देश में पानी के लिए मचा हाहाकार, एक-एक बूंद को मोहताज जिंदगी
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91 प्रमुख जलाशयों में सिर्फ 25 फीसदी पानी
देश के 91 जलाशयों में पानी कुल क्षमता का 25 प्रतिशत ही बचा है। केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक 31 मार्च को 91 प्रमुख जलाशयों में सिर्फ 39.651 अरब क्यूबिक मीटर पानी था। यह मात्रा पिछले साल की तुलना में 31 फीसदी कम है।
जलाशयों में मौजूद पानी की यह मात्रा पिछले दस साल के औसत से भी 25 फीसदी कम है। केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक पानी की कमी का सबसे ज्यादा असर उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु पर होगा।
महाराष्ट्र में पानी पर पहरा, दंगे की नौबत
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा, उत्तर महाराष्ट्र और विदर्भ के 14 जिलों में सूखे के चलते पानी के लिए हाहाकार मच गया है। दंगा होने की नौबत तक आ गई है। इसके चलते लातूर और परभणी जिले में धारा 144 लागू कर पानी पर पहरा लगा दिया गया है। विधान परिषद में विपक्ष के नेता धनंजय मुंडे का कहना है कि मराठवाड़ा के 25 लाख से ज्यादा किसान गांव छोड़ चुके हैं। गांव के गांव खाली हो गए हैं।
12 राज्य झेल रहे सूखा
बुंदेलखंड में भी बुरे हैं हालात
बुंदेलखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट गहराता जा रहा है। हैंडपंप सूख रहे हैं और कुओं का पानी गहराई में जा रहा है। भोजन का भी संकट है। फसल न होने की वजह से कृषि श्रमिकों को काम नहीं मिल पाया है।
सूखे से शहरी आबादी भी बुरी तरह से प्रभावित है। झांसी महानगर के कई हिस्सों में ही पेयजल संकट शुरू हो गया है। कई क्षेत्रों में घरों में लगी बोरिंग साथ छोड़ने लगी हैं। इन इलाकों में पानी के टैंकरों की आवाजाही बढ़ रही है।
एनजीओ का दावा, 12 राज्य झेल रहे सूखा
याचिकाकर्ता एनजीओ का दावा है कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा समेत देश के 12 राज्यों के कई क्षेत्र सूखे की मार झेल रहे हैं। इन राज्यों में कर्नाटक, मध्य प्रदेश, आंध्र, तेलंगाना, गुजरात, ओडिशा, झारखंड, महाराष्ट्र, बिहार भी शामिल हैं।
एक-एक बूंद पानी को मोहताज जिंदगी
सरकारी स्तर पर बुंदेलखंड के लिए आने वाले पैसे को पेयजल के मद में खर्च करने में भी कंजूसी की गई। आंकड़ों के अनुसार बुंदेलखंड के 70 फीसदी भूमिगत जलस्तर में भारी गिरावट पाई गई है।
जालौन, बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, महोबा सहित समूचे बुंदेलखंड में वर्ष1871 और 2002 के बीच इस क्षेत्र में 22 बार सूखा पड़ा। वर्ष 2009 की कृषि और सहकारिता विभाग की रिपोर्ट के अनुसार 2004 और 2007 के बीच पड़े सूखे ने बुंदेलखंड को ज्यादा प्रभावित किया। रही सही कसर पिछले तीन साल से पड़ रहे सूखे ने निकाल दिया।
हालत यह है कि इलाके की बेतवा, केन, पाहुज और धसान आदि नदिया भी करीब-करीब सूख गईं। जलस्तर नीचे खिसक गया। केन नदी में औसत वार्षिक पानी की मात्रा लगभग 800 क्यूसेक रहती है, लेकिन सर्दियों में इसमें केवल यह 300 क्यूसेक पानी ही रहता है। मई में यह नदी पूरी तरह सूख जाती है। आंकड़ों के अनुसार बुंदेलखंड के 70 फीसदी भूमिगत जलस्तर में भारी गिरावट पाई गई है।
