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Ayush Talk: क्या है कर्कटी और कोरोना में समानता, इसको लेकर आयुर्वेद में क्या रहस्य छिपे हैं? जानें सबकुछ

Sat, 22 Oct 2022 07:42 PM IST
हिमांशु मिश्रा स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Sat, 22 Oct 2022 07:42 PM IST
सार

केंद्रीय आयुष मंत्रालय और राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में 'कर्कटी और कोरोना में समानता' विषय पर वेबीनार आयोजित हुआ। इसमें बतौर वक्ता आयुष भारत के डिप्टी मेडिकल कमिश्नर डॉ. जी प्रभाकर राव ने शिरकत की।
 

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What is the similarity between karkati and corona, what are the secrets hidden in Ayurveda about this?
डॉ. जी प्रभाकर राव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कोरोनाकाल में पूरी दुनिया परेशान रही। अस्पतालों में बेड और ऑक्सीजन की कमी पड़ गई। इस बीच, आयुर्वेद ने करोड़ों भारतीयों की जान को सुरक्षित किया। आयुर्वेद की मदद से लोगों ने कोरोना को हराने में कामयाबी हासिल की। ये बातें शनिवार को केंद्रीय आयुष मंत्रालय और राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित वेबिनार से निकलकर सामने आई। 
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'जाने क्या है कर्कटी व कोरोना में समानता और आयुर्वेद में छुपे रहस्य' विषय पर आयोजित वेबिनार में बतौर वक्ता आयुष भारत के डिप्टी मेडिकल कमिश्नर डॉ. जी प्रभाकर राव ने शिरकत की। डॉ. राव लंबे समय से आयुर्वेद चिकित्सा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। उन्होंने कोरोना और कर्कटी पर खुलकर कई अहम जानकारी दी। आइए जानते हैं...
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कहां से आया कर्कटी शब्द? 
कोरोना के नाम से तो किसी वायरस का इतिहास आयुर्वेद में नहीं है, लेकिन महर्षि वाल्मिकी के योगवासिष्ठ ग्रंथ में जरूर कर्कटी नाम से इसकी जानकारी दी गई है। इसके अनुसार, दोनों में बिल्कुल समानता हैं। इसके कारण से लेकर लक्षण तक समान हैं। फैलने का तरीका भी एक जैसा ही है। इस ग्रंथ में जीवन का पूरा रहस्य दर्ज है। इसमें लाइफ स्टाइल से लेकर जीवन जीने के तरीके तक को बताया गया है। इस ग्रंथ के कर्कटोपाख्यम पाठ में कर्कटी का रहस्य बताया गया है। इस ग्रंथ में कर्कटी एक राक्षस था, जिसने पूरी दुनिया को खत्म करने के लिए भगवान ब्रह्म से वरदान लिया था। लेकिन ब्रह्मा जी ने उससे कहा कि तुरंत दुनिया को खत्म तो नहीं हो सकती है, हां धीरे-धीरे जरूर इसका प्रभाव हो सकता है। 
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कोरोना और कर्कटी में कितनी समानताएं? 
कर्कटी और कोरोना दोनों का ताल्लुक श्वास (सांस), खून से भी ताल्लुक रखता है। ग्रंथ में लिखा गया है कि कर्कटी भी इंसान के लंग्स पर पहले अटैक करती है। इसके बाद दिल और फिर लिवर पर इसका प्रभाव होता है। शरीर के इन अंगों में काफी दर्द होगा और फिर इंसान की मौत हो जाएगी। ऐसा ही कोरोना से संक्रमित मरीजों के साथ भी हुआ। धर्म और प्रकृति के विरूद्ध चलने के कारण कर्कटी का कहर कलयुग में देखने को मिला। 

इसके इलाज में कितनी समानताएं? 
हमारे ग्रंथों में वायरस से जुड़े माइक्रो ऑर्गेनाइज्म की जानकारी भी है। हां, इनको अलग-अलग नाम जरूर दिए गए हैं। ग्रंथ में राक्षस के बारे में बताया गया है, जो खून पर असर डालता है। यतुधना के बारे में बताया गया है, जो इंसान को दर्द देते हैं, पिशाच के बारे में जिक्र है, जिससे खान-पान प्रभावित होता है। जैसे कोरोना के लक्षण हैं, ठीक उसी तरह के लक्षणों की जानकारी ग्रंथों में भी बताया गया है। इसके अनुसार, पहले इंसान में बुखार आता है, फिर त्वजा पर प्रभाव पड़ता है। इसके बाद दर्द होता है, दिल पर असर पड़ता है, फेफड़े प्रभावित होते हैं। 

