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ब्रिटेन के उलट भारत में क्यों बढ़ रहे है सिजेरियन डिलीवरी के मामले?
बीबीसी, हिन्दी
Updated Mon, 26 Feb 2018 10:30 PM IST
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pregnancy
- फोटो : telegraph
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सुबर्ना घोष और उनके पति को अपने पहले बच्चे का बेसब्री से इंतजार था। प्रेग्नेंसी के दौरान सुबर्ना अपना पूरा ध्यान रख रही थीं और उन्हें उम्मीद थी कि नॉर्मल डिलिवरी ही होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
उन्होंने बीबीसी से बताया, "डॉक्टर ने मुझसे कहा कि आज के जमाने में सब सिजेरियन डिलीवरी ही कराते हैं। आप क्यों बेकार में दर्द झेलना चाहती हैं। आप जैसे पढ़े-लिखे लोगों को सी-सेक्शन जैसा वैज्ञानिक और आधुनिक तरीका चुनना चाहिए।"
डॉक्टर की बातें सुनकर सुबर्ना और उनके पति उलझन में पड़ गए और आखिरकार उन्होंने उसकी बात मान ली, लेकिन इसका सुबर्ना की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ा। उन्होंने बताया, "ऑपरेशन से उबरने में मुझे लंबा वक्त लगा। मैं अपने बच्चे को ठीक से दूध भी नहीं पिला पाती थी क्योंकि शरीर में दूध बनता ही नहीं था।"
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सुबर्ना ने ऑनलाइन फोरम Change.Org पर एक याचिका भी डाली है जिसमें उन्होंने अपील की है कि सभी अस्पताल ये बताएं कि उनके यहां कितने बच्चे सिजेरियन तरीके से हुए और कितने नॉर्मल।
क्या कहते हैं डॉक्टर?
गाइनोकॉलजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) डॉक्टर मधु गोयल भी मानती हैं कि सिजेरियन के बाद रिकवरी में वक्त लगता है जबकि नॉर्मल डिलीवरी के बाद महिला बहुत जल्दी एक्टिव हो जाती है।
सिजेरियन डिलीवरी के दौरान कई बार बहुत ज्यादा खून भी निकल जाता है जिससे कमजोरी, शरीर में दूध न बनने और डिप्रेशन जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। इसके अलावा सिजेरियन के बाद औरतों में मोटापा और डायबिटीज होने की आशंका भी कई गुना बढ़ जाती है।
डॉक्टर मधु कहती हैं, "हम जैसे डॉक्टरों पर अक्सर ये आरोप लगता है कि हम अपनी आसानी और पैसों के लिए जानबूझकर सिजेरियन डिलीवरी करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं हैं। कई बार औरतें खुद वजाइनल डिलीवरी का दर्द झेलने के लिए तैयार नहीं होतीं और हमें उनके कहने पर सिजेरियन तरीका चुनना पड़ता है।"
उन्होंने कहा कि कई बार तो लोग चाहते हैं कि बच्चा किसी खास दिन या खास मुहूर्त में पैदा हो। ऐसी स्थिति में भी हमें सी-सेक्शन का रास्ता ही अपनाना होता है।
डॉ. मधु सिजेरियन डिलिवरी की बढ़ती संख्याओं के पीछे कुछ और वजहें भी गिनाती हैं। मसलन, लड़कियों का ज्यादा उम्र में प्रसव और प्रसव से पहले पर्याप्त एक्सरसाइज या शारीरिक मेहनत न करना।
उन्होंने कहा, "इन सबके पीछे हमारी बदलती लाइफस्टाइल एक बहुत बड़ी वजह है। आज लड़कियां देर से शादी करती हैं और देर से मां बनती हैं। वो जरूरी एक्सरसाइज भी नहीं करतीं इसी वजह से उनके लिए नॉर्मल डिलीवरी के जरिए मां बनना मुश्किल होता है।"
