SM Krishna: दुनिया में बंगलूरू को दिलाई पहचान, आईटी क्षेत्र को बढ़ाने में नहीं छोड़ी कसर; ऐसे थे एसएम कृष्णा
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विस्तार
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सोमनहल्ली मल्लैया कृष्णा (एसएम कृष्णा) का मंगलवार सुबह 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने बंगलूरू में अपने घर पर अंतिम सांसें लीं। कृष्णा के परिवार में उनकी पत्नी प्रेमा कृष्णा और दो बेटियां मालविका कृष्णा और शांभवी कृष्णा हैं।
पिछले साल जनवरी में उन्होंने अपनी उम्र का हवाला देते हुए सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की थी। उन्हें बंगलूरू को वैश्विक नक्शे में स्थापित करने और आईटी हब के रूप में विकसित करने का श्रेय दिया जाता है। दरअसल, उनके कार्यकाल के दौरान ही आईटी क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कई अहम कदम उठाए गए थे। इसी का परिणाम था कि बंगलूरू भारत की 'सिलिकॉन वैली' कहा जाने लगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने ट्वीट किया, 'एसएम कृष्णा एक असाधारण नेता थे, जिनकी प्रशंसा सभी क्षेत्रों के लोग करते थे। उन्होंने हमेशा दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए अथक प्रयास किया। उन्हें कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के लिए याद किया जाता है, खासकर बुनियादी ढांचे के विकास पर उनके ध्यान के लिए। एसएम कृष्णा एक विपुल पाठक और विचारक भी थे।'
पांच बातें, जो आपको जरूर जाननी चाहिए...
- 1 मई 1932 को कर्नाटक के मांड्या जिले के सोमनहल्ली में जन्मे एसएम कृष्णा विदेश मंत्री और महाराष्ट्र के राज्यपाल भी रह चुके हैं।
- लॉ ग्रेजुएट एसएम कृष्णा ने अमेरिका में डलास, टेक्सास में दक्षिणी मेथोडिस्ट विश्वविद्यालय और वाशिंगटन डीसी में जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी लॉ स्कूल से स्नातक की पढ़ाई की थी। यहां वे फुलब्राइट स्कॉलर थे।
- उन्होंने दिसंबर 1989 से जनवरी 1993 तक कर्नाटक विधानसभा के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। वे 1971 से 2014 के बीच कई बार लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य भी रहे।
- वे 1999 के विधानसभा चुनावों से पहले कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे, जिसमें पार्टी ने जीत हासिल की और वे मुख्यमंत्री बने।
- कांग्रेस में शामिल होने से पहले वे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े थे। कांग्रेस के साथ अपने लगभग 50 साल लंबे जुड़ाव को खत्म करते हुए एसएम कृष्णा मार्च 2017 में भाजपा में शामिल हो गए।
आइए अब एसएम कृष्णा को विस्तार से जानते हैं...
अपने पांच दशक के राजनीतिक करियर में 92 वर्षीय कृष्णा ने केंद्र और राज्य सरकार में जो भूमिकाएं निभाईं, बहुत कम ऐसे राजनेता होंगे, जिन्होंने उनके जैसे पदों पर काम किया होगा। उन्होंने विधान परिषद्, विधानसभा सदस्य, अध्यक्ष, उपमुख्यमंत्री, केंद्रीय विदेश मंत्री और राज्यपाल के रूप में कार्य किया। कर्नाटक के मांड्या जिले के सोमनहल्ली में एक मई, 1932 को जन्मे कृष्णा ने 1962 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज केवी शंकर गौड़ा के खिलाफ मद्दुर सीट से एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल करके अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की थी। बाद में वह प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े और फिर कांग्रेस में शामिल हो गए।
फुलब्राइट स्कॉलर
उन्होंने मैसूर के महाराजा कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और यहीं के सरकारी लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री प्राप्त की। कृष्णा ने अमेरिका के डलास में साउथर्न मेथोडिस्ट यूनिवर्सिटी और बाद में जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में अध्ययन किया, जहां वे फुलब्राइट स्कॉलर थे। फुलब्राइट कार्यक्रम, अमेरिका का अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रमुख कार्यक्रम है, जो 160 से अधिक देशों में छात्रों और विद्वानों को अध्ययन, अध्यापन, शोध कार्यों के लिए प्रदान किया जाता है। भारत में उन्होंने रेणुकाचार्य लॉ कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रोफेसर के रूप में काम किया।
1968 में समाजवादी सांसद के रूप में पहली बार संसद पहुंचे
1968 में एक समाजवादी सांसद के रूप में वह पहली बार संसद पहुंचे और चौथी लोकसभा के सदस्य बने। कृष्णा पांचवीं लोकसभा के लिए भी चुने गए, लेकिन 1972 में उन्होंने राज्य की राजनीति में वापसी करना पसंद किया। वह विधान परिषद के लिए चुने गए और वाणिज्य, उद्योग और संसदीय मामलों के मंत्री बनाए गए, यह पदभार उन्होंने 1972 से 1977 तक संभाला। 1980 में वह लोकसभा में वापस आये और 1983-84 तक उद्योग राज्य मंत्री तथा 1984-85 तक वित्त राज्य मंत्री रहे।
मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में विदेश मंत्री रहे
कानून में विशेषज्ञ कृष्णा 1989 में कर्नाटक विधानसभा के अध्यक्ष बने और 1992 में कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री बने। 1996 में वह राज्यसभा के लिए चुने गए और अक्टूबर 1999 तक इसके सदस्य रहे। 1999 के विधानसभा चुनाव से पहले वह कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष थे, जिसमें पार्टी ने जीत हासिल की। वह अक्तूबर 1999 से मई 2004 तक मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने दिसंबर 2004 से मार्च 2008 तक महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में कार्य किया और मई 2009 से अक्टूबर 2012 तक मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में विदेश मंत्री के रूप में कार्य किया।
कांग्रेस से 50 साल पुराना नाता खत्म किया
2017 में वह भाजपा में शामिल हो गए, जिससे कांग्रेस के साथ उनका लगभग 50 साल पुराना नाता खत्म हो गया। उन्होंने सात जनवरी, 2023 को राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की।