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Hindi News ›   India News ›   Worrying: ecology of Balukhand-Konark Sanctuary in danger due to cyclones, greenery reduced

चिंताजनक: चक्रवातों से संकट में बालूखंड-कोणार्क अभयारण्य की पारिस्थितिकी, तीन दशक में 37.1% रह गई हरियाली

Tue, 15 Apr 2025 06:56 AM IST
निर्मल कांत अमर उजाला नेटवर्क, भुवनेश्वर/गुवाहाटी।
अमर उजाला नेटवर्क, भुवनेश्वर/गुवाहाटी। Published by: निर्मल कांत Updated Tue, 15 Apr 2025 06:56 AM IST
सार

बालूखंड-कोणार्क अभयारण्य में चक्रवातों और तटीय कटाव के कारण हरियाली घटकर 37.1% रह गई है, जबकि 1993 में यह 41.8% थी। फानी चक्रवात ने अभयारण्य को गंभीर नुकसान पहुंचाया, जिससे घनी वनस्पति लगभग खत्म हो गई है। असम का होलोंगापार गिब्बन अभयारण्य भी मानवीय गतिविधियों के कारण संकट में है।

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Worrying: ecology of Balukhand-Konark Sanctuary in danger due to cyclones, greenery reduced
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : एएनआई

विस्तार

ओडिशा के पुरी और कोणार्क के बीच स्थित बालूखंड-कोणार्क अभयारण्य  अपनी समृद्ध जैव विविधता, सुनहरी रेत, कैसुरीना पेड़ों और ओलिव रिडले कछुओं के घोंसले वाले समुद्री तटों के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन तटीय कटाव और चक्रवातों के कारण पारिस्थितिकी संकट में है। असम की होलोंगापार गिब्बन वन्यजीव सेंचुरी का अस्तित्व भी खतरे में दिखाई दे रहा है।

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एक अध्ययन में बताया गया है कि 1993 में बालूखंड-कोणार्क वन्यजीव अभयारण्य के 41.8 फीसदी हिस्से में घनी हरियाली थी वह 2023 में घटकर  37.1 फीसदी रह गई है। अभ्यारण के आधे क्षेत्र से हरियाली नदारद हो गई है। इस अभयारण्य को सबसे अधिक क्षति चक्रवातों ने पहुंचाई। चक्रवात फानी का प्रभाव इतना भयावह था कि इसमें पेड़ों और वन क्षेत्र को लगभग बर्बाद कर दिया। उड़ीसा के फकीर मोहन विवि और ब्राजील विवि के संयुक्त अध्ययन के अनुसार अब इस अभयारण्य में हरियाली धीरे-धीरे बंजर भूमि में बदल रही है। 2002 और 2023 के बीच घनी वनस्पति को भारी नुकसान पहुंचा है और अब  वह करीब करीब खत्म होने के कगार पर है।
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सुरक्षा के लिए कड़ी शर्तें...
राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने पर्यावरण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई सख्त शर्तें लगाई हैं, जिसमें परिचालन की निगरानी के लिए वास्तविक समय डिजिटल निगरानी प्रणाली की स्थापना, शुरू होने से पहले नियामक निकायों को विस्तृत परिचालन योजना प्रस्तुत करना, न्यूनतम पेड़ों की कटाई और सख्त प्रदूषण नियंत्रण उपाय शामिल हैं।

मानवीय गतिविधियों से होलोंगापार गिब्बन वन्यजीव पार्क भी खतरे में
मानवीय गतिविधियों के कारण असम के होलोंगापार गिब्बन वन्यजीव अभयारण्य का अस्तित्व भी खतरे में है। अधिकारियों ने बताया कि  अभयारण्य से होकर गुजरने वाली एक रेलवे लाइन का विद्युतीकरण किया जाना है, जिसका प्रस्ताव स्थायी समिति ने सुझाया है। वहीं, होलोंगापार गिब्बन वन्यजीव अभयारण्य के इस इको सेंसिटिव जोन में तेल और गैस की खोज के लिए ड्रिलिंग को मंजूरी दी गई है, जिससे देश के इस अद्वितीय वन्यजीव आवास को भारी नुकसान पहुंचेगा। विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है की ऊर्जा जरूरत को पूरा करने के लिए ऐसा करना क्या उचित होगा।

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