कई बार उस स्थिति में भी सिजेरियन डिलीवरी करनी पड़ती है जब मां बच्चे को पुश न कर पा रही हो, या फिर बच्चे या मां की जान को खतरा हो।
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उन्होंने बीबीसी से बताया, "डॉक्टर ने मुझसे कहा कि आज के जमाने में सब सिजेरियन डिलीवरी ही कराते हैं। आप क्यों बेकार में दर्द झेलना चाहती हैं। आप जैसे पढ़े-लिखे लोगों को सी-सेक्शन जैसा वैज्ञानिक और आधुनिक तरीका चुनना चाहिए।"
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डॉक्टर की बातें सुनकर सुबर्ना और उनके पति उलझन में पड़ गए और आखिरकार उन्होंने उसकी बात मान ली, लेकिन इसका सुबर्ना की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ा। उन्होंने बताया, "ऑपरेशन से उबरने में मुझे लंबा वक्त लगा। मैं अपने बच्चे को ठीक से दूध भी नहीं पिला पाती थी क्योंकि शरीर में दूध बनता ही नहीं था।"
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सुबर्ना ने ऑनलाइन फोरम Change.Org पर एक याचिका भी डाली है जिसमें उन्होंने अपील की है कि सभी अस्पताल ये बताएं कि उनके यहां कितने बच्चे सिजेरियन तरीके से हुए और कितने नॉर्मल।
क्या कहते हैं डॉक्टर?
गाइनोकॉलजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) डॉक्टर मधु गोयल भी मानती हैं कि सिजेरियन के बाद रिकवरी में वक्त लगता है जबकि नॉर्मल डिलीवरी के बाद महिला बहुत जल्दी एक्टिव हो जाती है।
सिजेरियन डिलीवरी के दौरान कई बार बहुत ज्यादा खून भी निकल जाता है जिससे कमजोरी, शरीर में दूध न बनने और डिप्रेशन जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। इसके अलावा सिजेरियन के बाद औरतों में मोटापा और डायबिटीज होने की आशंका भी कई गुना बढ़ जाती है।
डॉक्टर मधु कहती हैं, "हम जैसे डॉक्टरों पर अक्सर ये आरोप लगता है कि हम अपनी आसानी और पैसों के लिए जानबूझकर सिजेरियन डिलीवरी करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं हैं। कई बार औरतें खुद वजाइनल डिलीवरी का दर्द झेलने के लिए तैयार नहीं होतीं और हमें उनके कहने पर सिजेरियन तरीका चुनना पड़ता है।"
उन्होंने कहा कि कई बार तो लोग चाहते हैं कि बच्चा किसी खास दिन या खास मुहूर्त में पैदा हो। ऐसी स्थिति में भी हमें सी-सेक्शन का रास्ता ही अपनाना होता है।
डॉ. मधु सिजेरियन डिलिवरी की बढ़ती संख्याओं के पीछे कुछ और वजहें भी गिनाती हैं। मसलन, लड़कियों का ज्यादा उम्र में प्रसव और प्रसव से पहले पर्याप्त एक्सरसाइज या शारीरिक मेहनत न करना।
उन्होंने कहा, "इन सबके पीछे हमारी बदलती लाइफस्टाइल एक बहुत बड़ी वजह है। आज लड़कियां देर से शादी करती हैं और देर से मां बनती हैं। वो जरूरी एक्सरसाइज भी नहीं करतीं इसी वजह से उनके लिए नॉर्मल डिलीवरी के जरिए मां बनना मुश्किल होता है।"
कई बार उस स्थिति में भी सिजेरियन डिलीवरी करनी पड़ती है जब मां बच्चे को पुश न कर पा रही हो, या फिर बच्चे या मां की जान को खतरा हो।
Pregnancy
- फोटो : BBC
क्यों बढ़ रहे हैं सिजेरियन ऑपरेशन?
महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए अच्छा न होने के बावजूद भारत समेत दुनिया के कई देशों में सिजेरियन या सी-सेक्शन डिलीवरी का चलन तेजी से बढ़ रहा है।
इसीलिए दुनिया भर की औरतों का ध्यान रखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कुछ दिनों पहले अपनी 'चाइल्ड बर्थ गाइडलाइंस' में बदलाव किए हैं। इसे 'इंट्रापार्टम केयर फ़ॉर अ पॉज़िटिव चाइल्डबर्थ एक्सपीरियंस' नाम दिया गया है।
ऑल्युफिमी ओलाडापो विश्व स्वास्थ्य संगठन के मेडिकल ऑफिसर हैं। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने उनके हवाले से कहा कि पिछले दो दशकों से जल्दी डिलीवरी कराने की कोशिश की जा रही है और नतीजन सिजेरियन डिलीवरी के मामलों में लगातार बढ़त देखने को मिल रही है।
ओलाडापो ने कहा कि कई बार औरतों को सिजेरियन डिलीवरी के लिए सिर्फ इसलिए मजबूर किया जाता है क्योंकि नॉर्मल या वजाइनल डिलीवरी के लिए डॉक्टरों को देर तक इंतजार करना पड़ता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की इन 26 में से एक गाइडलाइंस में से एक कहती है कि गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए ज्यादा वक्त दिया जाए। इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि बच्चे के जन्म के लिए 'वन सेंटीमीटर रूल' व्यावहारिक नहीं है और इसे पत्थर की लकीर नहीं माना जा सकता।
क्या है वन सेंटीमीटर रूल?
डॉक्टर मधु गोयल के मुताबिक प्रसव से पहले बच्चा हर घंटे एक सेंटीमीटर नीचे की तरफ खिसकता है। इसे मेडिकल साइंस की भाषा में 'वन सेंटीमीटर रूल' कहते हैं।
भारत में सिजेरियन डिलीवरी
नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) ने 1992-93 से लेकर 2015-16 तक के आंकड़ों का अध्ययन किया और पाया कि भारत में औसतन 18 फीसदी बच्चे सिजेरियन डिलीवरी से पैदा होते हैं। एनएफएचएस के आंकड़े (2015-16) ये भी बताते हैं कि भारत में सबसे ज्यादा सिजेरियन ऑपरेशन तेलंगाना (57.7%), आंध्र प्रदेश (40.1%) और केरल में (35.8%) होते हैं।
ब्रिटेन में नॉर्मल डिलिवरी को बढ़ावा
दिलचस्प ये है कि ब्रिटेन समेत तमाम विकसित देशों में सिजेरियन डिलीवरी का प्रतिशत भारत की तुलना में काफी कम है, जबकि यहां बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं।
2015 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार इंग्लैंड में 11, इटली में 25 और नॉर्वे में सिर्फ 6.6 फीसदी डिलीवरी ही सिजेरियन तरीके से होती है।
ब्रिटेन के रॉयल कॉलेज ऑफ मिडवाइव्स की सलाहकार गेल जॉनसन ने बीबीसी से कहा, "हम सिजेरियन को इमरजेंसी में इस्तेमाल करते हैं। ये रास्ता तभी चुना जाता है जब किसी वजह से वजाइनल डिलीवरी नहीं कराई जा सकती। सिजेरियन को आखिरी विकल्प के तौर पर इसलिए भी देखते हैं क्योंकि इसमें खतरे ज्यादा हैं।"