झांसी में गहराने लगा सूखे का संकट
गर्मी की रफ्तार बढ़ते ही बुंदेलखंड में सूखे का संकट भी गहराने लगा है। अत्यधिक सूखा प्रभावित जिले के 53 गांवों में टैंकरों के माध्यम से पेय जलापूर्ति की जा रही है। वहीं बारिश न होने से झांसी के अधिकांश खेतों में रबी की बुआई भी नहीं हो पाई है। गेहूं की 45.06 फीसदी व राई /सरसों की 43.98 फीसदी बुवाई हुई है।
झांसी में महज बीस फीसदी किसानों के पास ही दो हेक्टेअर से अधिक जमीन हैं। सूखे की सबसे ज्यादा मार इन छोटे किसानों पर ही पड़ रही है। बारिश न होने से ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल का जबरदस्त संकट है।
हैंडपंप सूख रहे हैं और कुओं का पानी गहराई में जा रहा है। फसल न होने की वजह से कृषि श्रमिकों को काम नहीं मिल पाया है, जबकि, इस सीजन में फसल की कटाई के एवज में उनका साल भर के अनाज का इंतजाम हो जाता था।
लेकिन, इस बार कृषि श्रमिकों की मुट्ठी खाली है। इतना ही नहीं सूखे से शहरी आबादी भी बुरी तरह से प्रभावित है। पाइप पेयजल योजना से अब तक अछूते रहे पिछोर, बड़ागांव गेट बाहर, राजपूत कालोनी आदि क्षेत्रों में घरों में लगी बोरिंग साथ छोड़ने लगी हैं।
वहीं पेयजल के साथ भोजन के संकट से जूझ रहे जनपद मेें मनरेगा के तहत जिले में 20 हजार मजदूरों से काम लिया जा रहा है। बुंदेलखंड की विशेष हालातों को देखते हुए यहां साल के कार्यदिवस सौ से बढ़ाकर डेढ़ सौ कर दिए गए हैं।
सूखे से यह हैं हालात
बारिश न होने की वजह से जनपद के अधिकांश खेतों में रबी की बुआई भी नहीं हो पाई है। गेहूं की 45.06 प्रतिशत तथा राई /सरसों की 43.98 प्रतिशत बुवाई हुई है। इसके अलावा विपरीत परिस्थितियों में तैयार की गई फसल की स्थिति भी ठीक नहीं है। मिट्टी में नमी की कमी व तेज धूप की वजह से गेहूं का दाना पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाया है। दाना सूखी बालियों में सिकुड़ कर रह गया है। राई की भी यही स्थिति है।
- अस्सी फीसदी हैं छोटे किसान
जिले के अधिकांश किसान छोटे खेतों के मालिक हैं। जिले में 3.22 लाख किसान हैं। इनमें से अस्सी फीसदी लघु व सीमांत कृषक है। महज बीस फीसदी किसानों के पास ही दो हेक्टेअर से अधिक जमीन हैं। सूखे की सबसे ज्यादा मार इन छोटे किसानों पर ही पड़ रही है। इनके पास जमा पूंजी का अभाव रहता है। यह वर्तमान पर ही निर्भर रहते हैं।
- पानी के साथ भोजन की भी है समस्या
ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट गहराता जा रहा है। हैंडपंप सूख रहे हैं और कुओं का पानी गहराई में जा रहा है। इसके अलावा भोजन का भी संकट है। फसल न होने की वजह से कृषि श्रमिकों को काम नहीं मिल पाया है। जबकि, इस सीजन में फसल की कटाई के एवज में उनका साल भर के अनाज का इंतजाम हो जाता था। लेकिन, इस बार कृषि श्रमिकों की मुट्ठी खाली है।
- शहरी आबादी भी है प्रभावित
सूखे से शहरी आबादी भी बुरी तरह से प्रभावित है। झांसी महानगर के कई हिस्सों में ही पेयजल संकट शुरू हो गया है। पाइप पेयजल योजना से अब तक अछूते रहे पिछोर, बड़ागांव गेट बाहर, राजपूत कालोनी आदि क्षेत्रों में घरों में लगी बोरिंग साथ छोड़ने लगी हैं। इन इलाकों में पानी के टैंकरों की आवाजाही बढ़ रही है।
