RSS: आरएसएस के दत्तात्रेय होसबोले ने क्यों उठाया बेरोजगारी-असमानता का मुद्दा?
RSS: आरएसएस के सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर ने बताया कि आरएसएस अपने आनुषांगिक संगठन ‘स्वदेशी जागरण मंच’ के जरिए युवाओं को विभिन्न स्किल ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाता रहा है। कोरोना काल में जब लोग अपनी नौकरियां खो रहे थे और लोगों को अपना घर चलाना मुश्किल हो रहा था, उस समय भी स्वदेशी जागरण मंच ने युवाओं-बेरोजगारों को विभिन्न रोजगार प्राप्त करने में मदद की...
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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने एक कार्यक्रम के दौरान गरीबी और असमानता को बड़ा राक्षस बताया। उन्होंने कहा कि इन समस्याओं से निपटने की आवश्यकता है। आरएसएस में नंबर दो की हैसियत रखने वाले होसबोले के इस बयान के बाद घमासान छिड़ गया। कांग्रेस ने यह बताने की कोशिश की कि राहुल गांधी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान लगातार युवाओं में बेरोजगारी का मुद्दा उठा रहे हैं और लोगों के बीच यह एक बड़ा मुद्दा बनकर उभर रहा है। यही कारण है कि अब संघ को बेरोजगारी जैसे मुद्दे पर भी बोलना पड़ रहा है।
वहीं, कुछ लोगों ने इसे संघ के द्वारा केंद्र सरकार के कार्यों की आलोचना भी बताया। कहा गया कि आरएसएस और केंद्र के बीच मतभेद बढ़ रहा है और यह सीधे-सीधे केंद्र सरकार के कार्यों की आलोचना है। यह केंद्र के उन दावों पर भी प्रहार है जिनमें सरकार ने देश में बड़े विकास करने और युवाओं में बेरोजगारी की समस्या को दूर करने का दावा किया गया था।
इन आरोपों में कितनी सच्चाई है? राहुल गांधी अपनी यात्रा के दौरान लगातार संघ पर हमले कर रहे हैं। क्या यह उसका असर है? या युवाओं के असली मुद्दों को उठाकर आरएसएस उनके बीच ज्यादा स्वीकार्य होना चाहता है? आखिर संघ ने पहली बार विजयादशमी के पर्व पर अपने नागपुर मुख्यालय में किसी महिला को बुलाने के लिए क्यों मजबूर हुआ?
क्या संघ ने पहली बार उठाया बेरोजगारी का मुद्दा?
दरअसल, आरएसएस अब तक प्रचार-प्रसार से दूर रहते हुए समाज के बीच कार्य करने को ही प्राथमिकता देता रहा है। उसके नेता ज्यादातर मीडिया की सुर्ख़ियों में आने से बचते रहे हैं। इसका एक सकारात्मक असर यह हुआ है कि उसके स्वयंसेवकों में मीडिया की सुर्खियां बनने का लोभ कभी पैदा नहीं हुआ। वे केवल अपने कार्य तक सीमित रहे, जिसका बेहतर परिणाम भी मिला। लेकिन इस नीति का एक नकारात्मक परिणाम यह हुआ कि उसके बारे में ज्यादातर लोगों को सही सूचना नहीं मिली। इससे उसके बारे में लोगों ने सुनी-सुनाई बातों पर अपनी धारणाएं बनाईं को कई बार गलत रहीं। रोजगार के मामले में भी यह बात पूरी तरह सही साबित हुई है।
संघ नेता ने बताई असलियत
आरएसएस के सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर ने अमर उजाला को बताया कि आरएसएस अपने आनुषांगिक संगठन ‘स्वदेशी जागरण मंच’ के जरिए युवाओं को विभिन्न स्किल ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाता रहा है। कोरोना काल में जब लोग अपनी नौकरियां खो रहे थे और लोगों को अपना घर चलाना मुश्किल हो रहा था, उस समय भी स्वदेशी जागरण मंच ने युवाओं-बेरोजगारों को विभिन्न रोजगार प्राप्त करने में मदद की। आदिवासी कल्याण आश्रम और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् जैसे अन्य आनुषांगिक संगठनों के द्वारा भी इसी तरह के कार्यक्रम चलाए गये जिनका अच्छा असर देखने को मिला।
इन संगठनों ने अपने स्तर पर भी लोगों को छोटे-छोटे कर्ज उपलब्ध करवाकर उन्हें स्वरोजगार सृजन के लिए प्रेरित किया। साथ ही, केंद्र-राज्य सरकारों के द्वारा उपलब्ध कराई जा रही योजनाओं को भी लोगों तक पहुंचाने में मदद की गई। संघ अपने स्वयंसेवकों को भी उन क्षेत्रों में जाने के लिए मदद उपलब्ध कराता है, जिनमें जाने में उनकी रूचि रहती है। इस प्रकार रोजगार का विषय संघ के लिए नया नहीं है। दत्तात्रेय होसबोले के जिस बयान पर खूब चर्चा हो रही है, वह बयान भी स्वदेशी जागरण मंच के ही एक वेबिनार कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किया गया।
