'भारत के मुसलमानों के लिए वेक-अप कॉल'
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ढाका की होली आर्टिसन बेकरी पर दुस्साहसी हमला भारत के लिए वेक-अप कॉल है। बल्कि ये कहें कि भारतीय मुसलमानों की आंखें खोलने के लिए काफी है। भारत के मुस्लिम समाज के एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से मैं ये कह सकता हूँ कि तथाकथित इस्लामिक स्टेट या आईएस हमारे दरवाजों पर अगर अपनी बंदूकों से दस्तक नहीं दे रहा है तो विचारधारा की गुहार जरूर लगा रहा है।
मुझे ऐसा लगता है कि भारत का मुस्लिम समाज सपने में रहने का आदी हो चुका है। हम सब ये सोचते हैं कि सरकार तो है ही, पुलिस और खुफिया एजेंसियां तो हैं ही। हमें चिंता करने की क्या जरूरत है। हमें जल्द समझ लेना चाहिए कि हमारे पश्चिम में तथाकथित आईएस की पकड मजबूत होती जा रही है।
और ढाका के हमले के बाद ये साबित हो गया है कि अब पूर्व में भी तथाकथित आईएस वाली विचारधारा ने जन्म ले लिया है। (बांग्लादेशी सरकार ने ये जरूर कहा है कि हमलावर स्थानीय मुस्लिम थे लेकिन तथाकथित आईएस की संस्थापक उपस्थिति जरूरी नहीं है, इसकी विचारधारा संगठन से पहले पहुंच जाती है)। अगर हम अब नहीं जागे तो बहुत देर हो जाएगी।
व्हाट्स एप्प ग्रुप्स हैं जिनपर जिहादी विचारधारा पनप रही है
पिछले हफ्ते हैदराबाद में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने कुछ मुस्लिम युवाओं को गिरफ्तार करके इन्हें तथाकथित आईएस का हिस्सा बताया। हम सब जानते हैं कि इस तरह के सरकारी दावे पहले अदालत में गलत साबित हो चुके हैं।
लेकिन हैदराबाद वाला दावा अगर सही साबित हुआ तो? क्या हमें भारत में तथाकथित आईएस की मौजूदगी का ठोस सबूत चाहिए? क्या हम अदालत के फैसलों का इंतजार करें? क्या भारत के मुसलमानों के लिए ये काफी नहीं है कि उनके दोनों पडोसी देशों में तथाकथित आईएस और इसकी घातक विचारधारा मौजूद है?
इतना कहना काफी नहीं कि इस विचारधारा से बचके रहो, तथाकथित आईएस से होशियार रहो। नहीं, इसका अब समय नहीं रहा। एक भारतीय मुसलमान की हैसयत से मैं कह सकता हूँ कि तथाकथित आईएस विचारधारा का इसपर दबाव बढ रहा है। इंटरनेट गुरु इसका पाठ पढा रहे हैं।
व्हाट्स एप्प ग्रुप्स हैं जिनपर जिहादी विचारधारा पनप रही है। ये ऑनलइन गुरु हिन्दुओं और हिंदुत्व में फर्क न दिखाकर सीधे-साधे मुस्लिम युवाओं को बहकाने में लगे हैं। आम धार्मिक प्रवचन में हमें ये बताया जा रहा है कि भारत का मुसलमान डरपोक हो चुका है, वो आधा हिन्दू बन चुका है। अपनी जबान उर्दू को छोड कर हिन्दी बोलने लगा है।
यानी भारत के मुसलमान की पहचान खतरे में है
यानी भारत के मुसलमान की पहचान खतरे में है। शायद इसी लिए अब बुर्कापोश महिलाएं पहले से कहीं अधिक नजर आती हैं। और शायद इसीलिए आज का युवा मुसलमान सिर पर गोल टोपी, कमीज लम्बी और ऊंचा पायजामा पहन कर गर्व से बाहर निकल रहा है, कम से कम ग्रामीण इलाकों में हम ऐसे युवाओं को जरूर देखते हैं।
ये सच है कि कट्टर इस्लामिक विचारधारा की छाप नजर आने लगी है। इसका मतलब हरगिज ये नहीं कि ये भविष्य के चरमपंथी हैं। कहने का मतलब ये है हम अब तक अल-कायदा और तथाकथित इस्लामिक स्टेट के बताए हुए इस्लाम से बचते आए हैं।
हमारा उदाहरण नरेंद्र मोदी ने दुनिया वालों को दिया है। हमारी तारीफ बुश और ओबामा ने भी की है। हमें इस बात पर गर्व है कि आतंकी विचारधारा से बचे रहने पर हमारी प्रशंसा दुनिया भर में की गई है। हिंदुत्व से अगर किसी को शिकायत है या डर है तो ये नहीं भूलना चाहिए कि हम अगर शांति पसंद हैं तो इसमें हमारे समाज का योगदान भी है जो 80 प्रतिशत हिन्दुओं पर आधारित है और जो सदियों से शांतिप्रिय धर्म रहा है।
मुस्लिम समाज में तथाकथित आईएस को लेकर कोई खास चिंता नहीं है?
