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विश्व स्वास्थ्य दिवस : जीवन लंबा तो हुआ पर सेहतमंद नहीं... जीवन शैली से जुड़े रोगों के मरीज हो गए दोगुने

Thu, 07 Apr 2022 06:46 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला रिसर्च डेस्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला रिसर्च डेस्क, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Thu, 07 Apr 2022 06:46 AM IST
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सार
भारत में प्राचीन काल से पहला सुख निरोगी काया को बताया गया लेकिन आज हर काया को कोई न कोई रोग लगा है। हम ज्यादा जी रहे हैं, पर यह जीवन अब सेहतमंद नहीं रहा। आरामदायक जीवनशैली से उपजी बीमारियों ने घेर लिया है। अध्ययन बताते हैं कि डायबिटीज, बीपी और हाइपरटेंशन जैसे रोग जीवन के चौथे-पांचवें दशक में पहुंचे लोगों के जिंदगी का हिस्सा बन गए हैं। कोरोना महामारी के दौरान कई सर्वेक्षणों में लोगों ने माना है कि खराब जीवनशैली ने उन्हें संक्रमण की ओर धकेला। आज विश्व स्वास्थ्य दिवस पर मौजूदा सेहत हालात पर एक नजर...
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World Health Day: Life is long but not healthy, patients of lifestyle diseases have doubled In India
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : iStock

विस्तार

कहने को तो अब हम ज्यादा जीने लगे हैं। बीते पांच दशक में हमारी औसत उम्र (जीवन प्रत्याशा) करीब 22 साल बढ़ गई है। लेकिन उम्र ज्यादा होने से स्वस्थ जीवन में कोई खास इजाफा नहीं हुआ। अब हम पहले के मुकाबले ज्यादा बीमारियों के साथ जीने लगे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ताजा रिपोर्ट के हिसाब से बीमारों की देखभाल में तो भारत का प्रदर्शन पहले से अच्छा रहा है लेकिन जीवन शैली से जुड़े डायबिटीज जैसे रोगों ने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। कभी पोलियो, खसरा, टीबी और एड्स से लड़ता रहा भारत आज डायबिटीज 'कैपिटल' बन गया है और 2025 तक सात करोड़ से ज्यादा लोग इससे ग्रसित होने के आसार हैं। 



सबसे ज्यादा मौतें हृदय रोग से
बीते 30 वर्षों में हृदय रोगियों की तादाद दोगुनी हो गई है। हृदय रोग कभी पांचवें पायदान पर था लेकिन अब यह देश में सबसे बड़ी बीमारी बन गया है। एक अध्ययन के मुताबिक, भारत में बीते तीन दशकों के दौरान लोगों की स्वास्थ्य क्षति में सबसे बड़ा योगदान हृदय, सीओपीडी, डायबिटीज और पक्षाघात जैसे रोगों का रहा है।


जीवन शैली के कारण होने वाली बीमारियों ने 35 साल तक की युवा आबादी को शहर ही नहीं, गांवों तक तेजी से अपनी गिरफ्त में लिया है और यह मौत का सबसे बड़ा कारण बन गई हैं। इसका असर कोरोना महामारी में साफ देखने को मिला, जिसमें जान गंवाने वाले आधे भारतीय पहले से ही डायबिटीज और हाइपरटेंशन जैसे रोगों के शिकार थे।

सिर्फ हृदय रोग और डायबिटीज के चलते इस दशक के अंत तक भारत को 6.2 खरब डॉलर का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ेगा। ये बीमारियां न सिर्फ लोगों की उत्पादकता घटा देती हैं, बल्कि उनके स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाले खर्च में भी भारी बढ़ोतरी हो जाती है।

वैज्ञानिकों की एक वैश्विक टीम के मुताबिक, पुराने रोगों की मौजूदगी और उच्च रक्तचाप, डायबिटीज व वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों ने दुनियाभर की आबादी को कोरोना जैसी महामारी के प्रति पहले के मुकाबले ज्यादा कमजोर बना दिया है।

बढ़ते शहरीकरण ने हमारी जीवन शैली को जड़ और खान-पान को खराब कर दिया है। इसके चलते जीवन रुग्ण हो गया है। हमें लंबी आयु तक स्वस्थ और अच्छी प्रतिरक्षा के साथ जीने के लिए जागरूकता की जरूरत है। अच्छे स्वास्थ्य का कोई शॉर्टकट नहीं है। - डॉ. वीके बहल, कार्डियोलॉजिस्ट

डब्ल्यूएचओ ने कहा, निजी से सरकारी हाथों में आए देश की स्वास्थ्य सेवाएं

  • सरकारी हाथों से मिलेगा अच्छा स्वास्थ्य : डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में अभी 70 फीसदी ओपीडी सेवाएं, 58 फीसदी भर्ती मरीज और 90 फीसदी दवाएं और जांच निजी हाथों में हैं। अच्छा इलाज आम आदमी की पहुंच से बाहर है। भारत में सरकारी स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार की जरूरत है।
  • जीडीपी का डेढ़ फीसदी खर्च, जरूरत तीन फीसदी की : सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च दुनिया में काफी कम है। हम अभी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का सिर्फ 1.5 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं, जबकि जरूरत तीन फीसदी की है। यूरोपीय देश जीडीपी का आठ फीसदी तक खर्च करते हैं।

