Pashmina March: क्या है चीन सीमा पर होने वाला पश्मीना मार्च, जिसने बढ़ाया 'ठंडे रेगिस्तान' का तापमान?
सोनम वांगचुक के निकट सहयोगी और अपेक्स बॉडी लेह के कॉर्डिनेटर जिगमत पलजोर ने अमर उजाला को बताया कि रात में जब तापमान शून्य से 12 डिग्री सेल्सियस तक नीचे चला जाता है, उस समय भी लगभग 300-400 लोग विरोध स्थल पर बैठे थे।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान में चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच हुई खूनी झड़प के बाद समूचा केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख चर्चा में हैं। 3500 मीटर की ऊंचाई पर बसा ठंडे रेगिस्तान के नाम से मशहूर लद्दाख में सर्दियों में तापमान माइनस में पहुंच जाता है। वहीं बेहद शांत रहने वाले लद्दाखी इन दिनों बेहद गुस्से में हैं। इसकी वजह है उनकी केंद्र सरकार से उनकी नाराजगी। उनकी नाराजगी की दो वजह हैं, पहली लद्दाख को छठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए, वहीं दूसरी मांग है कि लद्दाख को दो लोकसभा सीटें (करगिल और लेह) देने के साथ पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए।
इन्हीं मांगों को लेकर थ्री इंडियट्स फिल्म से मशहूर हुए फुनसुख वांगडू यानी प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक 21 दिन के अनशन पर भी बैठे थे, जिसे उन्होंने क्लाइमेट फास्ट नाम दिया था। लेकिन केंद्र की तरफ से उनकी मांगों और अनशन तोड़ने को लेकर कोई पहल नहीं की गई। जिसके बाद क्लाइमेट एक्टविस्ट और मैग्सेस पुरस्कार से सम्मानित सोनम वांगचुक ने लेह में सात मार्च को चीन सीमा (LAC) से लगे इलाकों में पश्मीना मार्च निकालने का एलान कर दिया। उनके मार्च को हर लद्दाखी का जनसमर्थन मिल रहा है, जिसके बाद वहां प्रशासन ने लेह में धारा 144 लागू करते हुए इंटरनेट बैन का आदेश भी जारी कर दिया। उनकी इस मुहिम को बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्गों और महिलाओं तक का समर्थन मिल रहा है।
चीन के हाथों खो रहे हैं अपने चरागाह
सोनम वांगचुक के निकट सहयोगी और अपेक्स बॉडी लेह के कॉर्डिनेटर जिगमत पलजोर ने अमर उजाला को बताया कि रात में जब तापमान शून्य से 12 डिग्री सेल्सियस तक नीचे चला जाता है, उस समय भी लगभग 300-400 लोग विरोध स्थल पर बैठे थे। अभी भी यहां पुलिस घेरे में 500 लोग मौजूद हैं। उनका कहना है कि लद्दाख के लोग मोदी सरकार के वादे से मुकरने से नाराज हैं। वह कहते हैं कि हमारे केंद्रशासित प्रदेश का प्रशासन एक उपराज्यपाल द्वारा किया जाता है, जो लद्दाख का निवासी नहीं है, और फिर भी हमारे भविष्य के लिए निर्णय लेने के लिए नियुक्त किया गया है। पलजोर ने कहा कि लद्दाख में चीन की सीमा से सटे इलाकों में रहने वाली ट्राइबल कम्यूनिटी अपने चरागाह खो रही है। एक तरफ तो चीन उनकी जमीन पर कब्जा कर रहा है, तो दूसरी तरफ सरकार वहां कई इंडस्ट्रियल प्रोजेक्टस लगा रही है। वे कहां जाएं? वहां के प्रभावित लोगों के पास अपनी भूमि से संबंधित मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार भी नहीं है।
पलजोर ने बताया कि यह पश्मीना मार्च पूर्वी लद्दाख के चीन सीमा से सटे चांगथांग इलाके के उन चरागाहों में चीनी घुसपैठ को उजागर करने और पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्र की जमीनी हकीकतों को सामने लाने के लिए निकाला जा रहा है। उनका दावा है कि चीन ने करीब 4000 वर्ग किमी जमीन पर कब्जा कर लिया है। वह कहते हैं सात मार्च को होने वाले मार्च में पश्मिनी चरवाहों के साथ 5 से 10 हजार लोग शामिल होंगे, जो बताएंगे पहले चरागाह कहां थी और आज कहां है।
क्यों रखा गया पश्मीना मार्च नाम?
