{"_id":"6a96a3b32548a54fe9051f04","slug":"india-gdp-growth-rate-april-june-quarter-q1-iran-us-conflict-west-asia-crisis-monsoon-el-nino-economic-growth-2026-09-01","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"एक्सप्लेनर: ईरान युद्ध, महंगे तेल और अल-नीनो के बावजूद कैसे मजबूत हुई भारत की अर्थव्यवस्था? 5 सवालों में समझें","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
एक्सप्लेनर: ईरान युद्ध, महंगे तेल और अल-नीनो के बावजूद कैसे मजबूत हुई भारत की अर्थव्यवस्था? 5 सवालों में समझें
Tue, 01 Sep 2026 03:37 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 01 Sep 2026 03:37 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
Please wait...
भारतीय जीडीपी कैसे एक साल में कैसे तेजी से बढ़ी।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
भारतीय अर्थव्यवस्था 2026 की अप्रैल-जून तिमाही में दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ने वाली प्रमुख आर्थिक शक्ति के तौर पर उभरी है। सरकार की ओर से जारी डेटा के मुताबिक, भारत की जीडीपी में इस दौरान 7.8 फीसदी की विकास दर दर्ज की गई, जो कि अलग-अलग संस्थाओं की भारत के लिए अनुमानित विकास दर से भी ज्यादा रहा।भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए जीडीपी का इस दर से बढ़ना इसलिए भी अहम है, क्योंकि इस वक्त पूरी दुनिया में उथल-पुथल का माहौल है। भारत के पड़ोस में ही स्थितियां काफी संवेदनशील हैं। फिर चाहे अमेरिका-ईरान युद्ध की वजह से पूरे पश्चिम एशिया की बिगड़ती स्थिति और उसके भारत पर नकरात्मक प्रभाव की बात हो या कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, खाड़ी देशों से एलपीजी-एलएनजी की बढ़ती अनुपलब्धता की बात हो या अमेरिका की तरफ से एक के बाद एक टैरिफ लगाने और इसे बढ़ाने की धमकी की। भारत ने इन सब चुनौतियों से टकराते हुए 7.8 फीसदी की आर्थिक विकास दर बनाई है, जो कि अपने आप में अहम है।
आइये पांच सवाल-जवाब में जानते हैं कि भारत के लिए बीते कुछ महीनों में स्थितियां कितनी मुश्किल रहीं? इसके बावजूद कैसे देश की आर्थिक विकास दर बढ़ रही है? सरकार के कौन से कदम इसमें सहायक साबित हुए हैं? विशेषज्ञों की भारत की जीडीपी विकास दर पर क्या राय है? और आखिर में यह इतनी बड़ी बात क्यों है? आइये जानते हैं...
बीते कुछ महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बाहरी और घरेलू दोनों ही मोर्चों पर परिस्थितियां काफी चुनौतीपूर्ण और मुश्किल रही हैं।
ये भी पढ़ें: 'दिख रहे सुधारों के नतीजे': भारत की जीडीपी ग्रोथ पर बोलीं सीतारमण, कहा- वैश्विक चुनौतियों के बीच मिली उपलब्धि
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बीते महीनों में स्थितियां कितनी मुश्किल रहीं?
बीते कुछ महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बाहरी और घरेलू दोनों ही मोर्चों पर परिस्थितियां काफी चुनौतीपूर्ण और मुश्किल रही हैं।
ये भी पढ़ें: 'दिख रहे सुधारों के नतीजे': भारत की जीडीपी ग्रोथ पर बोलीं सीतारमण, कहा- वैश्विक चुनौतियों के बीच मिली उपलब्धि
1. पश्चिम एशिया संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा का झटका
भारतीय अर्थव्यवस्था पर ईरान युद्ध और महंगे तेल का संकट पैदा हुआ।
- फोटो :
अमर उजाला
इस वैश्विक ऊर्जा संकट ने देश की वास्तविक खरीद शक्ति को सीधे तौर पर प्रभावित किया।
2. लागत में भारी बढ़ोतरी और महंगाई का दबाव बना
- पश्चिम एशिया संकट के कारण विनिर्माण क्षेत्र में कच्चे माल की लागत में 25.3% और बिजली व ईंधन खर्च में 19.3% की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई। इनपुट की कीमतें आउटपुट कीमतों की तुलना में बहुत तेजी से बढ़ीं, जिससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव पड़ा।