22 साल बढ़ी भारतीयों की उम्र, पर जीवन शैली से जुड़े रोगों के मरीज हो गए दोगुने

  • गैर संक्रामक रोगों से मरने वालों की तादाद हुई 50% : दक्षिण एशिया क्षेत्र में काफी लोगों के जीवन का एक बड़ा हिस्सा खराब सेहत की भेंट चढ़ रहा है और गैर-संक्रामक (एनसीडी) रोग इसकी बड़ी वजह बनकर उभरे हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत के स्वास्थ्य तंत्र पर 58 फीसदी रोग भार गैर-संक्रामक रोगों के कारण है, जो 1990 में 29 फीसदी था। एनसीडी के कारण अकाल मौतों की तादाद पहले सिर्फ 22 फीसदी थी, जो अब दोगुने से भी ज्यादा बढ़कर 50 फीसदी हो गई है।

वायु प्रदूषण, उच्च रक्तचाप और खराब भोजन मुख्य कारण
2019 में एक शोध में पता लगा था कि देश में जान लेने वाले शीर्ष पांच कारणों में वायु प्रदूषण (16.7 लाख मौतें), उच्च रक्तचाप (14.7 लाख मौतें), तंबाकू (12.3 लाख), खराब भोजन  (10.18 लाख) और उच्च ब्लड शुगर (10.12 लाख) शामिल हैं।

हम 70 साल जीने लगे, 10 हजार लोगों पर महज नौ डॉक्टर
1970 में औसत उम्र 47.7 साल थी, जो 2020 में बढ़कर 69.6 साल हो गई है। डॉक्टर और नर्सों का अनुपात तुलनात्मक रूप से सुधरा है पर व्यापक रूप से हालात अभी कमजोर हैं। 10 हजार लोगों पर नौ डॉक्टर और 24 नर्सें ही हैं। इतने ही लोगों पर महज नौ फार्मासिस्ट हैं।

05 देश, जहां सबसे ज्यादा जीवित रहते लोग, जानिए, इनकी औसत उम्र और दीर्घायु की वजह

  • औसतन उम्र 80 पार, अच्छा खान-पान, तनाव मुक्त जीवन : आज दुनियाभर में औसत उम्र बढ़ गई है और इंसानी इतिहास में पहली बार अधिकांश लोग 60 साल से ज्यादा के जीवन को हकीकत बनते देख रहे हैं। 2050 तक यह 60 साल से बड़ी आयु वालों की तादाद दोगुनी हो जाएगी। लेकिन कुछ देश ऐसे भी हैं, जहां लोग पहले से ही लंबा और स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।
  • कई देशों में बढ़िया स्वास्थ्य ढांचा, प्रदूषण रहित आबोहवा और समय पर रोगों की पहचान और रोकथाम ने जीवन प्रत्याशा बढ़ाई।

मोनाको

  • इस देश में धरती पर सबसे ज्यादा औसत आयु है। पश्चिमी यूरोपीय सीमा पर हरेक इंसान की उम्र औसतन 89.4 साल है।
  • वजह : मोनाको निवासियों के दीर्घायु होने के पीछे सबसे बड़ी वजह मामूली खर्च वाला सरकारी स्वास्थ्य तंत्र, ताजा भूमध्यसागरीय खान-पान और कम तनावपूर्ण जीवन माना जाता है।

जापान

  • दुनिया में भूकंप और सुनामी जैसी आपदाओं से जूझने वाले जापान में औसत आयु 85.3 साल है। डब्ल्यूएचओ कहता है कि जापानी लोग 75 साल तक बिना किसी अक्षमता के स्वस्थ जीवन जीते हैं।
  • वजह : जापानियों के ज्यादा जीने के पीछे स्वस्थ भोजन, नियमित व्यायाम और अधिक वर्षों तक कामकाजी जीवन की अहम भूमिका रहती है।

सिंगापुर

  • धनी दक्षिण एशियाई देश माने जाने वाले सिंगापुर में लोग औसतन 85.2 साल तक जीते हैं।
  • वजह : रोगों की समय पर पहचान और रोकथाम ने जीवन पर काफी सार्थक प्रभाव डाला है, जिससे उनकी उम्र बढ़ी है।

सान मारिनो

  • यूरोपीय देश सान मारिनो में औसतन उम्र 83.3 साल दर्ज की गई है।
  • वजह : यहां भी भूमध्यसागरीय ताजा खान-पान, तनाव मुक्त जीवन और उच्च रोजगार दर लंबे समय तक स्वस्थ रहने में मददगार।

आइसलैंड

  • आइसलैंड के लोगों की औसतन उम्र 83.1 साल है।
  • वजह : ओमेगा-3 वाली मछलियों का भरपूर सेवन करते हैं, जो इन्हें हृदय रोगों से बचाता है। साथ ही आनुवांशिक कारकों का भी योगदान माना जाता है। (सभी आंकड़ों का स्रोत : लैंसेट पत्रिका, डब्ल्यूएचओ, सरकारी रिपोर्टें और वैश्विक सर्वे और सीआईए वर्ल्ड फैक्टबुक।)
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