जम्मू-कश्मीर की अलगाववादी पार्टियां कौन सी हैं, कितना जानते हैं इनके बारे में आप?
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क्या आप जानते हैं कि आखिर ये हुर्रियत कॉन्फ्रेंस क्या है? इसका मकसद क्या है और इसकी शुरुआत कब हुई थी? यदि नहीं, तो हम आपको बता रहे हैं। दरअसल, यह एक ऐसा संगठन है जो कि जम्मू कश्मीर में अलगाववाद की विचारधारा को प्रोत्साहित करती है।
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क्या आप जानते हैं कि आखिर ये हुर्रियत कॉन्फ्रेंस क्या है? इसका मकसद क्या है और इसकी शुरुआत कब हुई थी? यदि नहीं, तो हम आपको बता रहे हैं। दरअसल, यह एक ऐसा संगठन है जो कि जम्मू कश्मीर में अलगाववाद की विचारधारा को प्रोत्साहित करती है।
1987 के नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस ने गठबंधन कर चुनाव लड़ने का एलान किया था। घाटी में इसके खिलाफ बहुत विरोध भी हुआ था। इस चुनाव में भारी बहुमत से जीतकर फारुख अब्दुल्ला ने राज्य में अपनी सरकार बनाई थी। इनके विरोध में खड़ी हुई विरोधी पार्टियों की मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट को केवल चार सीटें मिली थीं जबकि जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस को 40 और कांग्रेस को 26 सीटें मिलीं थीं।
इसके विरोध में घाटी में 13 जुलाई 1993 को ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की नींव रखी गई। इसका काम पूरी घाटी में अलगाववादी आंदोलन को गति प्रदान करना था। यह एक तरह से घाटी में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के विरोध स्वरूप एकत्रित हुई छोटी पार्टियों का महागठबंधन था।
हुर्रियत का मकसद
इस महागठबंधन में केवल वही पार्टियां शरीक हुईं जो कश्मीर को वहां के लोगों के अनुसार जनमत संग्रह कराकर एक अलग पहचान दिलाना चाहते थे। हालांकि इनके मंसूबे पाकिस्तान को लेकर काफी नरम रहे। ये सभी कई मौकों पर भारत की अपेक्षा पाक से अपनी नजदीकियां दिखाते रहे हैं। 90 के दशक में जब घाटी में आतंकवाद चरम पर था तब इन्होंने खुद को वहां एक राजनैतिक चेहरा बनने की कोशिश की लेकिन लोगों ने इसे नकार दिया था।
इनका कहना था कि ये स्थानीय लोगों के मन की बात को सामने लाने का काम कर रहे हैं लेकिन इनके पाक अधिकृत कश्मीर पर कोई राय नहीं है। इनके पर आरोप है कि ये विदेशों से धन लेकर घाटी में अलगाववादी विचारधारा को बढ़ाते हैं। इनके कई नेताओं पर देश विरोधी कार्यों में शामिल होने के आरोप हैं।
हुर्रियत में ही एक राय नहीं
कश्मीर के मसले पर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस में ही एक राय नहीं है। इसमें शामिल कुछ नेता कश्मीर को भारत से अलग कर नया देश बनाने के सपने देखते हैं जबकि कुछ तो इससे भी आगे जाकर कश्मीर को पाकिस्तान में शामिल कराना चाहते हैं। जबकि, एक धड़ा ऐसा भी है जो कश्मीर को और अधिक स्वायत्ता देने की मांग करता है।
हुर्रियत का घाटी के आतंकियों से संबंध
कई मौकों पर यह बात सामने आई है कि इन अलगाववादी नेताओं के संबंध घाटी में सक्रिय आतंकवाद से रहा है। इसके कई सदस्य तो ऐसे भी हैं जो पूर्व में आतंकवादी भी रहे हैं।
अलग है हुर्रियत का संविधान
ये कहते हैं कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस एक सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक संगठन है जो जम्मू कश्मीर के लोगों के बीच रहकर संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक घाटी में शांतिपूर्ण संघर्ष को बढ़ावा देने का काम करेगा जिससे यहां के लोगों को आजादी मिल सके। यह भारत, पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ मिलकर एक वैकल्पिक हल निकालने की कोशिश करेगी।