- घरेलू मोर्चे पर खुदरा महंगाई लगातार नौ महीनों तक बढ़ते हुए जुलाई में 4.45% पर पहुंच गई। इसके अतिरिक्त, पूरी तिमाही में थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर आधारित महंगाई दर लगभग 10% के करीब बनी रही।
3. कमजोर मानसून और कृषि क्षेत्र में मंदी
- अल नीनो के कड़े प्रभाव के कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून काफी असमान रहा और यह मौसमी औसत से 14% कम दर्ज किया गया।
- कमजोर मानसून का सीधा असर खेती पर पड़ा, जिससे कृषि क्षेत्र की विकास दर पिछले साल के 4.4% से घटकर केवल 3.6% रह गई। इससे खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ने और ग्रामीण मांग पर असर पड़ने का खतरा पैदा हो गया है।
4. सरकारी खजाने और केंद्रीय बैंक पर वित्तीय बोझ
- बढ़ती वैश्विक कीमतों के बावजूद आम जनता को राहत देने के लिए सरकार ने पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को अप्रत्याशित नहीं बढ़ने दिया, जिसका घाटा सरकारी तेल कंपनियों को उठाना पड़ा।
- उपभोक्ताओं को बचाने के लिए सरकार को खाद्य, उर्वरक और पेट्रोलियम पर दी जाने वाली अपनी प्रमुख सब्सिडी को 37.4% तक बढ़ाना पड़ा, जिसमें उर्वरक सब्सिडी अकेले 57.6% बढ़ी।
- इसके अलावा अमेरिकी ब्याज दरों में अनिश्चितता और रुपये पर बने दबाव को संभालने के लिए आरबीआई को एफसीएनआर (बी) स्वैप विंडो के जरिए 65.4 अरब डॉलर जुटाने पड़े।
इन परिस्थितियों के बावजूद देश की आर्थिक विकास दर कैसे बढ़ी?
इतनी विपरीत परिस्थितियों और बाहरी झटकों के बावजूद भारत की जीडीपी विकास दर उम्मीद से बेहतर 7.8% तक पहुंचने के पीछे कई मजबूत घरेलू कारक और रणनीतिक सरकारी नीतियां रही हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था की यह रफ्तार मुख्य रूप से इस बात का प्रमाण है कि भारत की विकास गाथा अब वैश्विक व्यापार पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय घरेलू मांग और मजबूत निवेश के दम पर आगे बढ़ रही है।
1. मजबूत घरेलू निजी खपत
भारतीय उपभोक्ताओं की बढ़ी खरीदारी क्षमता से अर्थव्यवस्था को मिला बल।
- फोटो :
अमर उजाला
2. निवेश चक्र में जोरदार तेजी
कैपिटल फॉर्मेशन में उछाल: देश में आर्थिक विकास अब केवल उपभोग-आधारित नहीं है, बल्कि यह निवेश-आधारित भी हो रहा है। पहली तिमाही में ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन में 11.9% की भारी वृद्धि हुई, जो पिछले साल इसी तिमाही में महज 5.8% थी।प्राइवेट कैपेक्स की वापसी: नए जमाने के उद्योगों जैसे कि डेटा सेंटर्स, रिन्यूएबल्स (नवीकरणीय ऊर्जा), इलेक्ट्रॉनिक्स, बिजली और धातुओं के क्षेत्रों में निजी निवेश तेजी से बढ़ा है। इस वित्त वर्ष में 5 अगस्त तक घोषित कुल 26.75 लाख करोड़ रुपये के नए निवेश प्रस्तावों में से 86% हिस्सेदारी घरेलू निजी क्षेत्र की रही है।
3. ऋण लेने वालों की संख्या एक दशक में सबसे ऊपर
- व्यापारिक और औद्योगिक गतिविधियों को गति देने के लिए बैंकों से लोन लेने की रफ्तार बीते एक दशक में सबसे तेज रही है। जून के अंत तक बैंक ऋणों में सालाना आधार पर 18.3% की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई।
- उद्योगों को दिए जाने वाले लोन में 19.2% और सेवा क्षेत्र के लोन में 21.4% की शानदार बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था के सबसे उत्पादक क्षेत्रों में पैसे का प्रवाह और व्यावसायिक गतिविधियां बेहद मजबूत हैं।
4. सेवा और विनिर्माण क्षेत्रों की मजबूती
- वित्तीय सेवाओं, रियल एस्टेट, आईटी और प्रोफेशनल सर्विसेज वाले सेक्टर ने 12.1% की दर से सबसे तेज बढ़ोतरी दर्ज की।
- वहीं, इनपुट लागत (कच्चे माल के दाम) बढ़ने के बावजूद विनिर्माण क्षेत्र (मैन्युफैक्चरिंग) 9.2% की दर से बढ़ा, जो पिछले साल 8.3% था। कंपनियों ने अपनी उत्पादन मात्रा बढ़ाकर बढ़ती लागत के दबाव को काफी हद तक बेअसर कर दिया।
सरकार के कौन से कदमों से बरकरार रहा आर्थिक विकास?
