कई क्षेत्रों में पुरुषों की तुलना में आगे हैं महिलाएं, लेकिन विज्ञान से जुड़े कार्यों में पीछे
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भारत आज अंतरिक्ष की दुनिया में काफी ऊंची छलांग लगाने के साथ ही वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना चुका है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 22 जुलाई को चंद्रयान-2 को श्रीहरिकोटा से सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा समेत पूरी दुनिया ने भारत को इस मिशन के लिए बधाई दी। भारतीय अंतरिक्ष अभियान के क्षेत्र में यह पहली बार हुआ कि दो महिला वैज्ञानिकों ने इसमें अहम भूमिका निभाई। लेकिन जो बात यहां रेखांकित करने वाली है वह यह कि पिछले साल मणिपुर विश्वविद्यालय में महिला वैज्ञानिकों के एक अधिवेशन में यह बात उभर कर सामने आई कि देश में सिर्फ 14 फीसदी महिला वैज्ञानिक शोधकर्ता हैं।
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जमीनी सच्चाई क्या है
- भारतीय समाज में महिलाओं की वास्तविक स्थिति क्या है। इस बारे में टीम लीज संस्थान ने एक सर्वे किया। इसके अनुसार 72 फीसदी महिलाओं का मानना है कि महिला-पुरुष के बीच भेद बरकरार है और भारत में उद्योग और कंपनियां महिलाओं को नौकरी देने के मामले में अभी भी अनिच्छुक हैं।
- 'हीफॉरशी' संयुक्त राष्ट्र संघ से जुड़ा एक संगठन है। इसकी हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट का कहना है कि बैंकिंग और फाइनेंस जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में तेजी से बढ़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र में महिलाएं का प्रदर्शन भी बेहतर है।
- अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में कार्यरत 1,332 कर्मचारियों पर एक सर्वे किया गया। इससे यह नतीजा निकला कि महिलाओं में ऐसे खास गुण होते हैं जो उन्हें प्रबंधन के क्षेत्र में काफी मदद करते हैं जिससे वे एक बेहतर मैनेजर साबित होती हैं। वहीं भूमंडलीकरण के दौर में महिलाओं को पहले की तुलना में ज्यादा मौके भी मिले हैं।
यह तीनों रिपोर्ट व्यावसायिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी की अलग-अलग तस्वीर पेश करती हैं। टीम लीज के अनुसार महिलाओं की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है और वह अब भी पिछड़ी हुई हैं।
रिसर्चर्स एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूशन की रिपोर्ट बताती है कि देशभर में 2.8 लाख वैज्ञानिक, इंजीनियर और टेक्नोलॉजिस्ट हैं, जिसमें महज 14 फीसदी ही महिलाएं हैं। वहीं अलग-अलग शैक्षणिक संस्थानों में सिर्फ 25 फीसदी महिलाएं ही कार्यरत हैं, जो विज्ञान से जुड़े विषय पढ़ा रही हैं।
आंकड़े बताते हैं कि साल 2017 में आईआईटी की अलग-अलग शाखाओं में फैलोशिप के लिए किए गए आवेदनों में महिलाओं की संख्या सिर्फ 10 फीसदी थी। जबकि फैलोशिप के लाभार्थियों में वे सिर्फ पांच फीसदी थीं। हालांकि कई ऐसे सेक्टर हैं जहां महिलाओं की स्थिति में बेहतरी हुई है।
हीफॉरशी की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के कार्यरत संख्याबल में पुरुष कर्मचारी 60 फीसदी है वहीं इनमें महिलाओं की हिस्सेदारी 40 फीसदी है।
कंपनियों में कार्यरत वरिष्ठ पदों पर पुरुष 73 फीसदी हैं तो वहीं इनमें 27 फीसदी महिलाएं हैं। बोर्ड में जहां 71 फीसदी पुरुष हैं तो महिलाएं 29 फीसदी हैं। हालांकि कुछ ऐसी कंपनियां भी हैं जहां महिलाओं की मौजूदगी 59 फीसदी तक है। स्वास्थ्य और शिक्षा ऐसे क्षेत्र हैं जहां महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक है।
शहरों की तुलना में गांवों की स्थिति बदली
