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महिला आरक्षण विधेयक: 27 साल पहले देवगौड़ा ने पहल की, अटल-मनमोहन ने भी किए प्रयास, अब तक क्यों नहीं हो सका पास?

Tue, 19 Sep 2023 03:27 PM IST
शिवेंद्र तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Tue, 19 Sep 2023 03:27 PM IST
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सार
Women Reservation Bill: लोकसभा में पेश हुआ विधेयक संविधान संशोधन विधेयक है जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम नाम दिया गया है। इसके अंतर्गत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटों पर आरक्षण का प्रावधान है।
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Women Reservation Bill: its history and complete timeline
महिला आरक्षण विधेयक - फोटो : AMAR UJALA

विस्तार

नए संसद भवन में पहले दिन की कार्यवाही के दौरान महिला आरक्षण विधेयक पेश हो गया है। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इसे सदन के पटल पर रखा। बुधवार को इस विधेयक पर लोकसभा में चर्चा भी होनी है। लोकसभा में विधेयक पास होने के बाद गुरुवार को इसे राज्य में पेश किया जाएगा। गुरुवार को ही इस पर राज्यसभा में चर्चा भी हो सकती है। 


हालांकि, इस तरह के विधेयक को पेश करने या पारित कराने का कोई पहला प्रयास नहीं है बल्कि दशकों से इसी कोशिश हो रही है। लिहाजा हमें जानना चाहिए कि आखिर महिला आरक्षण का इतिहास क्या है? पहले कब-कब महिला आरक्षण विधेयक लाए गए? ये विधेयक क्यों पारित नहीं हुए? अब क्यों चर्चा में आया यह विधेयक?

Parliament
Parliament - फोटो : Social Media
पहले जानते हैं क्या है महिला आरक्षण विधेयक?
पिछले दो दशक से अधिक समय से शायद ही कोई संसद सत्र होगा जिसमें महिला आरक्षण की बात न उठी हो। पेश हुआ विधेयक संविधान संशोधन विधेयक है जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम नाम दिया गया है। इसके अंतर्गत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटों पर आरक्षण का प्रावधान है। इसी 33 फीसदी में से एक तिहाई सीटें अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी है। 

देश में महिला आरक्षण का इतिहास क्या है?
देश की संसद में महिला आरक्षण विधेयक पहली बार तो 1996 में पेश हुआ लेकिन इसकी नींव 1992 में हुए 73वें और 74वें संविधान संशोधन द्वारा रखी जा चुकी थी। दरअसल, सत्ता के विकेंद्रीकरण का सपना सच करने के लिए संविधान में 73वां और 74वां संशोधन का फैसला किया गया था। 1992 में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में दोनों संशोधन पारित हुए। इन्हें एक जून 1993 से राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया गया। अनुच्छेद 243 (डी) और 243 (टी) को संविधान में शामिल किया गया और देश में पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें सुरक्षित की गईं।

संविधान के अनुच्छेद 243 D के प्रावधानों के अनुसार, पंचायती राज संस्थाओं की एक तिहाई सीटें और संविधान के भाग IX के अंतर्गत आने वाली पंचायती राज संस्थाओं के सभी स्तरों पर अध्यक्ष के एक तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए। वहीं, संविधान के अनुच्छेद 243 T में प्रावधान है कि प्रत्येक नगर पालिका में प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा भरी गई सीटों की कुल संख्या का न्यूनतम एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित होगा।

महिला आरक्षण
महिला आरक्षण - फोटो : अमर उजाला
महिला आरक्षण विधेयक का इतिहास क्या है?
27 साल के लंबे इंतजार के बाद संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का रास्ता साफ होने की स्थिति में है। हालांकि, पहली बार इसे एचडी देवगौड़ा वाली संयुक्त मोर्चा सरकार ने 12 सितंबर 1996 को 81वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया। यह विधेयक तत्कालीन कानून मंत्री रमाकांत डी खलप द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था, तब सत्तारूढ़ पक्ष में एक राय नहीं बन सकी थी। 

लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव समेत कई नेताओं ने संशोधन की मांग करते हुए इसका विरोध जताया। विधेयक को अंततः लोकसभा की तत्कालीन सदस्य गीता मुखर्जी की अध्यक्षता में एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेज दिया गया।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी - फोटो : सोशल मीडिया
अटल सरकार में भी लाए गए विधेयक 
जेपीसी ने नौ दिसंबर 1996 को 11वीं लोकसभा में अपनी रिपोर्ट पेश की। बाद में इस विधेयक को 26 जून 1998 को अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने 84वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में 12वीं लोकसभा में फिर से पेश किया गया। 1998 में जब इस विधेयक को पेश करने के लिए तत्कालीन कानून मंत्री थंबी दुरै खड़े हुए थे। उस वक्त संसद में भारी हंगामा हुआ। यहां तक कि हाथापाई भी हुई। कुछ सांसदोंने उनके हाथ से विधेयक की प्रति को लेकर लोकसभा में ही फाड़ दिया था।

इसे 2002 में और 2003 में सदन में लाया गया, लेकिन फिर भी यह विधेयक पारित नहीं हो सका।

सोनिया गांधी और डॉ. मनमोहन सिंह
सोनिया गांधी और डॉ. मनमोहन सिंह - फोटो : पीटीआई
यूपीए सरकार के साझा कार्यक्रम में शामिल रहा बिल
जब मई 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सत्ता में आई, तो विधेयक को गठबंधन के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में जगह मिली। इसमें कहा गया था कि यूपीए सरकार विधानसभाओं और लोकसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण के लिए कानून लाने का कदम उठाएगी। लेकिन यूपीए सरकार भी लोकसभा में विधेयक पास करने में विफल रही।

सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह
सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह - फोटो : PTI
2010 से लटका हुआ है महिला आरक्षण बिल
महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन 108वां विधेयक 2008 में मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में 2008 में पेश हुआ था जो कि नौ मार्च 2010 को राज्यसभा में पारित हुआ मगर लोकसभा में पारित नहीं हो पाया। उसके बाद 2014 में लोकसभा भंग हो गई। राज्यसभा से पास होने के बाद भी यह दोबारा लोकसभा से पास नहीं हो पाया। इसकी बड़ी वजह सपा, बसपा और आरजेडी का कड़ा विरोध और कोटे के भीतर कोटे की मांग था जिसके चलते ये विधेयक अधर में लटका गया।

पीएम मोदी
पीएम मोदी - फोटो : सोशल मीडिया
क्या मोदी सरकार अभी पारित करा सकती है बिल?
मनमोहन सरकार में कांग्रेस का अपना बहुमत नहीं था और कई समर्थक दल महिला आरक्षण विधेयक को मौजूदा रूप में पारित करने के लिए तैयार नहीं थे। लेकिन मौजूदा लोकसभा में न सिर्फ सत्ताधारी गठबंधन का बहुमत है, बल्कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भी महिला आरक्षण के समर्थन में है। इसके अलावा बीआरएस और वामपंथी दल भी महिला आरक्षण लागू करना चाहते हैं। ऐसे में यह सरकार महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन विधेयक ला रही है। इससे भारत में संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का समुचित प्रतिनिधित्व संभव हो सकेगा।
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