आयुर्वेद में कितने संक्रामक रोग दर्ज हैं? 
त्वचा से जुड़ी बीमारी, बुखार, टीबी और कंजक्टिवाइटिस जैसी बीमारियों को संक्रामक बताया गया है। इन सबके फैलने का तरीका लगभग समान होता है।  

बीमारी के फैलने का कारण ग्रंथों में क्या बताया गया है? 
सुश्रुत संहिता में इसको लेकर डिटेल जानकारी दी गई है। इसमें बीमारी फैलने के कारणों के बारे में भी बताया गया है। कोई भी बीमारी पहले प्रसंगात के जरिए फैलता है। प्रसंगात का मतलब ड्रॉपलेट (लार) से होता है। इसके बाद गात्र संस्सपर्शनात आता है। इसका मतलब है कि एक-दूसरे के संपर्क में आना, शारीरिक संबंध बनाना होता है। फिर निश्वासात, शास्यासनात, शहभोजनात, वस्त्रमाल्युयानुलेपनात आता है। निश्वासात का मतलब होता है कि सांस लेते समय लार आना होता है।  शास्यासनात का मतलब होता है कि बीमार व्यक्ति से अगर बिस्तर शेयर करते हैं तो आप भी संक्रमित हो सकते हैं। शहभोजनात में अगर कोई संक्रमित व्यक्ति को अपना भोजन शेयर करता है तो वह भी उसकी चपेट में आ सकता है। इसी तरह वस्त्रमाल्युयानुलेपनात होता है। इसमें अगर कोई बीमार व्यक्ति से अपने कपड़े, कॉस्मेटिक के सामान शेयर करता है तो वह भी बीमार हो सकता है। 

बचाव के क्या तरीके हैं?
इन संक्रामक रोगों से बचाव के लिए जो उपाय दिए गए हैं, उसका भी उल्लेख भी ग्रंथों में दिया गया है। जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग, साफ-सफाई जैसे बचाव के उपाय भी शामिल हैं। ग्रंथ में लोगों को छाता लेकर चलने की सलाह दी गई है। मतलब अगर दो व्यक्तियों के पास छाता है तो दोनों के बीच की दूरी कम से कम तीन फीट हो जाएगी। इस छाते से किसी तरह का संक्रमण भी शरीर तक नहीं पहुंचेगी। ग्रंथ में आचमन के बारे में कहा गया है। मतलब कि हाथ को बार-बार साफ करने की परंपरा थी। इसी तरह मास्क को लेकर भी पहले से कहा गया है। ग्रंथ में कहा गया है कि अगर आप हंसते हैं, खांसते हैं, छींकते हैं तो मुंह को बंद करके करिए। इससे दूसरों का भी बचाव होगा। 


तो कोरोना के बारे में हजारों साल पहले ही लिखा जा चुका था? 
योगवासिष्ठ ग्रंथ में जो कर्कटी के बारे में जिक्र किया गया है, वो काफी हद तक कोरोना के समान है। ग्रंथ में लिखा है कि कर्कटी का प्रसार हिमालय से होगा। वही हुआ भी। चीन से इसकी शुरुआत हुई। इसी तरह ग्रंथ में कहा गया है कि कर्कटी कहीं पर भी छिप सकती है। मतलब मोबाइल, कपड़े, त्वचा हर जगह इसकी मौजूदगी हो सकती है, जैसा कोरोना में हुआ। कर्कटी को सूक्ष्म से भी सूक्ष्म बताया गया। कोरोनावायरस भी काफी सूक्ष्म है। कर्कटी का भूख भी बड़ा है। ये पूरे जगत को समाप्त करने की क्षमता रखता है। कोरोना में भी यही आलम है। कर्कटी भी अपना रूप बदलता है और कोरोना भी।  

इससे बचाव और इलाज के क्या उपाय हैं? 
ग्रंथों में संक्रमण से बचाव और उसके इलाज के भी उपाय दिए गए हैं। खान-पान के बारे में बताया गया है। आयुर्वेदिक औषधियों का जिक्र है। कोरोनाकाल में इन्हीं औषधियों का खूब प्रयोग हुआ। इसकी मदद से बहुत से लोगों ने खुद का बचाव किया। 
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