साल 2019 में फॉर्च्यून-500 कंपनियों में सिर्फ 33 कंपनियों की कमान महिलाओं के हाथों में है। भारत में काम करनेवाले पुरुषों की तुलना में सिर्फ 24 फीसदी महिलाएं ही कार्यबल का हिस्सा बन पाई हैं। शहरों की तुलना में गांवों की तस्वीर कुछ बदल गई है। शहरों में जहां 75.3 फीसदी पुरुषों के मुकाबले 14.7 फीसदी महिलाएं ही घर से बाहर निकल कर काम पर जाती हैं, वहीं गांवों में महिलाएं 34.8 फीसदी की दर से पुरुषों के साथ काम करने लगी हैं।
महिलाओं के नौकरी करने में कानून अड़चनें
विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के कई देशों में महिलाओं की आर्थिक तरक्की में कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इसके चलते वे कुछ नौकरियां नहीं कर पातीं, उन्हें अपने खर्च में कटौती करनी पड़ती है और उन्हें हिंसा का भी शिकार होना पड़ता है।
हाल ही में विश्व बैंक समूह के अध्यक्ष जिम योंग किम ने 'महिला, कारोबार और कानून' संबंधी एक रिपोर्ट जारी की। एक सर्वे कराया गया था जिसमें महिलाओं की नौकरी और ऐसे कानूनों की समीक्षा की गई जो महिलाओं के उद्यमी बनने के राह को मुश्किल बनाते हैं। इसके नतीजे बताते हैं कि 173 में से 100 अर्थव्यवस्थाओं में महिलाओं को नौकरी करने के लिए कई समस्याओं से जूझना पड़ता है।
किस क्षेत्र में हैं महिलाएं
रिपोर्ट का कहना है कि महिलाओं की भागीदारी स्वास्थ्य और शिक्षा के बाद बैंकिंग सेक्टर में काफी बढ़ी है। ट्रेवल एंड हॉस्पिटेलिटी, बीपीओ में भी महिलाओं की दिलचस्पी बढ़ी है। जबकि ऑटोमोबाइल क्षेत्र और इंजीनियरिंग उनकी पसंद की सूची में बहुत नीचे पायदान पर हैं।
- शिक्षा और स्वास्थ्य
- बैंकिग, फाइनेंस सर्विस एंड इंश्योरेंस
- बीपीओ और आईटी
- ट्रेवल एंड हॉस्पिटेलिटी
महिलाओं को क्षेत्र भी करता है प्रभावित
महिला कर्मचारियों की उपस्थिति को क्षेत्र भी प्रभावित करता है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में महिलाओं की मौजूदगी सबसे ज्यादा है तो इंजीनियरिंग और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में सबसे कम। हालांकि महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने के लिए शासन और कारोबारी जगत में कई ऐसे बदलाव किए जा रहे हैं, जिससे महिलाओं की उपस्थिति बढ़े। मातृत्व अवकाश और क्रेच (बालवाड़ी) जैसी सुविधाएं भी ऐसे ही प्रयासों का हिस्सा हैं।
डायरेक्ट सेल्स में भी महिलाएं सफल
डायरेक्ट सेल्स के क्षेत्र में भी महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में ज्यादा है और वह इसमें सफल भी हैं। इंडस्ट्रियल सर्विस ऑफ अमेरिका के मुताबिक 4,772 करोड़ रुपये के भारतीय सेल्स इंडस्ट्री में तकरीबन 60 लाख डायरेक्ट सेल्स पर्सन कार्यरत हैं, जिसमें साल 2013-14 में महिलाओं की उपस्थिति 58.3 फीसदी रही है। साल 2025 तक यह आंकड़ा आठ फीसदी तक बढ़ सकता है।
भारत की जीडीपी में भी कम हिस्सेदारी
विश्वभर के देशों की जीडीपी में महिलाओं की हिस्सेदारी 37 फीसदी है। अमेरिका में 45, चीन में 41, लैटिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 33, और अफ्रीकी देशों की जीडीपी में महिलाओं की हिस्सेदारी 39 फीसदी है। जबकि भारत की कुल जीडीपी में महिलाओं का योगदान करीब 17 फीसदी है।
नियमों का पालन नहीं हो रहा
देश के बाजार नियामक सेबी ने साल 2014 में स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध सभी कंपनियों के लिए अपने बोर्ड में कम से कम एक महिला निदेशक रखना अनिवार्य कर दिया था। इस फैसले को लेकर भारतीय उद्योग जगत में काफी सरगर्मियां देखी गई। बहुत सी कंपनियों ने अपने प्रमोटरों की महिला रिश्तेदारों को ही नियुक्त कर दिया। लेकिन आकड़ों की मानें तो अब तक करीब 180 कंपनियों में नियमों की अवहेलना की जा रही है।
हालांकि महिलाओं की बेहतरी को ध्यान में रखकर शुरू की गई योजनाओं और सुविधाओं के चलते आने वाले कुछ सालों में बेहतर नतीजें देखने को मिल सकते हैं। पदों पर भर्ती लिंगभेद के बजाए योग्यता के आधार पर होगी।