विश्व टीकाकरण सप्ताह: टीका लगना जरूरी ताकि बीमारी की नजर न लगे, 24 से 30 अप्रैल तक चलेगा कार्यक्रम
2020 और 2021 के दौरान कोरोना महामारी के चलते भारत में प्रभावित रहा टीकाकरण कार्यक्रम। अब यह पटरी पर लौट रहा रहा है। हर साल 24 से 30 अप्रैल के बीच विश्व टीकाकरण सप्ताह मनाया जाता है। सरकार ने सप्ताह भर में उन 30 लाख बच्चों की पहचान करने का लक्ष्य रखा है, जिन्हें अब तक एक भी टीका नहीं लगा है... पढ़ें परीक्षित निर्भय की यह रिपोर्ट
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टीके जीवन बचाते हैं, लेकिन दुनिया में करोड़ों बच्चों को अब भी टीका नहीं लग पा रहा है। अगर भारत की बात करें तो 2020 से पहले तक हर साल 20 से 25 फीसदी तक बच्चे टीका नहीं ले रहे थे। कोरोना महामारी में यह आंकड़ा बढ़कर 40 फीसदी तक पहुंचा, लेकिन इसके बाद सुधार भी हुआ है। हर साल 24 से 30 अप्रैल के बीच मनाए जाने वाले विश्व टीकाकरण सप्ताह का इस बार लक्ष्य भी यही बच्चे हैं, जिनके लिए थीम है ‘द बिग कैच-अप’।
20 फीसदी बच्चे अब भी टीकों से दूर
देश में सालाना 80 फीसदी तक पहुंचा टीकाकरण लेकिन 20 फीसदी बच्चे अब भी टीकों से दूर
बच्चों का छूटा टीकाकरण
2020 और 2021 में कोरोना के चलते टीकाकरण पर बुरा असर पड़ा। इस अवधि में 30 लाख बच्चे टीकाकरण से छूट गए, लेकिन जिला स्तर पर काम करते हुए इसमें काफी सुधार हुआ है। (केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ाें के अनुसार)
दुनियाभर में 50 लाख बच्चे
- यूनिसेफ की रिपोर्ट ‘द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन 2023 ः फॉर एवरी चाइल्ड, वैक्सीनेशन के अनुसार, भारत में अब भी 27 लाख बच्चों को एक भी टीका नहीं लगा है।
- यह सिर्फ भारत की स्थिति नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2019 और 2021 के बीच दुनियाभर में टीकाकरण से वंचित बच्चों की संख्या 50 लाख तक बढ़ी है।
- 2019 की तुलना में 2022 के दौरान 35 लाख से ज्यादा लड़कियों ने मानव पेपिलोमा वायरस से रोधी टीका नहीं लगवाया।
क्यों जरूरी है टीकाकरण
बच्चों के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा कवच टीकाकरण है। यह जानलेवा बीमारियों से बच्चों की रक्षा करता है। उनका इम्यून सिस्टम मजबूत बनाता है। हमारे पास इसका इतिहास 100 साल से भी पुराना है। अब तक टीकाकरण की बदौलत ही हमारे बच्चे बीमारियों से बचते आए हैं।
-डॉ. जुगल किशोर, वरिष्ठ सलाहकार सफदरजंग अस्पताल, नई दिल्ली
मिशन इंद्रधनुष: सार्वभौमिक टीकाकरण के लिए सरकार ने 2014 में मिशन इंद्रधनुष शुरू किया।
- इसके तहत देश में हर साल शून्य से पांच वर्ष तक की आयु के बच्चों को बीसीजी, पोलियो, न्यूमोकोकल कंजुगेट वैक्सीन, हेपेटाइटिस बी, रोटावायरस वैक्सीन, खसरा व रूबेला (एमआर), जापानी एन्सेफलाइटिस, डिप्थीरिया, टिटनस आदि टीके दिए जा रहे हैं।
- इसमें पेंटावेलेंट एक संयुक्त टीका भी दिया जाता है, जो डिप्थीरिया, टिटनस, पर्टुसिस, हीमोफिलस, इन्फ्लुएंजा टाइप बी संक्रमण और हेपेटाइटिस बी से बचाता है।
सर्वाइकल कैंसर का टीका इसी साल
इसी साल के अंत तक सर्वाइकल कैंसर का टीका ‘मानव पेपिलोमावायरस’ कार्यक्रम (यूआईपी) में शामिल हो सकता है। अभी छह राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, यूपी, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में 9-14 वर्ष की आयु की लड़कियों को यह टीका लगेगा।
एआई तकनीक...बना यू-विन
कोरोना काल में बने कोविन प्लेटफॉर्म की तरह यू-विन नाम से प्लेटफॉर्म बनाया गया है। किस गांव में कितने बच्चे टीकाकरण से दूर हैं, उनकी जानकारी एक क्लिक पर मिलेगी। फिर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता उस परिवार से संपर्क करेंगे।
आईसीएमआर का ड्रोन भी तैयार
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने बताया कि पूर्वोत्तर राज्यों में ड्रोन को लेकर उनका प्रयोग सफल रहा है। जल्द ही हिमाचल, उत्तराखंड व पूर्वोत्तर राज्यों के दुर्गम स्थानों तक टीका लाने-ले जाने के लिए ड्रोन की मदद ली जाएगी।
भारत में मिशन इंद्रधनुष की वजह से 18.5 फीसदी टीकाकरण बढ़ा है। इसी से 2014 में पोलियो और 2015 में मातृ-नवजात टिटनेस उन्मूलन कर पाए।
दुनिया में 70% टीके भारत के
कोरोना महामारी में दुनिया भारत की टीका निर्माण क्षमता का गवाह बनी। वहीं, भारत खसरा, बीसीजी, डिप्थीरिया, टिटनस और पर्टुसिस (डीपीटी) जैसी बीमारियों के टीकों का लंबे समय से उत्पादन कर रहा है। डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि दुनिया में 70 फीसदी बच्चे भारत निर्मित टीका ले रहे हैं।
टीका न लेने से जान जाने का जोखिम 90% से भी ज्यादा
टीका न लेने से बच्चों को जान का जोखिम 90 फीसदी से भी ज्यादा रहता है। इन बच्चों की एंटीबॉडी विकसित नहीं हो पाती, जिससे इन्हें कुछ दिनों में ही निमोनिया की परेशानी होने लगती है। यह आगे चलकर जानलेवा हो जाता है। टीकाकरण बच्चों और वयस्कों के स्वास्थ्य की रक्षा करने का प्रभावी तरीका है।
-डॉ. विनोद कुमार, वरिष्ठ प्रोफेसर, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज, नई दिल्ली