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राजनीति में अपने ही चेले की चाल नहीं समझ सके सोनिया के रणनीतिकार पटेल

Tue, 08 Aug 2017 06:14 PM IST
amarujala.com- Written by : हरेन्द्र सिंह मोरल
amarujala.com- Written by : हरेन्द्र सिंह मोरल Updated Tue, 08 Aug 2017 06:14 PM IST
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With the support of ahamad patel bjp candidate balwant singh rajput entered politics

गुजरात की तीन सीटों के लिए हुए राज्यसभा चुनाव में जिस सीट के लिए सबसे ज्यादा मारामारी मची है वो है तीसरी सीट। भाजपा के संख्याबल के सहारे दो सीटों पर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री स्मृति का जीतना तय है लेकिन कांग्रेस की दावेदारी वाली तीसरी सीट पर पेंच फंस गया है।

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जिसमें मुकाबला सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल और चुनाव से कुछ पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए बलवंत सिंह राजपूत के बीच है। सीमित संख्या बल के सहारे अहमद पटेल को राज्यसभा में पहुंचाने की जद्दोजहद में लगी कांग्रेस की राह में सबसे बड़ा रोडा वही राजपूत बन गए हैं जिन्हें खुद अहमद पटेल ने राजनीति में आगे बढ़ाया।
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अरबों की संपति के मालिक राजपूत भाजपा के 20 विधायकों के अलावा कांग्रेस के बागी और अन्य दलों के विधायकों के सहारे पटेल को टक्कर दे रहे हैं। राजपूत को हाल ही में कांग्रेस छोड़ने वाले पार्टी के दिग्‍गज नेता शंकर सिंह वाघेला का करीबी भी माना जाता है। जानिए पटेल को टक्कर देने वाले राजपूत का पूरा सफरनामा।

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पटेल के सहारे राजपूत ने की थी राजनीति में अपनी शुरूआत

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बलवंत सिंह राजपूत ने अपनी चुनावी राजनीति की शुरूआत साल 2007 में सिद्धपुर पाटन सीट से की थी। उस समय उन्होंने अपनी कुल संपत्ति 34 करोड़ बताई थी। सोनिया गांधी के रणनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की उंगलियां थामके राजनीति में आए बलवंत सिंह ने शुरूआत से ही खुद को पटेल की छत्रछाया में समर्पित कर दिया।

पटेल दिल्‍ली रहते तो गुजरात में उनकी सारी राजनी‌तिक गतिविध राजपूत के जिम्मे ही रहती थी। इस वजह से उन्हें पटेल का दायां हाथ माना जाता था। राजपूत पर अहमद पटेल का भरोसा इस कदर था कि कांग्रेस छोड़ने से पहले भी वह पटेल से मिलकर गए थे हालांकि उस दौरान उन्होंने अपने फैसले की कानोंकान खबर किसी को नहीं लगने दी।

इसके बाद लगातार दो दिनों तक राजपूत का फोन बंद जाता रहा और फिर भाजपा में शामिल होने की उनकी घोषणा से ही सबको उनके पार्टी बदलने की खबर लगी। कहा जाता है कि पटेल ने राजपूत को आगे बढ़ाने में पूरा योगदान दिया, राजनीतिक रूप से ही नहीं व्यक्तिगत रूप से भी। इस दौरान राजपूत की संपत्ति भी दिन दोगुनी रात चौगुनी बढ़ी।

बढ़ते रुतबे के कारण भाजपा ने पटेल की टक्कर में राजपूत को उतारा

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इसका अंदाजा उस समय हुआ जब राजपूत ने साल 2012 के चुनाव में अपना व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल किया, जिसमें उनकी संपत्ति पांच साल पहले के 34 करोड़ से बढ़कर 268 करोड़ पहुंच गई। 12वीं पास राजपूत ने कई जगह अपना व्यापार बढ़ाया और खूब संपत्ति बनाई।

साल 2017 में जब उन्होंने भाजपा के लिए राज्यसभा सीट से नामांकन किया तो उस समय उनकी संपत्ति 323 करोड़ तक पहुंच गई। ये पटेल से नजदीकियों का ही असर रहा कि कभी गांव में किराने की छोटी सी दुकान चलाने वाले राजपूत दो दशक में ही अरबों की संपत्ति के मालिक बन बैठे। दौलत के साथ ही राजपूत ने राजनीतिक रुतबा भी खूब बढ़ाया, पटेल के अलावा उनकी नजदीकी दिग्‍गज कांग्रेसी नेता शंकर सिंह वाघेला से भी रही।

 

वाघेला को उनका रिश्तेदार बताया जाता है। यही कारण रहा कि वाघेला की कांग्रेस से विदाई के साथ ही भाजपा की निगाहें राजपूत पर टिक गई थी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के इशारे के बाद राज्य के भाजपा नेतृत्व ने बलवंत सिंह राजपूत पर डोरे डालने शुरू कर दिए थे। जल्द ही उसे कामयाबी भी मिली और राज्यसभा सीट के ऑफर पर बलवंत सिंह ने तुरंत पाला बदल लिया। चुनावों में उनकी टक्कर भी उसी व्यक्ति से हुई जो उन्हें चुनावों में लेकर आया था।

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