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Explainer: पीएम मोदी ने प्लास्टिक प्रदूषण पर क्यों जताई चिंता, भारत इससे निपटने के लिए क्या कर रहा?

Mon, 27 Jul 2026 04:24 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Mon, 27 Jul 2026 04:24 PM IST
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सार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में प्लास्टिक प्रदूषण की बढ़ती समस्या पर चिंता जताई है। भारत में हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा पैदा हो रहा है। ऐसे में सवाल है कि प्लास्टिक प्रदूषण कितना बड़ा खतरा बन चुका है और इससे निपटने के लिए भारत क्या कर रहा है? आइए जानते हैं....
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Why Has PM Modi Raised Concerns Over Plastic Pollution, and What Is India Doing to Tackle It?
प्लास्टिक प्रदूषण - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में प्लास्टिक प्रदूषण की बढ़ती समस्या का जिक्र किया है। एक बार इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक फेंके जाने के बाद वर्षों तक प्रकृति को नुकसान पहुंचाता रहता है। इसलिए प्लास्टिक कचरे का सही तरीके से निपटारा बेहद जरूरी है। अपने कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने ऐसे ही कुछ बेहद अनूठे प्रयासों का जिक्र भी किया। 



ऐसे में आइए जानते हैं कि पीएम ने मन की बात में क्या कहा? प्लास्टिक कचरे को लेकर भारत की क्या स्थिति है? यह कैसे खतरा बनता जा रहा है? प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार ने क्या पहल की है और उनका क्या परिणाम निकला है? विश्व में प्लास्टिक प्रदूषण की क्या तस्वीर है?

वेस्ट टू वेल्थ प्रयास क्या है?

प्रधानमंत्री ने मन की बात में बिहार के सीतामढ़ी का उदाहरण दिया। यहां बेकार प्लास्टिक को दोबारा इस्तेमाल कर बेंच बनाई जा रही है। एक बेंच बनाने में करीब 40 किलो एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक का उपयोग किया जाता है। इन बेंचों को सरकारी स्कूलों, पार्कों और सार्वजनिक जगहों पर लगाया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने इसे 'कचरे से कमाई' का उदाहरण बताया।

प्लास्टिक प्रदूषण में देश की स्थिति?

भारत में प्लास्टिक का इस्तेमाल बढ़ने के साथ इससे निकलने वाला कचरा बड़ी चुनौती बन गया है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने संसद में बताया है कि 2022-23 में देश में 41.3 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ। यानी औसतन हर दिन करीब 11,300 टन प्लास्टिक कचरा निकला।

वहीं, प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियमों के क्रियान्वयन पर जारी वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में 2020-21 में करीब 3.45 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ था। 2021-22 में यह बढ़कर करीब 3.78 लाख टन हो गया। यानी एक साल में दिल्ली में करीब 32,600 टन ज्यादा प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ।

एकल-उपयोग प्लास्टिक उत्पादों की क्या स्थिति है?

प्लास्टिक प्रदूषण कम करने के लिए पर्यावरण मंत्रालय ने 12 अगस्त 2021 को प्लास्टिक कचरा प्रबंधन संशोधन नियम जारी किए। इसके तहत कम उपयोगिता और ज्यादा कचरा फैलाने वाले चिह्नित एकल-उपयोग प्लास्टिक उत्पादों पर 1 जुलाई 2022 से प्रतिबंध लगा दिया गया।

सरकार ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को प्रतिबंध का पालन कराने के लिए नियमित अभियान चलाने को कहा है। इसके तहत बाजारों और प्लास्टिक कैरी बैग बनाने वाली इकाइयों की जांच की जाती है। नियम तोड़ने पर प्रतिबंधित प्लास्टिक जब्त करने और जुर्माना लगाने का प्रावधान है।

प्रतिबंध को लागू कराने के लिए सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने विशेष कार्यबल बनाए हैं। केंद्र सरकार ने भी राष्ट्रीय स्तर पर एक कार्यबल बनाया है, जो राज्यों के बीच तालमेल और प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियमों को लागू कराने पर काम करता है।

प्लास्टिक प्रदूषण
प्लास्टिक प्रदूषण - फोटो : अमर उजाला

नियम न मानने पर सरकार का क्या एक्शन?