ब्रिटेन के जाने-माने गाइनोकॉलजिस्ट मैल्कम ग्रिफिट्स के मुताबिक सिजेरियन एक बड़ा ऑपरेशन है, लगभग हिस्टेरेक्टमी (गर्भाशय निकालने के लिए किया जाने वाला ऑपरेशन) जितना बड़ा। इसलिए जब तक कोई और विकल्प न बचा हो, डॉक्टर सिजेरियन से बचते हैं।
इतना ही नहीं, ब्रिटेन में कुछ साल पहले तक डॉक्टर ही ये फैसला लेते थे कि सिजेरियन करना है या नहीं। यानी अगर कोई महिला सिजेरियन चाहती भी हो तो डॉक्टर ऐसा करने से इनकार कर सकते थे।
हालांकि ये नियम साल 2011 में बदल दिया गया था। नए नियम के मुताबिक अगर महिला सिजेरियन डिलीवरी चाहती है तो डॉक्टर को वैसा ही करना होगा। इसके साथ डॉक्टरों से ये उम्मीद की जाती है कि वो महिलाओं को सिजेरियन के नुकसान और खतरों के बारे में समझाएं।
साल 2011 की गाइडलाइंस में कहा गया है कि सिजेरियन डिलिवरी चाहने वाली औरतों को मानसिक रूप से नॉर्मल डिलीवरी के लिए तैयार किया जाना चाहिए।
वैसे तो बच्चे के जन्म से पहले सभी औरतों के मन में तरह-तरह के डर और आशंकाएं होती हैं लेकिन तकरीबन 6 से 10 फीसदी में ये बहुत ज्यादा हो सकता है। बच्चे को जन्म देने के इस डर को 'टोकोफोबिया' कहते हैं।
सेंट टॉमस हॉस्पिटल में कंसल्टेंट नीना ने बीबीसी से बताया, "मैं ऐसी बहुत सी महिलाओं से मिली हूं जो डर की वजह से सिजेरियन चाहती थीं लेकिन समझाने और अच्छी देखभाल का भरोसा दिलाए जाने पर वो नॉर्मल डिलीवरी के लिए तैयार हो गईं।"
महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए अच्छा न होने के बावजूद भारत समेत दुनिया के कई देशों में सिजेरियन या सी-सेक्शन डिलीवरी का चलन तेजी से बढ़ रहा है।
इसीलिए दुनिया भर की औरतों का ध्यान रखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कुछ दिनों पहले अपनी 'चाइल्ड बर्थ गाइडलाइंस' में बदलाव किए हैं। इसे 'इंट्रापार्टम केयर फ़ॉर अ पॉज़िटिव चाइल्डबर्थ एक्सपीरियंस' नाम दिया गया है।
ऑल्युफिमी ओलाडापो विश्व स्वास्थ्य संगठन के मेडिकल ऑफिसर हैं। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने उनके हवाले से कहा कि पिछले दो दशकों से जल्दी डिलीवरी कराने की कोशिश की जा रही है और नतीजन सिजेरियन डिलीवरी के मामलों में लगातार बढ़त देखने को मिल रही है।
ओलाडापो ने कहा कि कई बार औरतों को सिजेरियन डिलीवरी के लिए सिर्फ इसलिए मजबूर किया जाता है क्योंकि नॉर्मल या वजाइनल डिलीवरी के लिए डॉक्टरों को देर तक इंतजार करना पड़ता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की इन 26 में से एक गाइडलाइंस में से एक कहती है कि गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए ज्यादा वक्त दिया जाए। इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि बच्चे के जन्म के लिए 'वन सेंटीमीटर रूल' व्यावहारिक नहीं है और इसे पत्थर की लकीर नहीं माना जा सकता।
क्या है वन सेंटीमीटर रूल?