मुश्किल वैश्विक परिस्थितियों और ऊर्जा संकट के बीच केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक की सक्रिय नीतियों ने अर्थव्यवस्था को सहारा देने में बेहद अहम भूमिका निभाई। सरकार ने वैश्विक कीमतों के इस झटके को सीधे आम जनता और उपभोक्ताओं तक पहुंचने से पहले खुद बजट के स्तर पर ही थामने की कोशिश की है।
सब्सिडी का बड़ा सुरक्षा कवच मुहैया कराया
- सरकार ने वैश्विक कीमतों के बढ़ने पर घरेलू महंगाई और लागत को नियंत्रित रखने के लिए खाद्य, उर्वरक (फर्टिलाइजर) और पेट्रोलियम पर दी जाने वाली अपनी प्रमुख सब्सिडी को 37.4% तक बढ़ा दिया।
- खेती-किसानी पर बोझ कम करने के लिए अकेले उर्वरक सब्सिडी में 57.6% की भारी बढ़ोतरी की गई। इस सहायता के चलते कच्चे माल में लागतों का झटका उपभोक्ताओं और किसानों तक नहीं पहुंचा और उसे सीधे तौर पर केंद्रीय बजट ने ही सोख लिया।
खुदरा ईंधन की कीमतों पर नियंत्रण की कवायद
- कच्चे तेल की बढ़ती वैश्विक कीमतों के बावजूद सरकार ने सरकारी तेल कंपनियों के स्तर पर खुदरा ईंधन- पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखा और इनकी मूल्य वृद्धि को सीमित किया।
- जुलाई के बाद से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में थोड़ा ही बदलाव किया गया। इस कदम ने परिवहन लागत को स्थिर रखा, जिससे महंगाई का असर कम हुआ और उपभोक्ताओं के पास खर्च करने के लिए पैसे बचे।
टैक्स कटौतियों से भी बढ़ाई खरीद की क्षमता
भारतीय अर्थव्यवस्था को पिछले साल सितंबर में की गई जीएसटी कटौतियों का इस तिमाही में भी भरपूर फायदा मिला। इन अप्रत्यक्ष कर कटौतियों और राहतों के कारण केंद्रीय उत्पाद शुल्क संकेतक में 22.4% की गिरावट आई। इन कर राहतों ने बाजार में मांग को बनाए रखा, जिसका नतीजा यह हुआ कि निजी खपत पिछले साल की इसी तिमाही के 6.8% से बढ़कर 7.1% हो गई।
ये भी पढ़ें: जीडीपी: पीएम मोदी बोले- दुनिया संकटों से घिरी, फिर भी भारत ने हासिल की 7.8% विकास दर; आत्मनिर्भर बनना जरूरी
सरकारी खर्च और बुनियादी ढांचे में निवेश
भारतीय जीडीपी को स्थिर रखने में सरकार ने भी निभाई भूमिका।
- फोटो :
अमर उजाला
विशेषज्ञों की भारत की जीडीपी विकास दर पर क्या राय है?
एचडीएफसी बैंक से जुड़ी विश्लेषक साक्षी गुप्ता और बैंक ऑफ बड़ौदा के मदन सबनवीस ने पहली तिमाही के शानदार प्रदर्शन के बाद पूरे वित्त वर्ष के लिए भारत के जीडीपी अनुमान को बढ़ाकर 7% कर दिया है। दूसरी तरफ एलएंडटी से जुड़े रिसर्चर सच्चिदानंद शुक्ला का मानना है कि आगामी तिमाहियों में अगर रफ्तार थोड़ी धीमी भी पड़ती है, तब भी पूरे साल के लिए 7% से 7.2% की वास्तविक जीडीपी विकास दर आसानी से हासिल की जा सकती है, जो रिजर्व बैंक के 6.7% के अनुमान से बेहतर होगी।
भारतीय जीडीपी की रफ्तार पर विशेषज्ञ।
- फोटो :
अमर उजाला
दूसरी ओर ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की अलेक्जेंड्रा हरमन प्रसाद ने उम्मीद जताई है कि साल के अंत और 2027 तक विकास दर और मजबूत होगी, लेकिन उन्होंने आगाह किया कि भू-राजनीतिक अनिश्चितता सुधार की गति को धीमा कर सकती है। उन्होंने कमजोर पड़ते उपभोग और खाद्य व ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ती महंगाई के कारण लोगों की वास्तविक आय और भरोसे पर दबाव पड़ने की चेतावनी भी दी है। इसके अलावा डीबीएस बैंक की राधिका राव का मानना है कि भारत का घरेलू मांग चक्र उम्मीद से अधिक लचीला है। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि लगातार ऊंचे तेल की कीमतें, रुपये की कमजोरी और कड़े वैश्विक वित्तीय हालात भारत के आर्थिक दृष्टिकोण के लिए मुख्य जोखिम बने हुए हैं।