जहां तक बेरोजगारी का मुद्दा उठाकर युवाओं के बीच ज्यादा स्वीकार्य होने की बात है, संघ का विकास ही शाखाओं के जरिये हुआ है जहां बच्चे और युवा ही सबसे ज्यादा भाग लेते हैं। अब तक की संघ की यात्रा में युवाओं ने ही सबसे ज्यादा भूमिका निभाई है, ऐसे में यह कहना सही नहीं है कि संघ अब युवाओं को ध्यान में रखते हुए बदलने की कोशिश कर रहा है।
महिलाओं का होता रहा है सम्मान
इसी प्रकार आरएसएस के मुख्यालय में विजयादशमी पर आयोजित होने वाले संघ के सबसे प्रमुख कार्यक्रम में इस बार पर्वतारोही संतोष यादव को सम्मानित करने के लिए बुलाया गया है। संघ मुख्यालय में किसी महिला को बुलाने का यह पहला अवसर है। कहा जा रहा है कि संघ में महिलाओं का उचित सम्मान न होने के आरोपों के चलते ही संगठन को यह कदम उठाना पड़ा है।
लेकिन संघ के जानकारों का कहना है कि यह आरोप सही नहीं हैं। संघ के आनुषांगिक संगठन राष्ट्र सेविका समिति में महिलाओं को अपना योगदान देने का पूरा अवसर दिया जाता है। इसके माध्यम से भारी संख्या में महिलाएं राष्ट्र-समाज निर्माण में अपना योगदान देती रही हैं। आरएसएस के विभिन्न कार्यक्रमों में पहले भी महिलाओं को अध्यक्ष और अतिथि के रूप में बुलाया जाता रहा है और इसकी एक लंबी परंपरा रही है। हालांकि, यह सही है कि नागपुर के विजयादशमी कार्यक्रम पर पहली बार किसी महिला को सम्मान देने के लिए बुलाया गया है।
केंद्र-संघ में भी बेहतर तालमेल
भाजपा के एक शीर्ष नेता के मुताबिक़, विपक्षियों के द्वारा संघ और केंद्र में मतभेद होने के समाचार समय-समय पर चलाए जाते रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत और पीएम नरेंद्र मोदी के बीच बेहतर तालमेल बना हुआ है। अनुच्छेद 370 के विवादित प्रावधानों की समाप्ति, अयोध्या में भव्य राममंदिर निर्माण और तीन तलाक जैसे जिन मुद्दों को संघ राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक समझता रहा है, केंद्र सरकार उन कार्यों को लगातार पूरा कर रही है।
दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को विकास की मुख्यधारा में आगे लाने और समाज में बेहतर सामंजस्य बनाने के लिए अल्पसंख्यकों को साथ लाने जैसे अहम मुद्दों पर भी संघ और सरकार के कार्यों में बेहतर तालमेल दिख रहा है। दोनों ही अपने-अपने स्तर पर इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए प्रयास कर रहे हैं और इसमें एक दूसरे के सहयोगी साबित हो रहे हैं। ऐसे में दोनों के बीच मतभेद की बात किसी भी तरह सही नहीं है।
जमीनी मुद्दे उठाना ही संघ की विशेषता
राजनीतिक टिप्पणीकार सुनील पांडेय ने कहा कि अपने जन्म के समय से ही आरएसएस की यह विशेषता रही है कि वह समय-समय पर उन मुद्दों को लगातार उठाता रहा है जो राष्ट्र-समाज के निर्माण के लिए आवश्यक होते हैं। राम मंदिर का मुद्दा हो या कश्मीर की समस्या, संघ ने लोगों की नब्ज समझा और इन मुद्दों पर समाज को अपने साथ लाने की मुहीम शुरू की। उसे अपने प्रयास में सफलता भी मिली।
आज जब देश में अमीरी-गरीबी की खाई लगातार बढ़ रही है, समाज के एक वर्ग में असंतोष बढ़ रहा है, उसने आगे आकर केंद्र सरकार को यह संदेश देने की कोशिश की है कि यह दिशा गलत है और इसे ठीक किये जाने की जरूरत है। आज जब केंद्र की नीतियों के विरुद्ध पार्टी संगठन या विपक्ष कहीं से भी ठोस आवाज नहीं उठ रही है, संघ की यह टिप्पणी स्वागत योग्य है। लेकिन यह टिप्पणी यह किसी के विरुद्ध नहीं है, बल्कि यह संघ के सपनों के भारत को स्थायी धरातल प्रदान करने के लिए जमीन निर्माण की कोशिश ज्यादा लगती है जिससे उसे एक स्थायित्व प्रदान किया जा सके। संघ की इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए।