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Wayanad Crisis: अपना गम भूल वायनाड आई महिला एंबुलेंस चालक, घायलों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने में लगा दी जान
Fri, 09 Aug 2024 12:19 PM IST
काव्या मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वायनाड (केरल)
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वायनाड (केरल)
Published by: काव्या मिश्रा
Updated Fri, 09 Aug 2024 12:19 PM IST
सार
विनाशकारी भूस्खलन के बाद लापता लोगों की तलाश के लिए बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान शुरू हुआ। केरल में पहली महिला एंबुलेंस चालक दीपा जोसेफ ने इस अभियान में बड़ी भूमिका निभाई।
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वायनाड में भूस्खलन के बाद बचाव और राहत कार्य
- फोटो : PTI
विस्तार
केरल के वायनाड जिले में 30 जुलाई को मेप्पाडी के पास विभिन्न पहाड़ी इलाकों में आए भूस्खलन ने भारी तबाही मचा दी थी। इस प्राकृतिक आपदा के कारण 300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि सैकड़ों घायल हैं। भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों चूरलमाला और मुंडक्कई में सेना का राहत व बचाव कार्य जारी है। सेना के अलावा, केरल की एक महिला लगातार घायलों की मदद कर रही है। इस भयावह आपदा की यादें अभी भी इस महिला को परेशान कर रही हैं।
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विनाशकारी भूस्खलन के बाद लापता लोगों की तलाश के लिए बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान शुरू हुआ। केरल में पहली महिला एंबुलेंस चालक दीपा जोसेफ ने इस अभियान में बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने आपदा वाले क्षेत्र से घायलों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने और मेप्पाडी में बने स्थायी मुर्दाघर में मृतकों व पीड़ितों के शरीर के अंगों को ले जाने का काम किया। इन्हीं सब भयानक दृश्य को याद करके वह अपने आंसुओं को रोक नहीं सकीं।
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बेटी की मौत से थी सदमे में
अपनी बेटी की ब्लड कैंसर के कारण जान जाने के बाद दीपा जोसेफ ने मानसिक स्थिति सही नहीं बताते हुए ड्राइविंग से ब्रेक ले लिया था। हालांकि, जब उन्होंने सुना कि वायनाड में एंबुलेंस की जरूरत है तो वह तुरंत कोझिकोड से वायनाड आ गईं। भूस्खलन के बाद पांच दिनों तक चले तलाशी अभियान ने उनकी पूरी सोच को बदल लिया। उन्हें एहसास हुआ कि उनके साथ जो हुआ उससे आसानी से उभरा जा सकता था।
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पहले लोग अपने प्रियजनों को खोने पर नहीं कर पा रहे थे विश्वास
दीपा ने बताया, 'एक और दो दिन हमने ऐसे लोगों को देखा जो यह मानने के लिए तैयार नहीं थे कि उनके अपने अब नहीं रहे। लेकिन उसके बाद के दिनों में वही लोग मुर्दाघर में आए और प्रार्थना करने लगे कि जो शव मिले हैं वो उनके प्रियजनों के हों। अगले दो दिनों में और दिल दहलाने वाले नजारे देखे। बहुत सारे शव, लोगों के कटे हुए अंग और बुरी तरह कुचले हुए शव। मैंने सोचा कि अब यह सहन नहीं कर पाऊंगी।'
उन्होंने आगे कहा, 'मैं साढ़े चार साल से एंबुलेंस चालक के रूप में काम कर रही हूं। मैंने कई दिन पुराने और बुरी तरह सड़े हुए शव मुर्दाघर तक पहुंचाए। वहीं वायनाड में रिश्तेदारों को सिर्फ कटी हुई अंगुली या कटे हुए अंग को देखकर शवों की पहचान करनी पड़ी।'
कटे हुए अंगों से नहीं चल रहा पता
उन्होंने कहा कि कई बार तो आंतरिक अंगों को मुर्दाघर में लाया गया। लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि ये अंग मनुष्यों के हैं या जानवरों के। दीपा ने कहा कि पूरा मुर्दाघर सड़ी हुई लाशों की बदबू से भरा हुआ था। शवों से निकलने वाली गैसों ने हमारी दृष्टि को धुंधला कर दिया था।
दीपा ने बताया कि आपदा की भयावहता को देखते हुए अगले दिन वापस जाने का फैसला किया था, लेकिन कैसे उन्होंने बाद में मदद करना जारी रखा। उन्होंने कहा, 'मैं एक दिन के लिए वापस गई और अपने बेटे को, जो घर पर अकेला था, साथ ले आई। अब दूसरे जिलों से एंबुलेंस वापस चली गई हैं और मैं भी जल्द ही वापस जाऊंगी।'
मैं अब बेरोजगार हूं: दीपा
आपदा प्रभावित क्षेत्रों में स्वयंसेवकों के बीच दीपा जोसेफ एक जाना-पहचाना चेहरा हैं। जब वह अपनी बेटी के बारे में सोचकर दुखी हो जाती हैं तो आपदा पीड़ित उन्हें अपना दुख भुलाकर सांत्वना देते हैं। उन्होंने कहा, 'मैं अब बेरोजगार हूं और जल्द से जल्द एंबुलेंस चलाना चाहती हूं।'
पीड़ितों के परिजन और जिंदा बचे लोग खोज दल में शामिल
वायनाड जिले में 30 जुलाई को हुए विनाशकारी भूस्खलन के बाद लापता लोगों की तलाश के लिए शुक्रवार को बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान शुरू हुआ, जिसमें जीवित बचे लोग और पीड़ितों के रिश्तेदार शामिल थे।
राज्य सरकार के अनुसार, जिले में मुंडक्कई और चूरलमाला बस्तियों में आए भूस्खलन के बाद 131 लोग लापता हैं। तलाशी अभियान एक दिन चलाने की योजना थी, लेकिन अधिकारियों ने बताया कि यह सुबह 11 बजे समाप्त होगा।
इस बीच, मंत्री पीए मोहम्मद रियास ने बताया कि तलाश अभियान रविवार को भी जारी रहेगा, जिसमें पीड़ितों के रिश्तेदार भी शामिल हैं। उन्होंने कहा, 'आज हमें सुरक्षा कारणों से तलाशी अभियान खत्म करने की जरूरत है। हम रविवार को जारी रखेंगे।'