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बंगाल चुनाव: किसके पाले में जाएंगे दलित वोटर, भाजपा-टीएमसी के बीच लुभाने की होड़

Tue, 13 Apr 2021 03:39 PM IST
दीप्ति मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता Published by: दीप्ति मिश्रा Updated Tue, 13 Apr 2021 03:39 PM IST
सार

पश्चिम बंगाल चुनाव में अभी चार चरण के लिए मतदान होना बाकी है। जिन क्षेत्रों में मतदान होना है, उन क्षेत्रों में सभी राजनीतिक दल अपना अपना बहुमत सुनिश्चित करने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं। 

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West Bengal 2021: the battle for the Dalit vote, Where the national hegemon is a local rebel, TMC, Narendra Modi
Mamata banerjee, PM Narendra Modi, Amit Shah

विस्तार

पश्चिम बंगाल चुनाव में अभी चार चरण के लिए मतदान होना बाकी है। जिन क्षेत्रों में मतदान होना है, उन क्षेत्रों में सभी राजनीतिक दल अपना अपना बहुमत सुनिश्चित करने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं। मतदाताओं को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं।इस बीच, सबसे ज्यादा सुर्खियों में दलित मतदाता हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) दोनों की कोशिशें दलित मतदाताओं को अपने पलड़े में करने की है, लेकिन देखना ये होगा कि दलित मतदाता किसका साथ देंगे। यहां जानें बंगाल चुनाव में दलित मतदाताओं की भूमिका...

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टीएमसी और भाजपा दोनों पार्टियां दलित समुदाय को लुभाने की भरपूर कोशिश कर रही हैं क्योंकि ये समुदाय इस चुनावी लड़ाई में निर्णायक साबित हो सकते है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पश्चिम बंगाल के मतदाताओं में से 23.5 फीसदी दलित समुदाय से हैं और इनकी आबादी में से 25-30 फीसदी मतदाता 294 सदस्यीय विधानसभा में करीब 100 से 110 सीटों में परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। राज्य में जहां 34 वर्ष तक वाम दलों के शासन में चुनावी विमर्श पर वर्ग संघर्ष का साया रहा है। वहीं अब तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों दलितों एवं अन्य पिछड़ा वर्गों को मतदाताओं को अपने पलड़े में करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

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बंगाल में इतनी सीटें हैं आरक्षित

कूच बिहार और उत्तर बंगाल के अन्य सीमावर्ती जिलों में रहने वाले राजबंशियों तथा पूर्ववर्ती पूर्वी पाकिस्तान से आए मतुआ शरणार्थियों एवं उनके वंशजों का दक्षिण बंगाल में 30-40 सीटों पर प्रभाव है। वे पश्चिम बंगाल में दो सबसे बड़े दलित समुदाय हैं, जिन्हें लुभाने के लिए तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों लगे हुए हैं। दोनों दल दलितों और अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) के अधिकारों की बात कर रहे हैं। राज्य में 68 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए तथा 16 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं।

भाजपा और टीएमसी ने किया ये बड़ा वादा
टीएमसी और भाजपा दोनों ने ही सत्ता में आने पर महिष्य, तेली, तामुल और साहा जैसे समुदायों को मंडल आयोग की सिफारिशों के अनुसार ओबीसी की सूची में शामिल करने का वादा किया है। 

हर जुगत भिड़ा रहीं पार्टियां
तृणमूल कांग्रेस ने जहां इस चुनाव में 79 दलित प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मतुआ संप्रदाय के आध्यात्मिक गुरु हरिचंद ठाकुर के जन्मस्थान बांग्लादेश के ओराकांडी में एक प्रसिद्ध मंदिर का दौरा किया था। तृणमूल कांग्रेस के एक उम्मीदवार द्वारा कथित तौर पर दलितों की तुलना भिखारियों से करने का मुद्दा भी चुनाव में चर्चा का विषय बना हुआ है।

लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिला था लाभ

बता दें कि भारतीय जनता पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य की अधिकतर सुरक्षित सीटों पर जीत हासिल की थी, जिसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने अपनी नीति में बदलाव किया और सभी शरणार्थी कॉलोनियों को नियमित करके उन्हें भूमि अधिकार दिए। इसके साथ ही नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (सीएए) के क्रियान्वयन में देरी तथा संशय की स्थिति को भी भुनाने का प्रयास किया। प्रदेश भाजपा प्रमुख दिलीप घोष ने कहा कि भाजपा ने पिछड़ा वर्गों की आकांक्षाओं के बारे में बात करके उन्हें आवाज दी है। दलित इस चुनाव में निर्णायक कारक होंगे और हमारे पक्ष में मतदान करेंगे।

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