- क्रय केंद्रों पर दिखने लगा असर
गेहूं क्रय केंद्रों पर भी सूखे का असर दिख रहा है। एक अप्रैल से जिले में 71 केंद्रों पर गेहूं की बुवाई शुरू की गई है, परंतु अब तक एक केंद्र पर 169 क्विंटल गेहूं की खरीद हो पाई है। जबकि, अन्य सभी केंद्रों पर सन्नाटा पसरा हुआ है। इस बार जिले को 76 हजार मीट्रिक टन गेहूं का लक्ष्य दिया है। मालूम हो कि पिछले साल लक्ष्य 57 हजार के सापेक्ष 49 हजार मीट्रिक टन गेहूं की खरीद हुई थी।
- सामान्य से कम हुई बारिश
जिले में औसत बारिश 750 मिलीलीटर मानी जाती है, लेकिन पिछले साल यहां केवल 485 मिलीलीटर बारिश हुई। यह बारिश भी कई-कई दिनों के अंतराल में पानी बरसा। इससे मिट्टी को नमी नहीं मिल पाई।
यह हो रहे हैं सरकारी काम
सूखे से असहाय हुए जनपद के 36,753 परिवारों को राहत किट बांटी गई है। प्रत्येक किट में 10 किलो आटा, 25 किलो आलू, पांच किलो चने की दाल, पांच लीटर सरसों का तेल, एक किलो देशी घी व एक किलोग्राम मिल्क पाउडर है। यह हर माह उपलब्ध कराई जाएगी।
- अभी नहीं बंट पाया पूरा मुआवजा
पिछले रबी सीजन में ओलावृष्टि /अतिवृष्टि से खराब हुई फसल का तीन अरब छप्पन करोड़ पचास लाख रुपये मुआवजा बांटा जाना था, जिसमें से अब तक दो अरब अठहत्तर करोड़ पैंतीस लाख रुपये बांटा गया है। बीस हजार से अधिक किसानों को अब तक मुआवजा नहीं मिला है। जबकि, सूखा प्रभावित किसानों को 68 करोड़ मुआवजा दिया जाना है, जिसमें अब तक सिर्फ सात करोड़ रुपये ही मिल पाया है।
- मनरेगा में बीस हजार मजदूरों को मिला काम
मनरेगा के तहत जिले में 20 हजार मजदूरों से काम लिया जा रहा है। बुंदेलखंड की विशेष हालातों को देखते हुए यहां साल के कार्यदिवस सौ से बढ़ाकर डेढ़ सौ कर दिए गए हैं।
- पशुओं के लिए खोले गए राहत केंद्र
सूखे से पशुओं के लिए चारे - पानी का संकट गहराया हुआ है। इससे निपटने के लिए जिले के आठों ब्लाकों में एक-एक पशु राहत केंद्र खोला गया है, जिनमें पशुओं को मुफ्त चारे की व्यवस्था की गई है। मालूम हो कि राहत केंद्र प्रत्येक ब्लाक में दो खोले जाने हैं, परंतु अब तक एक-एक ही शुरू हो पाया है।
- 53 गांवों में टैंकर से पहुंच रहा पानी
अत्यधिक सूखा प्रभावित जिले के 53 गांवों में टैंकरों के माध्यम से पेय जलापूर्ति की जा रही है। इन गांवों में 57 टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है।
- 400 हैंडपंप लगाने की है योजना
जिले में चार सौ हैंडपंप लगाने की योजना है। इस दिशा में जल निगम ने काम भी शुरू कर दिया है। लेकिन, सरकार की यह योजना ज्यादा कारगर होती नजर नहीं आ रही है। पाताल में पानी न होने की वजह से यह बोर सफल नहीं हो पा रहे हैं।
- 18 मृतक किसानों के परिवारों को मिला मुआवजा
प्रदेश सरकार द्वारा जून 2015 में 18 मृतक किसानों के परिवारों को सात-सात लाख रुपये की मुआवजा राशि दी गई थी। इसके अलावा आकांक्षा समिति द्वारा 35 मृतक किसानों के परिवारों को एक-एक लाख रुपये की सहायता राशि उपलब्ध कराई है। इन किसानों की मौत फसल खराब होने के सदमे से हुई थी।