डॉक्टर मधु गोयल के मुताबिक प्रसव से पहले बच्चा हर घंटे एक सेंटीमीटर नीचे की तरफ खिसकता है। इसे मेडिकल साइंस की भाषा में 'वन सेंटीमीटर रूल' कहते हैं।
भारत में सिजेरियन डिलीवरी
नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) ने 1992-93 से लेकर 2015-16 तक के आंकड़ों का अध्ययन किया और पाया कि भारत में औसतन 18 फीसदी बच्चे सिजेरियन डिलीवरी से पैदा होते हैं। एनएफएचएस के आंकड़े (2015-16) ये भी बताते हैं कि भारत में सबसे ज्यादा सिजेरियन ऑपरेशन तेलंगाना (57.7%), आंध्र प्रदेश (40.1%) और केरल में (35.8%) होते हैं।
ब्रिटेन में नॉर्मल डिलिवरी को बढ़ावा
दिलचस्प ये है कि ब्रिटेन समेत तमाम विकसित देशों में सिजेरियन डिलीवरी का प्रतिशत भारत की तुलना में काफी कम है, जबकि यहां बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं।
2015 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार इंग्लैंड में 11, इटली में 25 और नॉर्वे में सिर्फ 6.6 फीसदी डिलीवरी ही सिजेरियन तरीके से होती है।
ब्रिटेन के रॉयल कॉलेज ऑफ मिडवाइव्स की सलाहकार गेल जॉनसन ने बीबीसी से कहा, "हम सिजेरियन को इमरजेंसी में इस्तेमाल करते हैं। ये रास्ता तभी चुना जाता है जब किसी वजह से वजाइनल डिलीवरी नहीं कराई जा सकती। सिजेरियन को आखिरी विकल्प के तौर पर इसलिए भी देखते हैं क्योंकि इसमें खतरे ज्यादा हैं।"
ब्रिटेन के जाने-माने गाइनोकॉलजिस्ट मैल्कम ग्रिफिट्स के मुताबिक सिजेरियन एक बड़ा ऑपरेशन है, लगभग हिस्टेरेक्टमी (गर्भाशय निकालने के लिए किया जाने वाला ऑपरेशन) जितना बड़ा। इसलिए जब तक कोई और विकल्प न बचा हो, डॉक्टर सिजेरियन से बचते हैं।
इतना ही नहीं, ब्रिटेन में कुछ साल पहले तक डॉक्टर ही ये फैसला लेते थे कि सिजेरियन करना है या नहीं। यानी अगर कोई महिला सिजेरियन चाहती भी हो तो डॉक्टर ऐसा करने से इनकार कर सकते थे।
हालांकि ये नियम साल 2011 में बदल दिया गया था। नए नियम के मुताबिक अगर महिला सिजेरियन डिलीवरी चाहती है तो डॉक्टर को वैसा ही करना होगा। इसके साथ डॉक्टरों से ये उम्मीद की जाती है कि वो महिलाओं को सिजेरियन के नुकसान और खतरों के बारे में समझाएं।
साल 2011 की गाइडलाइंस में कहा गया है कि सिजेरियन डिलिवरी चाहने वाली औरतों को मानसिक रूप से नॉर्मल डिलीवरी के लिए तैयार किया जाना चाहिए।
वैसे तो बच्चे के जन्म से पहले सभी औरतों के मन में तरह-तरह के डर और आशंकाएं होती हैं लेकिन तकरीबन 6 से 10 फीसदी में ये बहुत ज्यादा हो सकता है। बच्चे को जन्म देने के इस डर को 'टोकोफोबिया' कहते हैं।
सेंट टॉमस हॉस्पिटल में कंसल्टेंट नीना ने बीबीसी से बताया, "मैं ऐसी बहुत सी महिलाओं से मिली हूं जो डर की वजह से सिजेरियन चाहती थीं लेकिन समझाने और अच्छी देखभाल का भरोसा दिलाए जाने पर वो नॉर्मल डिलीवरी के लिए तैयार हो गईं।"
सुबर्ना घोष
- फोटो : BBC
भारत में धड़ल्ले से क्यों हो रहे हैं सिजेरियन ऑपरेशन?
