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वर्ल्ड स्लीप डे: डिजिटल दुनिया ने छीनी युवाओं की नींद, अवसाद व आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ी

Fri, 13 Mar 2026 05:22 AM IST
N Arjun एन अर्जुन
Updated Fri, 13 Mar 2026 05:22 AM IST
सार

कम नींद का असर व्यवहार पर भी साफ दिखाई देता है। शोध बताते हैं कि जो किशोर रात में सात घंटे से कम सोते हैं, उनमें आक्रामक व्यवहार की संभावना आठ घंटे या उससे अधिक सोने वालों की तुलना में लगभग 1.5 से 2 गुना अधिक होती है। स्कूल आधारित सर्वेक्षणों में यह भी सामने आया है कि नींद की कमी से जूझ रहे किशोरों में झगड़े और बुलिंग की घटनाएं 30 से 40 प्रतिशत तक अधिक देखी जाती हैं।

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वर्ल्ड स्लीप डे - फोटो : ANI

विस्तार

मोबाइल, सोशल मीडिया और देर रात तक स्क्रीन का इस्तेमाल युवाओं की नींद पर गंभीर असर डाल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल जीवनशैली के कारण युवाओं में नींद की कमी तेजी से बढ़ रही है और इसका सीधा संबंध अवसाद, आक्रामक व्यवहार और आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति से जुड़ रहा है।
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वर्ल्ड स्लीप डे पर सामने आए आंकड़ों और विशेषज्ञों की चेतावनी ने इस समस्या की गंभीरता को और स्पष्ट कर दिया है। वर्ल्ड स्लीप डे 2026 का स्लोगन भी इसी चिंता को सामने लाता है। नींद के महत्व को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए वर्ल्ड स्लीप डे सोसाइटी और कलकत्ता स्लीप सोसाइटी के विशेषज्ञों ने बताया कि दुनिया में 60 से 70 प्रतिशत किशोर पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं।
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आठ घंटे से भी कम सोते हैं छात्र :शोध
अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के अनुसार लगभग 73 प्रतिशत हाई स्कूल के छात्र स्कूल के दिनों में आठ घंटे से भी कम सोते हैं। भारत में भी स्थिति चिंताजनक है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार 80 से 90 प्रतिशत किशोर किसी न किसी स्तर पर नींद की कमी का सामना कर रहे हैं। कई सर्वेक्षणों में पाया गया है कि लगभग 64 प्रतिशत किशोर आठ घंटे या उससे कम सोते हैं, जबकि विशेषज्ञों के अनुसार किशोरों को रोजाना 8 से 10 घंटे की नींद जरूरी होती है।
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सामने आया कम नींद  और आत्महत्या का संबंध
कम नींद का असर व्यवहार पर भी साफ दिखाई देता है। शोध बताते हैं कि जो किशोर रात में सात घंटे से कम सोते हैं, उनमें आक्रामक व्यवहार की संभावना आठ घंटे या उससे अधिक सोने वालों की तुलना में लगभग 1.5 से 2 गुना अधिक होती है। स्कूल आधारित सर्वेक्षणों में यह भी सामने आया है कि नींद की कमी से जूझ रहे किशोरों में झगड़े और बुलिंग की घटनाएं 30 से 40 प्रतिशत तक अधिक देखी जाती हैं। नींद की कमी और आत्महत्या के बीच भी संबंध सामने आया है। कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में पाया गया है कि जिन लोगों को नींद से जुड़ी समस्याएं होती हैं, उनमें आत्महत्या के विचार और प्रयास का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में 2 से 3 गुना अधिक हो सकता है।


हालात चिंताजनक
देश में बढ़ते आत्महत्या के आंकड़े भी इस चिंता को और गंभीर बनाते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में आत्महत्या के मामलों की संख्या 2013 में 1.34 लाख से बढ़कर 2023 में 1.71 लाख से अधिक हो गई है। इसी अवधि में छात्र आत्महत्याओं की संख्या 8,423 से बढ़कर 13,892 तक पहुंच गई, जो करीब 65 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। कलकत्ता स्लीप सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. उत्तम अग्रवाल कहते हैं, अच्छी गुणवत्ता वाली नींद संपूर्ण स्वास्थ्य की बुनियाद है। अगर लोग अपनी दिनचर्या में थोड़े बदलाव करें तो नींद से जुड़ी कई समस्याओं से बचा जा सकता है। नहीं तो यह समाज के लिए गंभीर समस्या बन सकती है।

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