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सुप्रीम कोर्ट: मौलिक कर्तव्यों को लागू करने के लिए कानून बनाने को लेकर याचिका, अटॉर्नी जनरल बोले- यह विचार करने योग्य नहीं 

Mon, 04 Apr 2022 10:42 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Mon, 04 Apr 2022 10:42 PM IST
सार

वेणुगोपाल ने कहा कि मुझे इस याचिका पर आपत्ति है। लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से बहुत काम किया गया है। स्कूलों के पाठ्यक्रम में अनुच्छेद-51 ए को शामिल किया गया हैं। पूरे देश में बहस हुई है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री समेत अन्य नेताओं ने इस मुद्दे पर समय-समय पर संबोधित भी किया है। एक साल का जागरूकता अभियान शुरू किया गया था। 

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Website of Justice Dept shows tremendous work done for sensitizing citizens about Art 51 A AG to Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कानून और न्याय मंत्रालय ने नागरिकों और छात्रों को मौलिक कर्तव्यों के बारे में जागरूक करने के लिए जबरदस्त काम किया है। मौलिक कर्तव्यों को लागू करने के लिए एक कानून बनाने की मांग वाली वकील दुर्गादत्त की याचिका का विरोध करते हुए अटॉर्नी जनरल ने जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ के समक्ष कहा, यह याचिका विचार करने योग्य नहीं है।

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वेणुगोपाल ने कहा कि मुझे इस याचिका पर आपत्ति है। लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से बहुत काम किया गया है। स्कूलों के पाठ्यक्रम में अनुच्छेद-51 ए को शामिल किया गया हैं। पूरे देश में बहस हुई है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री समेत अन्य नेताओं ने इस मुद्दे पर समय-समय पर संबोधित भी किया है। एक साल का जागरूकता अभियान शुरू किया गया था। 
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इस पर पीठ ने कहा कि हम नोटिस जारी करने में भी सतर्क थे और हमने कहा था कि यह राजनीतिक व्यवस्था के दायरे में आता है। पीठ ने कहा, हम केवल  जानना चाहते थे कि क्या रंगनाथ मिश्रा मामले में फैसले के आलोक में कोई कदम उठाया गया है। वहीं केंद्र सरकार की ओर से पेश एक वकील ने इस संबंध में हलफनामा दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा। जिसके बाद पीठ ने सुनवाई जुलाई तक के लिए टाल दी।
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सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल केंद्र को जारी किया था नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने 21 फरवरी को इस मसले पर अटॉर्नी जनरल और केंद्र को नोटिस जारी किया था। याचिका में कहा गया है कि भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा ने 1998 में सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र लिखा था। उस पत्र को याचिका में तब्दील कर दिया गया था और शीर्ष अदालत ने वर्ष 2003 में केंद्र सरकार को संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग की रिपोर्ट की सिफारिशों पर विचार करने और इसे लागू करने के लिए उचित कदम उठाने का निर्देश दिया था। 


रिपोर्ट ने नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों के संचालन और उनके शीघ्र कार्यान्वयन पर जस्टिस जेएस वर्मा समिति के सुझाव को स्वीकार कर लिया था। समिति ने केंद्र और राज्य सरकारों को लोगों को संवेदनशील बनाने और मौलिक कर्तव्यों के बारे में नागरिकों के बीच सामान्य जागरूकता पैदा करने की सिफारिश की थी। साथ ही  कई अन्य सिफारिशें की गई थी। हालांकि इस अदालत की उक्त सिफारिशों और निर्देशों के बावजूद कुछ नहीं हुआ और एक मायावी लक्ष्य बना हुआ है।

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