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Monsoon: कमजोर मानसून और भीषण गर्मी से कृषि पर संकट बढ़ने की आशंका, मौसम विभाग का अनुमान
Sun, 03 May 2026 05:40 AM IST
Devesh Tripathi
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sun, 03 May 2026 05:40 AM IST
सार
डब्ल्यूएमओ के अनुसार 2026 में मानसून का स्वरूप असंतुलित रह सकता है, जिसमें एक ओर लंबे सूखे दौर की संभावना है तो दूसरी ओर कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ सकती हैं। ऐसी स्थिति बाढ़ का खतरा भी बढ़ा सकती है। डब्ल्यूएमओ के अनुसार दक्षिण एशिया में अधिकतम और न्यूनतम दोनों तापमान सामान्य से ऊपर रहने की संभावना है।
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सूखा (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : एएनआई
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विस्तार
दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए 2026 का मानसून चुनौतीपूर्ण रहने के संकेत दे रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के अनुसार जून से सितंबर के बीच मानसूनी वर्षा औसत से कम रह सकती है, जबकि दिन और रात दोनों समय तापमान सामान्य से अधिक रहने का अनुमान है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने भी 13 अप्रैल 2026 को जारी अपने पहले दीर्घावधि पूर्वानुमान में मानसून के सामान्य से कमजोर रहने की आशंका जताई है। ऐसे में कम बारिश और बढ़ती गर्मी का संयुक्त प्रभाव कृषि, जल संसाधनों और आम जीवन पर व्यापक दबाव डाल सकता है। मानसून की कमी का सबसे अधिक असर मध्य भारत के कृषि प्रधान क्षेत्रों में दिख सकता है, जहां वर्षा सामान्य से कम रहने की आशंका है।
कई राज्यों में सामान्य से ज्यादा बारिश की संभावना
हालांकि उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य या सामान्य से अधिक बारिश संभव है, लेकिन पूरे क्षेत्र में वर्षा का वितरण असमान रहने की संभावना है। दक्षिण एशिया में कुल सालाना वर्षा का लगभग 75 से 90 प्रतिशत हिस्सा जून से सितंबर के बीच होता है। ऐसे में इस अवधि में कमी का सीधा असर खेती, जल उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। मानसून को लेकर अनिश्चितता ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान में बुवाई की तैयारी कर रहे किसानों के लिए शुरुआती संकेत अनुकूल नहीं हैं।
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सूखे की आशंका के साथ बाढ़ का भी जोखिम
डब्ल्यूएमओ के अनुसार 2026 में मानसून का स्वरूप असंतुलित रह सकता है, जिसमें एक ओर लंबे सूखे दौर की संभावना है तो दूसरी ओर कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ सकती हैं। ऐसी स्थिति बाढ़ का खतरा भी बढ़ा सकती है। डब्ल्यूएमओ के अनुसार दक्षिण एशिया में अधिकतम और न्यूनतम दोनों तापमान सामान्य से ऊपर रहने की संभावना है। इसका अर्थ है कि दिन के साथ-साथ रात में भी गर्मी से राहत नहीं मिलेगी। लगातार उच्च तापमान लू की घटनाओं को बढ़ा सकता है, जिससे बुजुर्गों, बच्चों और कमजोर वर्गों के लिए स्वास्थ्य जोखिम बढ़ेंगे। इसके साथ ही कूलिंग की मांग बढ़ने से बिजली व्यवस्था पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
अल नीनो रहेगा प्रभावी
डब्ल्यूएमओ के अनुसार 2026 के मानसून पर अल नीनो का प्रभाव पड़ सकता है। अल नीनो एक ऐसी जलवायु प्रक्रिया है जिसमें प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, जिससे वैश्विक स्तर पर हवाओं और मौसम के पैटर्न में बदलाव आता है। इसका प्रभाव भारतीय मानसून को कमजोर करने के रूप में देखा जाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार फिलहाल स्प्रिंग प्रेडिक्टेबिलिटी बैरियर का प्रभाव भी बना हुआ है। यह मार्च से मई के बीच का वह दौर होता है जब समुद्र और वायुमंडल में तेजी से बदलाव होते हैं, जिससे लंबी अवधि के मौसम पूर्वानुमान पूरी तरह सटीक नहीं रह पाते।
अन्य वीडियो
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भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने भी 13 अप्रैल 2026 को जारी अपने पहले दीर्घावधि पूर्वानुमान में मानसून के सामान्य से कमजोर रहने की आशंका जताई है। ऐसे में कम बारिश और बढ़ती गर्मी का संयुक्त प्रभाव कृषि, जल संसाधनों और आम जीवन पर व्यापक दबाव डाल सकता है। मानसून की कमी का सबसे अधिक असर मध्य भारत के कृषि प्रधान क्षेत्रों में दिख सकता है, जहां वर्षा सामान्य से कम रहने की आशंका है।
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कई राज्यों में सामान्य से ज्यादा बारिश की संभावना
हालांकि उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य या सामान्य से अधिक बारिश संभव है, लेकिन पूरे क्षेत्र में वर्षा का वितरण असमान रहने की संभावना है। दक्षिण एशिया में कुल सालाना वर्षा का लगभग 75 से 90 प्रतिशत हिस्सा जून से सितंबर के बीच होता है। ऐसे में इस अवधि में कमी का सीधा असर खेती, जल उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। मानसून को लेकर अनिश्चितता ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान में बुवाई की तैयारी कर रहे किसानों के लिए शुरुआती संकेत अनुकूल नहीं हैं।
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सूखे की आशंका के साथ बाढ़ का भी जोखिम
डब्ल्यूएमओ के अनुसार 2026 में मानसून का स्वरूप असंतुलित रह सकता है, जिसमें एक ओर लंबे सूखे दौर की संभावना है तो दूसरी ओर कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ सकती हैं। ऐसी स्थिति बाढ़ का खतरा भी बढ़ा सकती है। डब्ल्यूएमओ के अनुसार दक्षिण एशिया में अधिकतम और न्यूनतम दोनों तापमान सामान्य से ऊपर रहने की संभावना है। इसका अर्थ है कि दिन के साथ-साथ रात में भी गर्मी से राहत नहीं मिलेगी। लगातार उच्च तापमान लू की घटनाओं को बढ़ा सकता है, जिससे बुजुर्गों, बच्चों और कमजोर वर्गों के लिए स्वास्थ्य जोखिम बढ़ेंगे। इसके साथ ही कूलिंग की मांग बढ़ने से बिजली व्यवस्था पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
अल नीनो रहेगा प्रभावी
डब्ल्यूएमओ के अनुसार 2026 के मानसून पर अल नीनो का प्रभाव पड़ सकता है। अल नीनो एक ऐसी जलवायु प्रक्रिया है जिसमें प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, जिससे वैश्विक स्तर पर हवाओं और मौसम के पैटर्न में बदलाव आता है। इसका प्रभाव भारतीय मानसून को कमजोर करने के रूप में देखा जाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार फिलहाल स्प्रिंग प्रेडिक्टेबिलिटी बैरियर का प्रभाव भी बना हुआ है। यह मार्च से मई के बीच का वह दौर होता है जब समुद्र और वायुमंडल में तेजी से बदलाव होते हैं, जिससे लंबी अवधि के मौसम पूर्वानुमान पूरी तरह सटीक नहीं रह पाते।
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