सरकार के मुताबिक, जुलाई 2022 में प्रतिबंध लागू होने के बाद देशभर में लगातार जांच अभियान चलाए गए हैं। मार्च 2026 में संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, कुल 8,61,908 जांच की जा चुकी थीं। इनमें 1,989 टन प्रतिबंधित एकल-उपयोग प्लास्टिक जब्त किया गया और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कुल 19.83 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया।

प्लास्टिक पैकेजिंग की जिम्मेदारी किसकी है?

16 फरवरी 2022 को प्लास्टिक पैकेजिंग के लिए 'विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी' यानी ईपीआर की व्यवस्था लागू की गई। इसके तहत प्लास्टिक पैकेजिंग के पुनर्चक्रण, कठोर प्लास्टिक पैकेजिंग के दोबारा इस्तेमाल और नई पैकेजिंग में पुनर्चक्रित प्लास्टिक के इस्तेमाल के अनिवार्य लक्ष्य तय किए गए हैं। साथ ही ऐसी पैकेजिंग को बढ़ावा देने की व्यवस्था है, जिसे दोबारा इस्तेमाल या आसानी से पुनर्चक्रित किया जा सके।

प्लास्टिक प्रदूषण
प्लास्टिक प्रदूषण - फोटो : अमर उजाला

देश में कितने प्लास्टिक पैकेजिंग कचरे का पुनर्चक्रण हुआ है?

मार्च 2026 में सरकार की ओर से संसद में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, केंद्रीय ईपीआर पोर्टल पर 60,128 उत्पादक, आयातक और ब्रांड मालिक व 3,012 प्लास्टिक कचरा प्रसंस्करण इकाइयां पंजीकृत थीं। सरकार के मुताबिक, 2022 में ईपीआर दिशानिर्देश लागू होने के बाद करीब 207 लाख टन प्लास्टिक पैकेजिंग कचरे का पुनर्चक्रण किया जा चुका है।

जो प्लास्टिक रिसाइकिल नहीं हो सकता, उसका क्या होता है?

प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियमों में स्थानीय निकायों को ऐसे प्लास्टिक कचरे का इस्तेमाल सड़क निर्माण में करने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रावधान है, जिसे आगे पुनर्चक्रित नहीं किया जा सकता। भारतीय सड़क कांग्रेस के दिशानिर्देशों के मुताबिक इसका इस्तेमाल सड़क निर्माण में किया जा सकता है। इसके अलावा ऐसे प्लास्टिक का इस्तेमाल ऊर्जा उत्पादन, कचरे से तेल बनाने और सीमेंट भट्टियों में सह-प्रसंस्करण जैसे कामों में किया जा सकता है।

प्लास्टिक कचरे का हिसाब कौन रखता है?

प्लास्टिक कचरे की सही तस्वीर सामने लाने के लिए सरकार ने रिपोर्टिंग व्यवस्था में भी बदलाव किया है। मार्च 2024 में संशोधित नियमों के तहत प्रत्येक शहरी स्थानीय निकाय और जिला स्तर की पंचायत को हर साल प्लास्टिक कचरे से संबंधित रिपोर्ट ऑनलाइन जमा करनी है। इसके लिए 5 जून 2025 को राष्ट्रीय प्लास्टिक कचरा रिपोर्टिंग पोर्टल शुरू किया गया।

क्या वैकल्पिक उपाय भी किए जा रहे हैं?

प्रतिबंध के साथ सरकार ऐसे उत्पादों को बढ़ावा दे रही है, जो प्लास्टिक की जगह इस्तेमाल किए जा सकें। पर्यावरण मंत्रालय और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने प्रतिबंधित एकल-उपयोग प्लास्टिक के पर्यावरण अनुकूल विकल्प बनाने और बेचने वालों की एक सूची तैयार की है। इसमें देशभर की करीब 1,000 इकाइयों की जानकारी है।

5 जून 2025 को विश्व पर्यावरण दिवस पर सरकार ने 'एक राष्ट्र, एक मिशन: प्लास्टिक प्रदूषण समाप्त करें' के नारे के साथ अभियान चलाया। इसके बाद 5 जून से 31 अक्तूबर 2025 तक राष्ट्रीय प्लास्टिक प्रदूषण न्यूनीकरण अभियान चलाया गया। इसके तहत शहरों और गांवों में प्लास्टिक प्रदूषण कम करने, सरकारी कार्यालयों में गैर-जरूरी एकल-उपयोग प्लास्टिक का इस्तेमाल घटाने और पर्यावरण अनुकूल विकल्प विकसित करने पर जोर दिया गया।

प्लास्टिक प्रदूषण
प्लास्टिक प्रदूषण - फोटो : अमर उजाला

प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर दुनिया की क्या स्थिति है?

