एक्सप्लेनर: अमेरिका से भारत ने क्यों खरीदी जैवलिन मिसाइल, खासियत क्या? देश के दुश्मनों के लिए बनेगी बड़ा खतरा
भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद अपनी एंटी-टैंक क्षमता मजबूत करने के लिए अमेरिका से करीब 60 जैवलिन मिसाइलें खरीदने का फैसला किया है। ऐस में आइए जानते हैं कि आखिर जैवलिन मिसाइल में ऐसा क्या खास है, जो इसे दुश्मन के टैंकों के लिए बड़ा खतरा बनाता है?
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विस्तार
भारत और अमेरिका के बीच अहम रक्षा डील हुई है। इसके तहत भारतीय सेना अमेरिका से जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइलें खरीदेगी। यह खरीद ऑपरेशन सिंदूर के बाद सेना को मिली आपातकालीन खरीद शक्तियों के तहत की गई है। जैवलिन को दुनिया की चर्चित एंटी-टैंक मिसाइल प्रणालियों में गिना जाता है।
ऐसे में आइए जानते हैं कि भारत और अमेरिका के बीच आखिर क्या समझौता हुआ है? जैवलिन मिसाइल क्या है? इसकी क्या खासियत है? इसका इस्तेमाल कहां किया जा सकता है? इसकी मारक क्षमता कितनी है? यह किन देशों के पास है? भारत को कैसे फायदा होगा?
क्या डील हुई है?
दोनों देशों के बीच करीब 292 करोड़ रुपये का समझौता हुआ है। इसके तहत भारतीय सेना को करीब 60 जैवलिन एंटी-टैंक निर्देशित मिसाइलें मिलेंगी। यह खरीद आपातकालीन खरीद व्यवस्था के तहत की गई है। इसके तहत भारतीय सशस्त्र बलों को अपनी सैन्य क्षमता तेजी से बढ़ाने के लिए जरूरी हथियार खरीदने की अनुमति दी गई है। इन हथियारों की डिलीवरी वित्त वर्ष 2026-27 के अंत तक शुरू होने की उम्मीद है।
भारत को जैवलिन सीमित संख्या में मिलेंगी, क्योंकि आपातकालीन खरीद व्यवस्था के तहत एक उपकरण के लिए 300 करोड़ रुपये तक की खरीद की जा सकती है। अमेरिका लंबे समय से भारत को जैवलिन मिसाइल देने की कोशिश कर रहा था। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने इस खरीद को भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया है। उन्होंने कहा कि इससे भविष्य में दोनों देशों के बीच जैवलिन के सह-उत्पादन की संभावनाएं भी खुल सकती हैं।
नवंबर 2025 में अमेरिका के विदेश विभाग ने भारत को संभावित रूप से 100 जैवलिन प्रणालियां और 216 एक्सकैलिबर निर्देशित तोप गोले बेचने के लिए 93 मिलियन डॉलर की बिक्री को मंजूरी दी थी।
जैवलिन मिसाइल किस तरह की प्रणाली है?
जैवलिन एक सैनिक द्वारा ले जाकर दागी जा सकने वाली मध्यम दूरी की टैंक रोधी निर्देशित मिसाइल प्रणाली है। इसे कंधे से दागा जा सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य टैंक और दूसरे बख्तरबंद वाहनों को नष्ट करना है। इसका इस्तेमाल बंकर, किलेबंद ठिकाने और गुफाओं जैसे लक्ष्यों के खिलाफ भी किया जा सकता है।
इस प्रणाली को अमेरिका के लिए लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन के संयुक्त उद्यम ने विकसित और निर्मित किया है। अमेरिकी सेना और मरीन के अलावा कई दूसरे देशों की सेनाएं भी इसका इस्तेमाल करती हैं।
जैवलिन की सबसे खास बात क्या है?
- जैवलिन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी 'दागो और भूल जाओ' वाली क्षमता है।
- सैनिक लक्ष्य पर मिसाइल को लॉक करके दागने के बाद उसे लगातार रास्ता दिखाने के लिए वहीं खड़ा नहीं रहता।
- मिसाइल अपने मार्गदर्शन तंत्र के जरिए लक्ष्य को खुद पकड़कर उसका पीछा करती है।
- इससे सैनिक मिसाइल दागने के तुरंत बाद अपनी जगह बदल सकता है या सुरक्षित स्थान पर जा सकता है।
जैवलिन निशाना कैसे तय करती है?
- जैवलिन प्रणाली में कमान प्रक्षेपण इकाई होती है।
- यह सैनिक को लक्ष्य देखने, उसकी निगरानी करने और मिसाइल को लक्ष्य पर लॉक करने में मदद करती है।
- इसमें दिन में लक्ष्य देखने की क्षमता और रात में गर्मी के आधार पर लक्ष्य पहचानने वाली अवरक्त प्रणाली भी होती है।
- इसलिए इसे दिन और रात दोनों समय इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसकी मारक क्षमता कितनी है?
- सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) के अनुसार, जैवलिन की मानक प्रभावी मारक दूरी करीब 2.5 किलोमीटर है।
- उन्नत हल्की कमान प्रक्षेपण इकाई के साथ इसकी मारक क्षमता करीब 4.5 किलोमीटर तक है।
- मिसाइल की लंबाई करीब 1.2 मीटर, व्यास 127 मिलीमीटर और लॉन्च के समय वजन करीब 22.1 किलोग्राम है।
- इसमें करीब 8.4 किलोग्राम का टैंडम-चार्ज उच्च विस्फोटक टैंक रोधी वारहेड होता है।
- इसकी गति करीब 140 मीटर प्रति सेकंड है।
- ऊपर से हमला करने के तरीके में यह करीब 150 मीटर की ऊंचाई तक जा सकती है।
- वहीं सीधे हमले में इसकी अधिकतम ऊंचाई करीब 50 मीटर है।
टैंक के ऊपर ही क्यों निशाना लगाती है?
जैवलिन की प्रमुख तकनीक इसका ऊपर से हमला करने वाला तरीका है। मिसाइल लक्ष्य की ओर जाते हुए ऊपर उठती है और फिर टैंक के ऊपरी हिस्से पर हमला करती है।
टैंक का ऊपरी हिस्सा आमतौर पर उसके सामने वाले हिस्से की तुलना में कम बख्तरबंद होता है। इसलिए जैवलिन टैंक के अपेक्षाकृत कमजोर हिस्से को निशाना बनाती है। इसमें सीधे हमले का तरीका भी है, जिसका इस्तेमाल बंकर, इमारत और किलेबंद ठिकानों जैसे लक्ष्यों के खिलाफ किया जा सकता है।
टैंक का कवच कैसे भेदती है ये मिसाइल?
- जैवलिन में लगा टैंडम-चार्ज वारहेड बख्तरबंद वाहनों के सुरक्षा कवच को भेदने के लिए बनाया गया है।
- यह 30 इंच यानी करीब 762 मिलीमीटर से अधिक रोल्ड होमोजीनियस स्टील के बराबर कवच को भेदने में सक्षम है।
बंद कमरे या बंकर से भी कैसे दागी जा सकती है?
- जैवलिन में कम दबाव वाली शुरुआती प्रक्षेपण तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।
- मिसाइल को पहले कम शक्ति से प्रक्षेपण नली से बाहर निकाला जाता है और उसके बाद मुख्य मोटर सक्रिय होती है।
- इस तकनीक की वजह से इसे इमारत या बंकर जैसी सीमित जगह से भी दागा जा सकता है।
- इससे पीछे निकलने वाली गैस और धुआं कम होता है और सैनिक की स्थिति के तुरंत पता चलने की संभावना घटती है।
जैवलिन प्रणाली में कितने मुख्य हिस्से होते हैं?
- जैवलिन प्रणाली को मुख्य रूप से दो हिस्सों में समझा जा सकता है।
- पहला कमान प्रक्षेपण इकाई है, जो दोबारा इस्तेमाल की जा सकती है और लक्ष्य देखने व मिसाइल को लक्ष्य पर लॉक करने का काम करती है।
- दूसरा मिसाइल और उसकी प्रक्षेपण नली है। मिसाइल दागे जाने के बाद नई मिसाइल वाली नली लगाई जा सकती है।
जैवलिन कब विकसित हुई?
जैवलिन की जड़ें अमेरिका के 1970 के दशक के टैंक-ब्रेकर कार्यक्रम से जुड़ी हैं। इसका उद्देश्य एम47 ड्रैगन जैसी पुरानी टैंक रोधी मिसाइल की जगह अधिक आधुनिक प्रणाली विकसित करना था।
1984 में अमेरिका ने उन्नत टैंक रोधी हथियार प्रणाली-मध्यम कार्यक्रम शुरू किया और 1989 में इसके पूर्ण विकास का ठेका दिया गया। बाद में इसी प्रणाली का नाम जैवलिन रखा गया। मार्च 1993 में इसका पहला मानव संचालित परीक्षण हुआ और 1996 में इसे अमेरिकी सेना में शामिल कर लिया गया।
1997 में इसे बड़े पैमाने पर उत्पादन की मंजूरी मिली। इसके बाद मिसाइल और लक्ष्य पहचान प्रणाली में कई सुधार किए गए। 2006 में ब्लॉक-1 संस्करण आया और इसके बाद ई, एफ और जी जैसे नए संस्करण विकसित किए गए।
नए संस्करणों में क्या बदलाव हुए?
एफ संस्करण में बहुउद्देश्यीय वारहेड और बेहतर लक्ष्य पहचान प्रणाली दी गई। इससे यह हल्के बख्तरबंद वाहनों, इमारतों और दूसरे कम सुरक्षित लक्ष्यों के खिलाफ ज्यादा उपयोगी हो गया।
जी संस्करण में नया खोजक तंत्र लगाया गया है, जिसे पहले की तरह ठंडा करने की जरूरत नहीं होती। इससे मिसाइल को इस्तेमाल के लिए तैयार करने में लगने वाला समय कम होता है। इसमें नई प्रक्षेपण नली और बैटरी इकाई भी शामिल है।
अमेरिका जी संस्करण और हल्की कमान प्रक्षेपण इकाई के जरिए प्रणाली को और आधुनिक बना रहा है। इसका उद्देश्य वजन और आकार कम करना, लागत नियंत्रित करना और पुराने उपकरणों को बदलना है।
किन युद्धों में हो चुका है जैवलिन का इस्तेमाल?
इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी और सहयोगी सेनाओं ने इसका इस्तेमाल किया था। मिसाइल कंपनी रेथियॉन के अनुसार, इन दोनों अभियानों में जैवलिन के 5,000 से अधिक इस्तेमाल दर्ज किए गए हैं। इन अभियानों में इसका इस्तेमाल बंकर, गुफाओं, शहरी ठिकानों, मोर्टार ठिकानों और दूसरे सैन्य लक्ष्यों के खिलाफ भी हुआ।
यूक्रेन युद्ध में इस मिसाइल की क्यों हुई चर्चा?
जैवलिन को सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय चर्चा यूक्रेन युद्ध के दौरान मिली। अमेरिका ने 2018 से यूक्रेन को जैवलिन मिसाइलें देना शुरू किया था। रूस के फरवरी 2022 में बड़े सैन्य हमले के बाद अमेरिका ने यूक्रेन को बड़ी संख्या में जैवलिन मिसाइलें उपलब्ध कराईं। मार्च 2022 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने ऐसे नए सहायता पैकेज पर हस्ताक्षर किए, जिसमें यूक्रेनी सेना को 2,000 मिसाइलें देने का प्रावधान था।
यूक्रेन में जैवलिन केवल एक हथियार नहीं रही, बल्कि युद्ध के दौरान प्रतिरोध का प्रतीक भी बन गई। 'सेंट जैवलिन' नाम से सोशल मीडिया पर एक तस्वीर और प्रतीक लोकप्रिय हुआ, जिसमें मैरी मैग्डलीन को एफजीएम-148 जैवलिन मिसाइल पकड़े दिखाया गया था।
किन देशों के पास है जैवलिन?
जैवलिन का इस्तेमाल अमेरिका के अलावा ऑस्ट्रेलिया, बहरीन, चेक गणराज्य, एस्टोनिया, फ्रांस, जॉर्जिया, इंडोनेशिया, आयरलैंड, जॉर्डन, लिथुआनिया, न्यूजीलैंड, नॉर्वे, ओमान, पोलैंड, कतर, सऊदी अरब, ताइवान, यूक्रेन, संयुक्त अरब अमीरात और ब्रिटेन समेत कई देश करते हैं।
अमेरिका की योजना इसे लंबे समय तक अपने हथियार भंडार में बनाए रखने की है। सीएसआईएस की जानकारी के अनुसार, यह प्रणाली कम से कम 2050 तक अमेरिकी सेना में रहने वाली है।
जैवलिन की कीमत कितनी है?
इसकी कीमत केवल मिसाइल तक सीमित नहीं होती। इसमें प्रक्षेपण इकाई, प्रशिक्षण, रखरखाव, कलपुर्जे और दूसरी सहायता भी शामिल हो सकती है।
सीएसआईएस के अनुसार, पुराने आंकड़ों में एक जैवलिन मिसाइल की औसत कीमत करीब 80 हजार डॉलर थी। अमेरिकी सेना के 2022 के बजट आंकड़ों में खरीदी गई मिसाइलों की औसत इकाई लागत करीब 1,07,500 डॉलर बताई गई थी। हल्की कमान प्रक्षेपण इकाई की अनुमानित कीमत इससे काफी अधिक है।
क्या भारत में भी जैवलिन का होगा उत्पादन?
मौजूदा खरीद भारतीय सेना की तत्काल जरूरत पूरी करने के लिए है, लेकिन भारत और अमेरिका जैवलिन के भारत में सह-उत्पादन की संभावना पर भी काम कर रहे हैं। फरवरी 2025 में जैवलिन बनाने वाली कंपनियों और भारत की सरकारी कंपनी भारत डायनेमिक्स लिमिटेड के बीच भारत में इसके निर्माण की संभावनाएं तलाशने के लिए समझौता हुआ था। बाद में भारत ने अमेरिका के सामने जैवलिन के सह-उत्पादन का प्रस्ताव भी रखा। अगर यह योजना आगे बढ़ती है तो भारत को जैवलिन के निर्माण से जुड़ी औद्योगिक क्षमता और तकनीकी सहयोग बढ़ाने का अवसर मिलेगा।
भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए कई स्वदेशी मिसाइल प्रणालियां विकसित कर रहा है। इनमें पृथ्वी, अग्नि शृंखला, आकाश, नाग, एमपीएटीजीएम, प्रलय और हेलिना प्रमुख हैं। इसके साथ ही नई पीढ़ी की मिसाइल प्रणालियों पर भी काम जारी है।
इसी कड़ी में जून में रुद्रम-2 हवा से जमीन पर मार करने वाली मिसाइल है, जिसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और भारतीय वायुसेना मिलकर विकसित कर रहे हैं। डीआरडीओ और वायुसेना ने हवाई मंच से इसके सफल उड़ान परीक्षण किए हैं।