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प्रेगनेंसी में करती हैं इन चीजों का सेवन तो बच्चे को हो सकता है ये खतरा
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Mon, 03 Apr 2017 06:10 PM IST
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pregnancy
- फोटो : telegraph
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कहा जाता है कि गर्भावस्था के दौरान खाई गई चीजों का मां और बच्चे की सेहत पर प्रभाव पड़ता है। गर्भवती महिलाओं को डिलीवरी में आने वाली परेशानियों से बचने के लिए निर्धारित मात्रा में फॉलिक एसिड लेने की सलाह दी जाती है।
नए शोधों में पता चला है कि अगर गर्भावस्था में महिलाएं जरूरत से ज्यादा विटामिन व फॉलिक एसिड लेती हैं तो उनकी संतान में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम का खतरा बढ़ सकता है। दुनियाभर में पाई जाने वाली इस बीमारी प्रति 1000 लोगों के पीछे तीन चार मामले ऑटिज्म के पाए जाते हैं।
विश्व ऑटिज्म दिवस पर रविवार को जीवन रेखा मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पीटल एवं महावीर नगर स्थित एडवांस सुपरस्पेशियलिटी क्लीनिक में आयोजित जागरुकता सेमिनारों में सीनियर न्यूरोलॉजिस्ट व एचओडी डॉ. सूर्यप्रकाश पाटीदार ने यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि शोधों में पता चला है कि जिन गर्भवती महिलाओं के ब्लड में ज्यादा फॉलिक एसिड होता है उनकी संतान में सामान्य फॉलिक एसिड वाली महिलाओं की संतान से ऑटिज्म का खतरा दोगुना बढ़ जाता है।
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वहीं दूसरी ओर जिन महिलाओं में अत्यधिक विटामिन बी.12 होता है उनके बच्चों में ऑटिज्म होने की संभावना तीन गुना तक बढ़ जाती है। जिन गर्भवती महिलाओं में फॉलिक एसिड और विटामिन बी.12 दोनों अत्यधिक होता है उनकी संतान में ऑटिज्म होने का खतरा 17 गुना अधिक हो जाता है। उन्होंने कहा कि लड़कियों के मुकाबले लड़कों के इस बीमारी के चपेट में आने की संभावना अधिक होती है।
क्या है ऑटिज्म
ऑटिज्म मस्तिष्क के विकास के दौरान होने वाला एक मानसिक रोग है जो मस्तिष्क के कई भागों को प्रभावित करता है। जिन बच्चों में यह रोग होता है उनका विकास अन्य बच्चों की अपेक्षा असामान्य होता है। ऑटिज्म से पीड़ित रोगी बाहरी दुनिया से अनजान अपनी ही दुनिया में खोया रहता है।
3 साल की उम्र से ही बच्चे में दिखने लग जाते हैं आॅटिज्म के लक्षण
डॉ. पाटीदार ने बताया कि ऑटिज्म के लक्षण बच्चे के तीन साल की उम्र होने से पहले ही दिखने शुरू हो जाते हैं। ऐसे बच्चे सामाजिक गतिविधियों के प्रति उदासीन होते हैं। वो लोगों की ओर न देखते हैं और न मुस्कराते हैं। अपना नाम पुकारने पर भी तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। कई बार ऑटिज्म के रोगी को मिर्गी के दौरे भी पड़ सकते हैं। ऐसे रोगी को बोलने और सुनने में कई बार समस्या आती है। आंखों में आंखे डालकर बात करने से घबराना।
ऑटिज्म के कारण
हालांकि अभी ऑटिज्म होने का मुख्य कारण पता नहीं चल पाया है। मगर न्यूरोलॉजिस्ट इसके कई कारण मानते हैं। मसलन जन्म के समय और बाद में जरूरी टीके नहीं लगनाए गर्भावस्था में मां को कोई गंभीर बीमारी या मानसिक विकार होनाए दिमाग के रसायनों में असामान्यता होनाए बच्चे का समय से पहले जन्म या बच्चे का गर्भ में ठीक से विकास ना होना आदि।
ऑटिज्म का उपचार
डॉ. पाटीदार ने बताया कि इस बीमारी के उपचार के कई तरीके हैं। इनमें स्क्रीनिंग टूलए बिहेवियर प्रोग्राम इमिटेशन एक्सरसाइज दवाओं से उपचार किया जाता है। न्यूरोलॉजिस्ट की सलाह पर कुछ निश्चित दवाओं से ऑटिज्म को नियंत्रित किया जा सकता है।