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के मुताबिक, दुनिया में हर साल 43 करोड़ टन से ज्यादा प्लास्टिक का उत्पादन होता है। इसमें करीब दो-तिहाई हिस्सा ऐसे उत्पादों का है, जिनका इस्तेमाल बहुत कम समय के लिए होता है और वे जल्द ही कचरे में बदल जाते हैं। वहीं यूरोपीय संघ (ईयू) में 2023 में कुल 7.97 करोड़ टन पैकेजिंग कचरा पैदा हुआ। यानी प्रति व्यक्ति औसतन करीब 177.8 किलोग्राम पैकेजिंग कचरा निकला।

हर साल 28 करोड़ टन से ज्यादा कम समय तक इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक उत्पाद कचरे में बदल जाते हैं। दुनिया के कुल प्लास्टिक कचरे का करीब 46% लैंडफिल में पहुंचता है, जबकि करीब 22% का सही प्रबंधन नहीं हो पाता और वह खुले पर्यावरण में फैल जाता है। प्लास्टिक सामान्य पदार्थों की तरह जैविक रूप से नष्ट नहीं होता। इसका कचरा समुद्री जीवों को नुकसान पहुंचाता है, मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित करता है और भूजल को प्रदूषित कर सकता है। इसका असर इंसानों की सेहत तक पहुंच सकता है।

एशिया में कौन से देश सबसे ज्यादा करता है प्लास्टिक का इस्तेमाल?

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) के मुताबिक, दक्षिण-पूर्व और पूर्वी एशिया में पिछले तीन दशकों में प्लास्टिक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। आसियान प्लस थ्री देशों में 1990 में करीब 1.7 करोड़ टन प्लास्टिक का इस्तेमाल होता था, जो 2022 में बढ़कर 15.2 करोड़ टन हो गया। यानी 32 साल में प्लास्टिक का इस्तेमाल करीब नौ गुना बढ़ गया। 

इस क्षेत्र में प्लास्टिक के इस्तेमाल में सबसे बड़ी हिस्सेदारी चीन की है। कुल प्लास्टिक इस्तेमाल का करीब 70% अकेले चीन में होता है, जबकि आसियान देशों की हिस्सेदारी करीब 19% है। चीन और कम-मध्यम आय वाले कुछ आसियान देशों में प्लास्टिक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। इसके मुकाबले जापान में इसकी बढ़ोतरी धीमी रही है।

सबसे ज्यादा प्लास्टिक का कहां होता है इस्तेमाल? 

दुनिया में बनने वाले कुल प्लास्टिक का करीब 36% पैकेजिंग में इस्तेमाल होता है। इसमें खाने-पीने के सामान के एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक कंटेनर भी शामिल हैं। ऐसे कंटेनरों का करीब 85% हिस्सा आखिर में लैंडफिल में पहुंच जाता है या उसका सही प्रबंधन नहीं हो पाता।

खेती में बीजों की कोटिंग से लेकर खेतों में बिछाई जाने वाली प्लास्टिक फिल्म तक इसका इस्तेमाल होता है। वहीं कपड़ा उद्योग में इस्तेमाल होने वाले पॉलिएस्टर, ऐक्रेलिक और नायलॉन भी प्लास्टिक के ही रूप हैं। कपड़े बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री का करीब 60% हिस्सा प्लास्टिक आधारित है।

प्लास्टिक जलवायु के लिए भी क्यों खतरनाक?

प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या केवल कचरे तक सीमित नहीं है। इसका उत्पादन भी जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने में भूमिका निभाता है। प्लास्टिक मुख्य रूप से कच्चे तेल जैसे जीवाश्म ईंधन से बनाया जाता है। इसे तैयार करने में गर्मी और दूसरे रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के मुताबिक, 2019 में प्लास्टिक से करीब 1.8 अरब टन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन हुआ। यह उस साल दुनिया के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का करीब 3.4% था।

माइक्रोप्लास्टिक का खतरा
माइक्रोप्लास्टिक का खतरा - फोटो : अमर उजाला

माइक्रोप्लास्टिक क्या है और यह कहां से आता है?