लद्दाख के बेहद सेंसेटिव और चीन सीमा से सटे चुशुल इलाके के कांउसलर कोंचोक स्टेनजिन चीनी अतिक्रमण को लेकर हमेशा से ही मुखर हो कर आवाज उठाते रहे हैं। वह भी लद्दाख को छठवीं अनुसूची में शामिल करने और पश्मीना मार्च में शामिल होने के लिए लेह में ही मौजूद हैं। कोंचोक स्टेनजिन ने अमर उजाला को बताया कि हमारे चरागाह अब बफर जोन में बदल चुके हैं। लद्दाख के सुदुर इलाकों में रह रहे लोगों के लिए पशुपालन ही मुख्य व्यवसाय है। लेकिन चीनी सैनिक उन्हें अपने चरागाहों की ओर जाने से रोक रहे हैं। न तो इसे लेकर उन्हें भारत सरकार की ओर से मदद मिल पा रही और न ही सेना और आईटीबीपी भी उनकी रक्षा के लिए कुछ कर रही है। वह बताते हैं कि गोगरा-हॉटस्प्रिंग, चुशुल, पैंगॉन्ग समेत कई इलाकों की जमीन को बफर जोन या नो-मैंस लैंड में बदल दिया गया है। इस क्षेत्र में किसी को भी जाने की अनुमति नहीं है। वह बताते हैं, इन्हीं में से एक है लद्दाख का यह चांगथांग इलाका, जो अपनी पश्मीना ऊन के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। वहां खास तरह की भेड़ें पाई जाती हैं। चांगथांग के पश्चिम में पाकिस्तान और उत्तर और पूर्व में चीन है, जो भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। चांगथांग, भारत का सबसे ऊंचा पठारी इलाका है, जो तिब्बत से सटा हुआ है, जिस पर चीन का कब्जा है। चांगथांग चांग्पा जनजाति का घर है, पश्मीना चरवाहों का इतिहास 3,000 साल से भी पुराना है। स्टेनजिन बताते हैं कि हालात यहां तक पहुंत गए हैं कि चानथांग के खानाबदोश चरवाहे अपनी भेड़ें और याक बेच रहे हैं क्योंकि उनकी हजारों एकड़ प्रमुख चरागाह भूमि पर अतिक्रमण किया जा रहा है।
छठवीं अनुसूची और पश्मीना मार्च का आपस में क्या संबंध?
यह पूछने कि छठवीं अनुसूची और पश्मीना मार्च का आपस में क्या संबंध है, इस पर पलजोर बताते हैं कि लद्दाख की 2.74 लाख (2011 की जनगणना) से अधिक की 97 फीसदी आबादी को ट्राइबल मानते हुए, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने 2019 में सिफारिश की थी कि लद्दाख को छठवीं अनुसूची के तहत लाया जाए। लेकिन जब ट्राइबल लोगों के चरागाह एक तरफ तो चीन हड़प रहा है, तो दूसरी तरफ हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर प्लांट्स को उनकी जमीनें दी जा रही हैं और कई प्रोजेक्टस पाइपलाइन में भी हैं, ऐसे में लद्दाख को छठवीं अनुसूची में शामिल करके ही उनके पर्यावरण और यहां की सांस्कृतिक धरोहर को बचाया जा सकता है। वह कहते हैं कि लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश घोषित करने के बाद लेह और कारगिल की लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (एलएएचडीसी) शक्तिहीन हो गई है। लद्दाख औद्योगिक भूमि आवंटन नीति, 2023 की ड्राफ्ट पॉलिसी इसका उदाहरण है। जबकि एलएएचडीसी के पास भूमि उपयोग और उसके प्रबंधन पर फैसला लेने की शक्तियां हैं, लेकिन ड्राफ्ट पॉलिसी, जिसे लद्दाख में निवेश आकर्षित करने के लिए बनाया गया है, उसमें एलएएचडीसी को भूमि आवंटन और पट्टे से संबंधित फैसला लेने से संबंधित किसी भी अधिकार से पूरी तरह बाहर रखा गया है। पलजोर कहते हैं कि अक्तूबर 2020 में, भाजपा की लद्दाख इकाई ने कहा कि लद्दाख को छठवीं अनुसूची के प्रावधान के तहत शामिल किया जाएगा। लेकिन बाद में वे इस पर बात करने से बचने लगे।
छठवीं अनुसूची में शामिल न करने को लेकर बताई यह वजह
वहीं सरकार के सूत्रों का कहना है कि छठवीं अनुसूची पूर्वोत्तर राज्यों असम, मेघालय, मिजोरम (प्रत्येक में तीन परिषद), और त्रिपुरा (एक परिषद) पर लागू होती है। पूर्वोत्तर के बाहर के किसी भी क्षेत्र को छठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है। यहां तक कि मणिपुर में भी, जहां कुछ स्थानों पर मुख्य रूप से आदिवासी आबादी है, स्वायत्त परिषदें छठवीं अनुसूची में शामिल नहीं हैं। नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश, जो पूरी तरह से आदिवासी बहुल हैं, वे भी छठी अनुसूची में शामिल नहीं हैं। लद्दाख को छठवीं अनुसूची में शामिल करना बहुत मुश्किल होगा। संविधान बहुत स्पष्ट है, छठवीं अनुसूची पूर्वोत्तर के लिए है। देश के बाकी हिस्सों में आदिवासी क्षेत्रों के लिए पांचवीं अनुसूची है। लेकिन सरकार चाहे तो संविधान में संशोधन करके एक विधेयक ला कर लद्दाख को छठवीं अनुसूची में शामिल कर सकती है। सूत्र बताते हैं कि केंद्र ने लद्दाख के लोगों की मांगों पर विचार करने के लिए एक हाई लेवल कमेटी का गठन भी किया था, लेकिन बातचीत सफल नहीं पाई थी। चार मार्च को लद्दाख एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस के नेताओं ने जब गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की, तो उन्होंने मांगें मानने से इनकार दिया। जिसके दो दिन बाद वांगचुक ने लेह में अनशन शुरू कर दिया था।