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आखिर क्यों है स्मृति पर मोदी को इतना भरोसा?

Sat, 04 Jun 2016 01:17 PM IST
नितिन श्रीवास्तव/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
नितिन श्रीवास्तव/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली Updated Sat, 04 Jun 2016 01:17 PM IST
सार

  • दो वर्ष बीत चुके हैं और स्मृति इरानी ने तब से पीछे मुड़कर नहीं
  • विवादों में घिरी स्‍मृति पर मोदी ने क्या रुख अपनाया

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Why Modi showing this much faith on Smriti Irani?
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्‍मृति ईरानी - फोटो : amar ujala

विस्तार

बात 2014 के आम चुनावों की है और मैं स्मृति इरानी की एसयूवी में पीछे बैठकर एक चुनावी सभा में पहुंचने वाला था। उन्होंने एकाएक पीछे मुड़कर कहा, "अभी देखते जाओ।  यहां चुनाव कैंपेन का इतिहास बदल देंगे।" इसके दो हफ्ते बाद गौरीगंज, अमेठी में एक चुनावी सभा खत्म होते ही इंटरव्यू के इंतजार में उनकी गाड़ी में बैठा ही था कि स्मृति बोलीं, "मोदी जी आ रहे हैं यहां राहुल के खिलाफ कैंपेन करने।" मुझे थोड़ा ताजुब्ब हुआ।

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आमतौर पर और खासकर पुराने दौर में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार विपक्षी के बराबरी के उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव प्रचार नहीं किया करते थे। हालांकि ये भी सच है कि राहुल गांधी कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार नहीं थे। स्मृति की बात सौ आने सच निकली। पांच मई को पांच बजे अमेठी में चुनाव प्रचार खत्म होना था और चार बजे के मोदी का हैलीकॉप्टर मुंशीगंज के उस गेस्ट हाउस से थोड़ी दूर ही उतरा जहां राजीव, संजय, सोनिया, प्रियंका और राहुल गांधी दशकों से रुकते रहे हैं।
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दो वर्ष बीत चुके हैं और स्मृति इरानी ने तब से पीछे मुड़कर नहीं देखा है। एक जमाने में मोदी का विरोध और बाद में उससे इंकार कर चुकीं इरानी इस समय की सरकार के कोर ग्रुप में गिनीं जाती हैं। 

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विवादों में घिरी स्‍मृति पर मोदी ने क्या रुख अपनाया?

Why Modi showing this much faith on Smriti Irani?
विवादों में घिरी स्‍मृति

2004 और 2014 में चांदनी चौक और अमेठी से लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद वे आज भारत की एचआरडी मंत्री हैं और नरेंद्र मोदी की नीतियों की 'पुरजोर' हिमायती भी। भाजपा के लोग बताते हैं कि कैबिनेट बैठकों में स्मृति की बात बराबर से सुनी जाती है।

गौर इस पर भी किया जाना चाहिए कि गुजरात से राज्यसभा सांसद स्मृति के मंत्रिपद के दो साल कितने विवादास्पद रहे हैं। अपनी ग्रैजुएशन की डिग्री और फिर उसके बाद अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी में किया हुआ कथित कोर्स हो या एचआरडी मंत्रालय और संस्थाओं में आरएसएस बैकग्राउंड से जुड़े लोगों का चयन। टीचर्स डे यानि शिक्षक दिवस को 'गुरु उत्सव' नाम से मनाने की पहल या फिर देशभर के स्कूलों में नरेंद्र मोदी का बच्चों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए दिया गया भाषण हो। आईआईटी दिल्ली के निदेशक का इस्तीफा हो या मंत्रालय से दिल्ली विश्वविद्यालय के तत्कालीन वाइस चांसलर दिनेश सिंह के खिलाफ कारण बताओ नोटिस। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वीसी से तनातनी या फिर जेएनयू कैंपस में कथित हेट स्पीच को लेकर मचा बवाल। हां, संसद में मायावती से हुई एक बहस के बाद स्मृति को अपने वाक्यों पर सफाई देनी पड़ी।

बड़ा सवाल यही है कि अपने सभी मंत्रियों पर 'पैनी नजर' रखने वाले पीएम नरेंद्र मोदी ने आखिर स्मृति इरानी से जुड़े तमाम विवादों पर क्या रुख अपनाया है? खबरें हैं कि उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों के लिए भी इन दिनों स्मृति का नाम पार्टी में चर्चा में है। हालांकि भाजपा के भीतर के लोग बताते हैं कि 'मामले पर अभी सभी स्टेकहोल्डरों से बातचीत चल रही है, तय कुछ भी नहीं हुआ है।' अगर भाजपा नेतृत्व स्मृति इरानी को यूपी में बतौर सीएम उम्मीदवार उतारता है तो उनका कद शायद प्रदेश के दूसरे कद्दावर नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों में अचानक से और ऊपर चढ़ेगा और ये तो जगजाहिर है कि इस समय पार्टी की 'बागडोर' नरेंद्र मोदी और मौजूदा अध्यक्ष अमित शाह के हाथों में है, और सभी बड़े 'फैसले' उन्हीं के होते हैं। 

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