प्लास्टिक के बेहद छोटे कणों को माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। इनका आकार पांच मिलीमीटर या उससे कम होता है। ये टायर, सौंदर्य प्रसाधन और सिंथेटिक कपड़ों समेत कई चीजों से निकलते हैं। सिंथेटिक कपड़े धोने पर उनसे बहुत छोटे प्लास्टिक फाइबर निकलते हैं, जिन्हें माइक्रोफाइबर कहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के मुताबिक, अकेले कपड़े धोने से हर साल करीब पांच लाख टन प्लास्टिक माइक्रोफाइबर समुद्र में पहुंचते हैं।

माइक्रोप्लास्टिक का स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ सकता है?

भारतीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने लोकसभा में बताया कि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के भोपाल स्थित राष्ट्रीय पर्यावरण स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान ने मानव शरीर में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी से जुड़े अध्ययनों की समीक्षा की है। वहीं, जैव प्रौद्योगिकी विभाग माइक्रोप्लास्टिक के पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर संभावित असर को समझने के लिए कई शोध परियोजनाओं को सहायता दे रहा है।

इन शोधों में माइक्रोप्लास्टिक के खाद्य शृंखला में प्रवेश और स्वास्थ्य पर उसके संभावित असर का अध्ययन किया जा रहा है। खासतौर पर यह समझने की कोशिश की जा रही है कि माइक्रोप्लास्टिक प्रतिरक्षा कोशिकाओं और आंतों के ऊतकों को कैसे प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा माइक्रोप्लास्टिक से ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, कोशिकाओं को नुकसान, प्रतिरक्षा कोशिकाओं में सूजन की प्रतिक्रिया और आंतों के स्वास्थ्य व बीमारी के जोखिम पर संभावित असर का अध्ययन किया जा रहा है।

इसके साथ ही अध्ययनों में समुद्री और तटीय जल में माइक्रोप्लास्टिक से जुड़े मानव रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया और हानिकारक शैवाल की प्रजातियों की पहचान की गई है। मंत्रालय के मुताबिक, इससे माइक्रोप्लास्टिक के एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी रोगाणुओं के विकास और फैलाव के संभावित केंद्र बनने की आशंका सामने आती है।

दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए क्या कर रही है?

2022 में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने प्लास्टिक प्रदूषण खत्म करने के लिए एक प्रस्ताव पर सहमति जताई थी। इसके तहत प्लास्टिक प्रदूषण पर कानूनी रूप से बाध्यकारी वैश्विक व्यवस्था तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की गई। इसमें प्लास्टिक के पूरे जीवन चक्र यानी कच्चा माल निकालने और उत्पाद का डिजाइन तैयार करने से लेकर उसके उत्पादन और आखिर में कचरा बनने व उसके प्रबंधन तक को शामिल करने पर जोर दिया गया।

प्लास्टिक प्रदूषण पर कैसे काबू पा रहे दुनिया के देश?

  • जापान: ओईसीडी के मुताबिक, 2022 में केवल 0.3% प्लास्टिक कचरा पर्यावरण में लीक हुआ। यहां कचरा संग्रह और सुरक्षित निपटान की मजबूत व्यवस्था है। 
  • दक्षिण कोरिया: 2022 में यहां भी सिर्फ 0.3% प्लास्टिक कचरा पर्यावरण में लीक हुआ। कचरे की छंटाई और संग्रह की मजबूत व्यवस्था है। 
  • बेल्जियम: 2023 में 59.5% प्लास्टिक पैकेजिंग कचरा रीसाइकिल किया गया, जो यूरोपीय संघ में सबसे ज्यादा था। 
  • लातविया: 2023 में 59.2% प्लास्टिक पैकेजिंग कचरे की रीसाइक्लिंग हुई, जो ईयू में दूसरी सबसे ऊंची दर थी। 
  • रवांडा: 2008 में प्लास्टिक बैग पर प्रतिबंध लगाया। देश प्लास्टिक के इस्तेमाल को शुरुआत में ही कम करने के मॉडल के लिए जाना जाता है।
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