देश भर में मुस्लिम समुदाय से मिलने-जुलने से ये एहसास होता है कि मुस्लिम समाज में तथाकथित आईएस को लेकर कोई खास चिंता नहीं है। उससे भी बढकर इसकी खतरनाक विचारधारा के बारे में अधिक जानकारी भी नहीं।
उन्हें अक्सर ये भी नहीं मालूम होता कि उनके बच्चे इंटरनेट पर क्या देख रहे हैं, किस धार्मिक गुरु से सीख ले रहे हैं। जब इसराइल ने 1967 में येरुशलम पर कब्जा किया था तो दुनिया भर के मुसलमानों के अलावा भारत के मुसलमानों ने एक साथ, एक समय, कंधे से कंधा मिलाकर कब्जे के खिलाफ जुलूस निकाला था। इसी तरह जब अमरीका ने 2003 में इराक पर चढाई की थी भारत का मुसलमान सडकों पर निकल आया था।
कभी भारत के मुसलमानों ने तथाकथित आईएस या जिहादी तत्वों के खिलाफ पूरे देश में एक साथ शांति मार्च निकालने के बारे में सोचा है?
मुस्लिम समाज की इस कोशिश का असर पडोस के देशों पर भी हो सकता है
जरा सोचिये, कल्पना कीजिए, कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गोवा से असम तक एक साथ हरी झंडी लेकर मुसलमान सडकों पर शांति मार्च करें तो इसका असर क्या होगा? तथाकथित आईएस विचारधारा दुम दबाकर भागेगी। मुस्लिम समाज की इस कोशिश का असर पडोस के देशों पर भी हो सकता है।
अगर ये शांति मार्च संभव नहीं तो कम से कम अपने बच्चों पर कडी नजर रखें। कुछ समय पहले पुणे की एक युवा मुस्लिम लडकी इराक जाकर तथाकथित आईएस से जुडना चाहती थी। उसके माता-पिता ने पुलिस और खुफिया एजेंसियों की मदद ली।
एजेंसियों ने 16 वर्षीय लडकी को कट्टरपंथी विचारधारा से बाहर निकालने में कामयाबी हासिल की। दूसरे मुस्लिम माता-पिता भी ये रास्ता अपना सकते हैं। मस्जिदों में इमाम तथाकथित आईएस की विचारधारा के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं। मुस्लिम बच्चों को एक अच्छा नागरिक बनाने में मदद कर सकते हैं।
विदेश में चरमपंथी मुस्लिम संगठन जिहादियों को भारत भेजने से पहले एक बडे झूठ का सहारा लेते हैं और वो ये कि 'हिन्दू इंडिया में मुस्लिम पिस रहा है, उसे मजहबी आजादी नहीं, वो मस्जिद नहीं बना सकता, वो कुरान नहीं पढ सकता।' मुझे खुद दो विदेशी चरमंपथी जिहादियों ने जेल में ये बात बताई है।
भारत के मुसलमान ऐसे विदेशियों से सावधान रहें। सबसे महत्वपूर्ण ये है कि जिहादी विचारधारा की सप्लाई लाइन काट देनी चाहिए और इस पर सभी जिम्मेदार मुसलमानों और संगठनों को काम करना चाहिए।