फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Why Scindia group uncomfortable with responsibility given to Tomar, is he not getting INC atmosphere in BJP

MP: तोमर को मिली जिम्मेदारी से सिंधिया गुट क्यों है असहज, क्या कांग्रेस जैसा माहौल भाजपा में नहीं मिल रहा

Sat, 05 Aug 2023 03:37 PM IST
शक्तिराज सिंह अमर उजाला, डिजिटल ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला, डिजिटल ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: शक्तिराज सिंह Updated Sat, 05 Aug 2023 03:37 PM IST
सार

केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की नियुक्ति को ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए झटका भी माना जा रहा है। इसके दो कारण हैं। पहला तो तोमर को सिंधिया का राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना जाता है। दूसरा यह भी कि केंद्रीय मंत्री सिंधिया की तरह तोमर भी ग्वालियर-चंबल क्षेत्र से आते हैं।

विज्ञापन
Why Scindia group uncomfortable with responsibility given to Tomar, is he not getting INC atmosphere in BJP
ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरेंद्र सिंह तोमर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

मध्य प्रदेश में साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने चुनावी बिसात बिछाना शुरू कर दी है। प्रदेश के हर क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए अलग से रणनीति बनाई जा रही है। गृहमंत्री अमित शाह ने खुद प्रदेश के चुनाव प्रबंधन की कमान अपने हाथों में ले रखी है। दिल्ली से लेकर राजधानी भोपाल तक उन्होंने खुद मोर्चा संभाल लिया है। इस बीच हाईकमान ने क्षत्रपों को कंट्रोल करना शुरू कर दिया है। चुनाव प्रबंधन समिति के संयोजक की जिम्मेदारी केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को देकर हाईकमान ने साफ कर दिया है कि इन चुनावों में वही होगा जो दिल्ली दरबार चाहेगा। मोदी-शाह के करीबी तोमर की इस नियुक्ति ने न केवल सिंधिया बल्कि कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और नरोत्तम मिश्रा जैसे तमाम क्षत्रपों को एक झटका लगा है। क्योंकि ये नेता इस बड़ी जिम्मेदारी के लिए आतुर नजर आ रहे थे।  तोमर के जरिए भाजपा हाईकमान सीधे मध्यप्रदेश के घटनाक्रमों पर नजर रख सकेगा।
विज्ञापन


केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की नियुक्ति को ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए झटका भी माना जा रहा है। इसके दो कारण हैं। पहला तो तोमर को सिंधिया का राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माना जाता है। दूसरा यह भी कि केंद्रीय मंत्री सिंधिया की तरह तोमर भी ग्वालियर-चंबल क्षेत्र से आते हैं। पार्टी चुनाव संबंधित समितियों में इस क्षेत्र से और कितने नेताओं को जगह देगी, यह फिलहाल स्पष्ट नहीं है। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तमाम सर्वे में ग्वालियर-चंबल में बीजेपी की हालत कमजोर बताई जा रही है। इसके अलावा सिंधिया के लिए सबसे बड़ी समस्या है कि, अहम मौकों पर पार्टी के पुराने नेता उनके खिलाफ अक्सर गोलबंद हो जाते हैं। स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान यह देखने को मिला था। सर्वे रिपोर्ट के आधार पर यह आशंका जताई जा रही है कि सिंधिया-समर्थक विधायक और मंत्रियों के टिकट कट सकते हैं। ऐसे में सिंधिया के लिए आने वाले दिनों में मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
विज्ञापन


सरकार से लेकर संगठन तक में रखा गया सिंधिया समर्थकों का ध्यान
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों को बीजेपी में शामिल हुए करीब तीन साल हो गए हैं, वापस चुनाव आ गए हैं। ग्वालियर-चंबल में भाजपा के पुराने नेता सिंधिया समर्थकों को अपना नहीं पाए हैं। भाजपा ने अपने पुराने नेताओं को तरजीह न देते हुए सिंधिया समर्थकों को न केवल अहम जिम्मेदारी दी है, बल्कि उन्हें कई समितियों और मंडल में जगह भी दी है।
विज्ञापन
विज्ञापन


सिंधिया के सवाल पर प्रदेश के राजनीति के जानकारों का कहना है कि सिंधिया को लंबी राजनीति करनी है। वो 2023 के चुनावों में किसी भी पद की शर्त को लेकर या 4-5 उम्मीदवारों के टिकट को लेकर सीधे नेतृत्व की आंखों में खटकने का कोई कदम नहीं उठाएंगे। उनका ध्यान विधानसभा चुनावों के साथ-साथ आगामी लोकसभा चुनावों पर भी है। जहां तक बात उनके समर्थक नेताओं की है तो उन्हें 2020 में पार्टी से जुड़ने के बाद सम्मानित पद दिए गए। जिसे सरकार में जगह नहीं मिली उसे संगठन में जगह दी गई। ऐसा आगे भी जारी रह सकता है। इसी के साथ उन्हें अभी बीजेपी के संगठन को समझना होगा। कांग्रेस जैसा व्यवहार उन्हें बीजेपी में नहीं मिल सकता है।




पार्टी के लिए कमजोर कड़ी बन रहा ग्वालियर-चंबल दुर्ग
सिंधिया और नरेंद्र सिंह तोमर दोनों ही दिग्गज नेता ग्वालियर-चंबल इलाके से आते हैं, लेकिन पार्टी की हालत इस क्षेत्र में काफी खराब नजर आ रही है। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में कुल 34 विधानसभा सीटें हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में 34 में से सबसे ज्यादा 26 सीटें कांग्रेस के खाते में गई थीं। बीजेपी को सिर्फ 7 सीटों पर ही जीत हासिल हुई थी। सिर्फ चंबल की ही बात करें तो यहां की 13 में से 10 सीटों पर कांग्रेस पार्टी की जीत हुई थी। सिंधिया के पार्टी से जुड़ने के बाद भी बीजेपी को कुछ खास फायदा इस इलाके में मिलते नहीं दिखा। बल्कि ग्वालियर निगम की सीट भी बीजेपी के हाथ से फिसल गई। ऐसे में नरेंद्र सिंह तोमर पर अहम जिम्मेदारी मिलने के साथ ये जिम्मेदारी भी होगी कि वो अपने इस इलाके में पार्टी की स्थिति को सुधारें और इस कमजोर दुर्ग को मजबूत करें। आने वाले दिनों में सिंधिया को भी इस इलाके में सक्रिय होने के लिए कहा जा सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed