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केरल हाईकोर्ट के जज ने पूछा, 'मुस्लिम महिलाएं चार पति क्यों नहीं रख सकती'
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
Updated Mon, 07 Mar 2016 02:12 PM IST
सार
- 'आखिर मुस्लिम महिलाएं चार पति क्यों नहीं रख सकती'
- केरल हाईकोर्ट के जज ने की टिप्पणी
- 'मुस्लिम पुरुषों को खास रियायत क्यों'
- NGO के कार्यक्रम में हाईकोर्ट के जज ने की शिरकत
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विस्तार
मुस्लिम महिलाओं की स्थिति को लेकर केरल हाईकोर्ट के जज जस्टिस बी कमल पाशा ने अहम टिप्पणी की है।
जस्टिस पाशा ने सवाल किया है कि आखिर मुस्लिम महिलाएं चार पति क्यों नहीं रख सकती जबकि मुस्लिम पुरुषों को मुस्लिम पर्सनल लॉ से विशेषाधिकार मिला है। उन्हें इस मामले में रियायत दी गई है।
कोझिकोड में महिला वकीलों द्वारा चलाए जा रहे एक एनजीओ की ओर से आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए पाशा ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ महिलाओं के खिलाफ है।
उन्होंने कहा कि मुस्लिम कानून में पुरुषों के वर्चस्व के लिए धार्मिक प्रमुख जिम्मेदार हैं। उन्हें ऐसे संवेदनशील मुद्दों को आपसी बातचीत और आत्मविश्लेषण से दूर करना चाहिए।
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जस्टिस पाशा ने सवाल किया है कि आखिर मुस्लिम महिलाएं चार पति क्यों नहीं रख सकती जबकि मुस्लिम पुरुषों को मुस्लिम पर्सनल लॉ से विशेषाधिकार मिला है। उन्हें इस मामले में रियायत दी गई है।
कोझिकोड में महिला वकीलों द्वारा चलाए जा रहे एक एनजीओ की ओर से आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए पाशा ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ महिलाओं के खिलाफ है।
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उन्होंने कहा कि मुस्लिम कानून में पुरुषों के वर्चस्व के लिए धार्मिक प्रमुख जिम्मेदार हैं। उन्हें ऐसे संवेदनशील मुद्दों को आपसी बातचीत और आत्मविश्लेषण से दूर करना चाहिए।
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हाईकोर्ट के जज ने की टिप्पणी
मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत एक पुरूष चार बार शादी कर सकता है। ये केवल भारत में ही जारी है, जबकि कई मुस्लिम देशों ने बहु-विवाह को बंद कर दिया है।
मुस्लिम धर्म गुरुओं को इस मामले में आत्म विश्लेषण करना चाहिए, ना कि ऐसे मामलों में एकतरफा फैसला सुनाया जाए। लोगों को भी ऐसे मामले को समझना चाहिए।
उन्होंने कहा कि महिलाओं को कुरान में निहित अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया है। पाशा ने आगे कहा कि एक समान नागरिक संहिता का विरोध करना भी अनुचित है।
उन्होंने बताया कि इस मामले में देश की सर्वोच्च अदालत भी हस्तक्षेप करने के लिए अनिच्छुक है। ऐसे मामलों में महिलाओं को ही आगे आना चाहिए और इस अन्याय को समाप्त करने के लिए आवाज उठानी होगी।
मुस्लिम धर्म गुरुओं को इस मामले में आत्म विश्लेषण करना चाहिए, ना कि ऐसे मामलों में एकतरफा फैसला सुनाया जाए। लोगों को भी ऐसे मामले को समझना चाहिए।
उन्होंने कहा कि महिलाओं को कुरान में निहित अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया है। पाशा ने आगे कहा कि एक समान नागरिक संहिता का विरोध करना भी अनुचित है।
उन्होंने बताया कि इस मामले में देश की सर्वोच्च अदालत भी हस्तक्षेप करने के लिए अनिच्छुक है। ऐसे मामलों में महिलाओं को ही आगे आना चाहिए और इस अन्याय को समाप्त करने के लिए आवाज उठानी होगी।