और लक्ष्मी जी भी हाथी पर ही विराजमान हैं। संभवत: देश में ऐसी ये पहली प्रतिमा है।
मंदिर निर्माण के लिए महिला ने दान कर दी थी सारी संपत्ति
जयपुर के आगरा रोड पर स्थित यह मंदिर करीब 157 साल पुराना है। 1865 में जयपुर के महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय के शासनकाल में इस महालक्ष्मी मंदिर का निर्माण करवाया गया। इस मंदिर का निर्माण माली ब्राह्माण समाज की एक महिला ने करवाया था, जिन्होंने मंदिर निर्माण के लिए अपने सभी आभूषण और संपत्ति दान कर दिया था। श्रीमाली ब्राह्मण महालक्ष्मी को कुलदेवी मानते हैं, यही वजह है कि इस प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर में सेवा पूजा भी इसी समाज के ब्राह्मण करते हैं।
खास बात यह है कि बगैर विष्णु जी के अकेली महालक्ष्मी ही विराजमान हैं। मान्यता है कि जयपुर वेधशाला का निर्माण करने वाले अपने प्रधान राज्य ज्योतिषी पंडित केवलराम श्रीमाली के पूर्वजों को करीब 201 साल पहले जयपुर लाया गया था। इसके बाद उन्होंने ही जयपुर में महालक्ष्मी के पूजन के लिए यह मंदिर का निर्माण किया गया था।
यहां अविवाहित लड़कियों मांगती है मन्नत
महालक्ष्मी के इस मंदिर में दिवाली पर खूब भीड़ होती है। यहां दिवाली को लेकर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। कहते हैं कि मंदिर में मां लक्ष्मी की पूजा करने वालों की हर मनोकामना पूरी होती है। अविवाहित लड़कियों के मां लक्ष्मी के पूजन से शादी भी जल्दी होती है।