मद्रास मेडिकल कॉलेज में गाइनोकॉलजिस्ट विनीता नारायणन कहती हैं, "भारत में ब्रिटेन के उलट स्थिति है। यहां बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव तो है ही, आम लोगों में जागरूकता की कमी भी है। रोज खुलते नए प्राइवेट अस्पतालों की संख्या और सरकारी अस्पतालों की भीड़ भी देश में सिजेरियन की बढ़ती संख्या के पीछे कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं।"
डॉ. विनीता कहती हैं, "सिजेरियन डिलीवरी की स्थिति में महिला को ज्यादा दिनों तक अस्पताल में रुकना पड़ता है। वह तुरंत चलने-फिरने और संभालने की हालत में नहीं होती। ऐसे में फायदा डॉक्टर और प्राइवेट अस्पतालों को ही होता है। मरीज ज्यादा दिन अस्पताल में रहेगा तो कमरे और बाकी सुविधाओं का खर्च तो देगा ही, सिजेरियन का महंगा खर्च अलग से चुकाएगा।"
इसके अलावा नर्सों की भारी कमी और नर्सों की ट्रेनिंग को हल्के में लिया जाना भी इसकी एक बड़ी वजह है। डॉ. विनीता के मुताबिक, ब्रिटेन जैसे देशों में नर्सिंग की डिग्री के लिए बाकायदा पढ़ाई और ट्रेनिंग की जरूरत होती है। वहीं, भारत में छह महीने की ट्रेनिंग करके नर्सिंग सर्टिफिकेट हासिल किया जा सकता है।
उन्होंने कहा, "महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में नर्सों की अहम भूमिका होती है। फिर चाहे वो बच्चे के जन्म के दौरान हो या इसके बाद। अगर सिजेरियन डिलीवरी के लगातार बढ़ते मामलों को काबू करना है तो सरकार को इस ओर भी ध्यान देना होगा।"
आखिर में सुबर्ना फिर पूछती हैं, "मुझे समझ नहीं आता कि अस्पताल ये बताने में क्यों हिचकिचाते हैं कि वो हर साल या हर महीने कितनी सिजेरियन डिलीवरी करते हैं? औरतों का पेट चीरने का फायदा किसे मिल रहा है?"
मद्रास मेडिकल कॉलेज में गाइनोकॉलजिस्ट विनीता नारायणन कहती हैं, "भारत में ब्रिटेन के उलट स्थिति है। यहां बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव तो है ही, आम लोगों में जागरूकता की कमी भी है। रोज खुलते नए प्राइवेट अस्पतालों की संख्या और सरकारी अस्पतालों की भीड़ भी देश में सिजेरियन की बढ़ती संख्या के पीछे कहीं न कहीं जिम्मेदार हैं।"
डॉ. विनीता कहती हैं, "सिजेरियन डिलीवरी की स्थिति में महिला को ज्यादा दिनों तक अस्पताल में रुकना पड़ता है। वह तुरंत चलने-फिरने और संभालने की हालत में नहीं होती। ऐसे में फायदा डॉक्टर और प्राइवेट अस्पतालों को ही होता है। मरीज ज्यादा दिन अस्पताल में रहेगा तो कमरे और बाकी सुविधाओं का खर्च तो देगा ही, सिजेरियन का महंगा खर्च अलग से चुकाएगा।"
इसके अलावा नर्सों की भारी कमी और नर्सों की ट्रेनिंग को हल्के में लिया जाना भी इसकी एक बड़ी वजह है। डॉ. विनीता के मुताबिक, ब्रिटेन जैसे देशों में नर्सिंग की डिग्री के लिए बाकायदा पढ़ाई और ट्रेनिंग की जरूरत होती है। वहीं, भारत में छह महीने की ट्रेनिंग करके नर्सिंग सर्टिफिकेट हासिल किया जा सकता है।
उन्होंने कहा, "महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में नर्सों की अहम भूमिका होती है। फिर चाहे वो बच्चे के जन्म के दौरान हो या इसके बाद। अगर सिजेरियन डिलीवरी के लगातार बढ़ते मामलों को काबू करना है तो सरकार को इस ओर भी ध्यान देना होगा।"
आखिर में सुबर्ना फिर पूछती हैं, "मुझे समझ नहीं आता कि अस्पताल ये बताने में क्यों हिचकिचाते हैं कि वो हर साल या हर महीने कितनी सिजेरियन डिलीवरी करते हैं? औरतों का पेट चीरने का फायदा किसे मिल रहा है?"