चीन के मामले में क्यों अमेरिकी मध्यस्थता के खिलाफ खड़ा है भारत? रक्षा विशेषज्ञ ने बताया राज
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भारत के बाद अब चीन ने भी अमेरिकी मध्यस्थता के पेशकश को ठुकरा दिया है। मालूम हो की भारत और चीन के बीच पिछले कुछ समय से सीमा पर तनाव चल रहा है, जिसे लेकर अमेरिका ने दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की पेशकश की थी। जहां तक भारत की बात है, तो वह नहीं चाहता कि इस मामले पर नरमी दिखा कर वह चीन के साथ मोर्चे पर खुद के कमजोर होने का संदेश दे। भारत ने मध्यस्थता की पेशकश को ठुकरा कर चीन के उस शक को भी खत्म कर दिया है, जहां ड्रैगन को आशंका थी कि भारत, अमेरिका के साथ मिल कर उसके खिलाफ मोर्चाबंदी कर रहा है। ऐसे में जहां तक सीमा पर विवाद का सवाल है तो भारत ने डोकलाम की तरह ही अपने रुख पर डटे रहने की रणनीति बनाई है।
उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक मध्यस्थता की पेशकश इसी साल चुनाव का सामना करने जा रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अपनी छवि बनाने की रणनीति का हिस्सा थी। भारत ऐसे मामले में मध्यस्थता की पेशकश स्वीकार करना तो दूर इस पर नरमी दिखाने की भी स्थिति में नहीं है। ऐसा करने पर भारत के चीन के मोर्चे पर घबराने और कमजोर पड़ने का संदेश जाएगा। वैसे भी ऐसे विवादों में मध्यस्थता की पेशकश स्वीकार करने वाले देश कमजोर होते हैं। मसलन कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान लगातार मध्यस्थता कराने की जुगत में भिड़ा रहता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन भय का वातावरण पैदा कर दूसरे देशों को दबाव में लाने की रणनीति अपनाता रहा है। डोकलाम के मामले में भी ऐसा ही हुआ। इस विवाद की मुख्य जड़ भारत की अपनी सीमा पर सड़क-पुल निर्माण जैसी ठोस रणनीतिक तैयारियां हैं। चीन चाहता है कि भारत दबाव में आ कर इन निर्माण कार्यों को रोके जिससे उसे सीमा पर हमेशा की तरह बढ़त मिलती रहे।