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क्या होती है जेपीसी? आखिर सरकारें क्यों डरती हैं इसके गठन से

Sat, 15 Dec 2018 10:27 AM IST
सोनू शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Sat, 15 Dec 2018 10:27 AM IST
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Why Government do not want to form the JPC on the Rafale issue
PM Narendra Modi

इसवक्त देशभर में राफेल का मुद्दा गरमाया हुआ है। कांग्रेस लगातार केंद्र सरकार से ज्वाइंट पार्लियामेंटरी कमेटी यानी जेपीसी के गठन की मांग कर रही है। हालांकि सरकार इसके गठन को तैयार नहीं है। उसका कहना है कि वह इस मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में चर्चा के लिए तैयार है।

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बता दें कि शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने राफेल सौदे पर अपना अहम फैसला सुनाया और सरकार पर लगे सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। इसके बावजूद कांग्रेस इस मुद्दे पर सरकार से जेपीसी के गठन की मांग कर रहा है। शुक्रवार की शाम कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक प्रेस कांफ्रेंस की और जेपीसी के गठन की मांग एक बार फिर उठाई।
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क्या होती है जेपीसी

दरअसल, संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी संसद की वह समिति होती है, जिसमें सभी दलों की समान भागीदारी होती है। जेपीसी को यह अधिकार होता है कि वह किसी भी व्यक्ति, संस्था या किसी भी उस पक्ष को बुला सकती है और उससे पूछताछ कर सकती है, जिसको लेकर उसका गठन हुआ है। अगर वह व्यक्ति, संस्था या पक्ष जेपीसी के समक्ष पेश नहीं होता है तो यह संसद की अवमानना का उल्लघंन माना जाएगा, जिसके बाद जेपीसी संबंधित व्यक्ति या संस्था से इस बाबत लिखित या मौखिक जवाब या फिर दोनों मांग सकती है।
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जानकारी के मुताबिक, इस समिति में अधिकतम 30-31 सदस्य हो सकते हैं, जिसका चेयरमैन बहुमत वाली पार्टी के सदस्य को बनाया जाता है। इसके अलावा समिति में सदस्यों की संख्या भी बहुमत वाली पार्टी की अधिक होती है। किसी भी मामले की जांच के लिए समिति के पास अधिकतम 3 महीने की समयसीमा होती है। इसके बाद संसद के समक्ष उसे अपनी जांच रिपोर्ट पेश करनी होती है।

सरकार क्यों नहीं करना चाहती जेपीसी का गठन?

राफेल मुद्दे को लेकर पिछले कई दिनों से कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल सरकार से जेपीसी के गठन की मांग कर रहे हैं। इसको लेकर संसद का शीतकालीन सत्र भी नहीं चल पा रहा है। ऐसे में अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर सरकार क्यों नहीं करना चाहती जेपीसी का गठन? उसे किस बात का डर सता रहा है?

संसदीय इतिहास पर नजर डालें तो पिछले 70 सालों में अलग-अलग मामलों को लेकर कुल 8 बार जेपीसी का गठन किया गया है। इसमें 5 बार तो ऐसा हुआ है कि इसकी वजह से सत्ताधारी दल अगला आम चुनाव हार गई। ये एक कारण हो सकता है कि सरकार जेपीसी का गठन नहीं करना चाहती।

ये भी हो सकता है जेपीसी के गठन न करने का कारण?

राफेल मुद्दे पर जेपीसी के गठन का भाजपा लगातार विरोध कर रही है। चूंकि जेपीसी के पास असीमित अधिकार होते हैं और यह मामला सीधे प्रधानमंत्री से जुड़ा हुआ है, ऐसे में अगर जेपीसी का गठन होता है तो इसकी आंच सीधे प्रधानमंत्री मोदी पर पड़ेगी। जेपीसी उनसे मामले को लेकर पूछताछ कर सकती है।  

कब-कब हुआ जेपीसी का गठन और क्यों?

- सबसे पहले जेपीसी का गठन साल 1987 में हुआ था, जब राजीव गांधी सरकार पर बोफोर्स तोप खरीद मामले में घोटाले का आरोप लगा था। माना जाता है कि इसी की वजह से साल 1989 में हुआ आम चुनाव कांग्रेस हार गई थी।

- दूसरी बार जेपीसी का गठन साल 1992 में हुआ था, जब पीवी नरसिंह राव की सरकार पर सुरक्षा एवं बैंकिंग लेन-देन में अनियमितता का आरोप लगा था। उसके बाद जब 1996 में आम चुनाव हुए तो उसमें भी इसकी वजह से कांग्रेस हार गई थी।

- तीसरी बार साल 2001 में स्टॉक मार्केट घोटाले को लेकर जेपीसी का गठन हुआ था। हालांकि इसका कोई खास असर देखने को नहीं मिला।

- चौथी बार साल 2003 में जेपीसी का गठन भारत में बनने वाले सॉफ्ट ड्रिंक्स और अन्य पेय पदार्थों में कीनटाशक होने की जांच के लिए किया गया था। इसका नतीजा ये हुआ था कि इसकी वजह से अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार अगला आम चुनाव हार गई थी।

- पांचवीं बार साल 2011 में टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच को लेकर जेपीसी का गठन हुआ था।

- छठी बार साल 2013 में वीवीआईपी चॉपर घोटाले की जांच को लेकर जेपीसी का गठन हुआ और टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले और चॉपर घोटाले का मिलाजुला असर ये हुआ कि कांग्रेस अगला आम चुनाव यानी 2014 का चुनाव हार गई।

- सातवीं बार साल 2015 में भूमि अधिग्रहण,पुनर्वास बिल को लेकर जेपीसी का गठन  किया गया। हालांकि इसका कोई नतीजा नहीं निकला।

- साल 2016 में आठवीं और आखिरी बार एनआरसी मुद्दे को लेकर जेपीसी का गठन हुआ और इसका भी कोई नतीजा नहीं निकल पाया।  

हालांकि अगर जेपीसी का गठन होता भी है तो सरकार को इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि जेपीसी में ज्यादातर सदस्य बहुमत वाली पार्टी के ही होते हैं और चूंकि जेपीसी का फैसला बहुमत से होता है, ऐसे में फैसला अक्सर सरकार के ही पक्ष में ही आता है। टूजी घोटाले में भी ऐसा ही हुआ था। जेपीसी की रिपोर्ट में सरकार को क्लीनचिट मिली थी, जबकि अदालत में यह चोरी पकड़ी गई थी।
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