इस बीमारी के लक्षणों जैसे अवसाद उत्तेजक होना खुद को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति अधिक गुस्सा करना आदि को दवाओं से काबू किया जा सकता है। ऑटिज्म के इलाज का मुख्य उद्देश्य रोगी में इस बीमारी के लक्षणों को कम करके उनमें सीखने की क्षमता का विकास किया जाना है।
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नए शोधों में पता चला है कि अगर गर्भावस्था में महिलाएं जरूरत से ज्यादा विटामिन व फॉलिक एसिड लेती हैं तो उनकी संतान में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम का खतरा बढ़ सकता है। दुनियाभर में पाई जाने वाली इस बीमारी प्रति 1000 लोगों के पीछे तीन चार मामले ऑटिज्म के पाए जाते हैं।
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विश्व ऑटिज्म दिवस पर रविवार को जीवन रेखा मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पीटल एवं महावीर नगर स्थित एडवांस सुपरस्पेशियलिटी क्लीनिक में आयोजित जागरुकता सेमिनारों में सीनियर न्यूरोलॉजिस्ट व एचओडी डॉ. सूर्यप्रकाश पाटीदार ने यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि शोधों में पता चला है कि जिन गर्भवती महिलाओं के ब्लड में ज्यादा फॉलिक एसिड होता है उनकी संतान में सामान्य फॉलिक एसिड वाली महिलाओं की संतान से ऑटिज्म का खतरा दोगुना बढ़ जाता है।
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वहीं दूसरी ओर जिन महिलाओं में अत्यधिक विटामिन बी.12 होता है उनके बच्चों में ऑटिज्म होने की संभावना तीन गुना तक बढ़ जाती है। जिन गर्भवती महिलाओं में फॉलिक एसिड और विटामिन बी.12 दोनों अत्यधिक होता है उनकी संतान में ऑटिज्म होने का खतरा 17 गुना अधिक हो जाता है। उन्होंने कहा कि लड़कियों के मुकाबले लड़कों के इस बीमारी के चपेट में आने की संभावना अधिक होती है।
क्या है ऑटिज्म
ऑटिज्म मस्तिष्क के विकास के दौरान होने वाला एक मानसिक रोग है जो मस्तिष्क के कई भागों को प्रभावित करता है। जिन बच्चों में यह रोग होता है उनका विकास अन्य बच्चों की अपेक्षा असामान्य होता है। ऑटिज्म से पीड़ित रोगी बाहरी दुनिया से अनजान अपनी ही दुनिया में खोया रहता है।
3 साल की उम्र से ही बच्चे में दिखने लग जाते हैं आॅटिज्म के लक्षण
डॉ. पाटीदार ने बताया कि ऑटिज्म के लक्षण बच्चे के तीन साल की उम्र होने से पहले ही दिखने शुरू हो जाते हैं। ऐसे बच्चे सामाजिक गतिविधियों के प्रति उदासीन होते हैं। वो लोगों की ओर न देखते हैं और न मुस्कराते हैं। अपना नाम पुकारने पर भी तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। कई बार ऑटिज्म के रोगी को मिर्गी के दौरे भी पड़ सकते हैं। ऐसे रोगी को बोलने और सुनने में कई बार समस्या आती है। आंखों में आंखे डालकर बात करने से घबराना।
ऑटिज्म के कारण
हालांकि अभी ऑटिज्म होने का मुख्य कारण पता नहीं चल पाया है। मगर न्यूरोलॉजिस्ट इसके कई कारण मानते हैं। मसलन जन्म के समय और बाद में जरूरी टीके नहीं लगनाए गर्भावस्था में मां को कोई गंभीर बीमारी या मानसिक विकार होनाए दिमाग के रसायनों में असामान्यता होनाए बच्चे का समय से पहले जन्म या बच्चे का गर्भ में ठीक से विकास ना होना आदि।
ऑटिज्म का उपचार
डॉ. पाटीदार ने बताया कि इस बीमारी के उपचार के कई तरीके हैं। इनमें स्क्रीनिंग टूलए बिहेवियर प्रोग्राम इमिटेशन एक्सरसाइज दवाओं से उपचार किया जाता है। न्यूरोलॉजिस्ट की सलाह पर कुछ निश्चित दवाओं से ऑटिज्म को नियंत्रित किया जा सकता है।
इस बीमारी के लक्षणों जैसे अवसाद उत्तेजक होना खुद को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति अधिक गुस्सा करना आदि को दवाओं से काबू किया जा सकता है। ऑटिज्म के इलाज का मुख्य उद्देश्य रोगी में इस बीमारी के लक्षणों को कम करके उनमें सीखने की क्षमता का विकास किया जाना है।