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Manipur: मणिपुर में करीब 565 दिन से हिंसा जारी, राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर रहे कई राजनीतिक दल

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Wed, 20 Nov 2024 04:53 PM IST
सार

 ManipurViolence: बता दें कि मणिपुर में सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद हिंसा की वारदात जारी हैं। सेना, पुलिस व केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की 288 कंपनियां, राज्य में तैनात हैं। इसके बावजूद हिंसा थम नहीं रही है। गत वर्ष से लेकर अब तक मणिपुर में हजारों लोगों के घर, आग के हवाले किए गए हैं।

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Violence continues in Manipur for about 565 days parties demanding imposition of President's rule
मणिपुर हिंसा - फोटो : PTI

विस्तार

मणिपुर में पिछले साल 3 मई से शुरु हुआ हिंसा का दौर, थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। एक अंतराल के बाद दोबारा से हिंसा की वारदात शुरु हो जाती हैं। सुरक्षा बलों के हथियार लूटने से लेकर आम लोगों की हत्या हो रही है। मणिपुर में तीन चार सप्ताह के दौरान बीस लोग मारे जा चुके हैं। इनमें महिलाएं व बच्चे भी शामिल हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे समेत पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेता मणिपुर में सीएम बीरेन सिंह को बर्खास्त कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर चुके हैं। पूर्व सेना अध्यक्ष जन. वीपी मलिक कह रहे हैं कि मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगे। बीएसएफ के पूर्व एडीजी और सुरक्षा मामलों के जानकार एसके सूद ने कहा है, मुख्यमंत्री बीरेन सिंह पर किसी भी समुदाय, मैतेई और कूकी, दोनों का ही विश्वास नहीं है। राज्य में शांति बहाली के लिए राष्ट्रपति शासन लगना जरुरी है। अप्रैल 1992 को मणिपुर में हिंसा हुई तो कांग्रेस पार्टी ने अपने मुख्यमंत्री राजकुमार दोरेंद्र सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था।  
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बता दें कि मणिपुर में सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद हिंसा की वारदात जारी हैं। सेना, पुलिस व केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की 288 कंपनियां, राज्य में तैनात हैं। इसके बावजूद हिंसा थम नहीं रही है। गत वर्ष से लेकर अब तक मणिपुर में हजारों लोगों के घर, आग के हवाले किए गए हैं। इतना ही नहीं, मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायकों के आवासों को भी नहीं बख्शा गया। वहां भी आगजनी और तोड़फोड़ हुई है। सुरक्षा कैंपों पर हमले हो रहे हैं। पिछले दिनों सीआरपीएफ कैंप एवं पुलिस थाने पर हमले का प्रयास हुआ था। सुरक्षा बलों की कार्रवाई में दस उपद्रवी मारे गए थे। राज्य में एक लाख से अधिक लोगों को अपने घरों से दूर राहत शिविरों और सुरक्षा बलों के कैंपों में रहना पड़ रहा है। पिछले साल से ही कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल, मुख्यमंत्री बीरेन सिंह को बर्खास्त कर मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा था, मणिपुर में प्रधानमंत्री मोदी की घोर विफलता अक्षम्य है। संघर्षग्रस्त राज्य के लोग परेशान और दुखी हैं। वे चाहते थे कि प्रधानमंत्री मोदी उनसे मिलने आएं। मणिपुर के मुख्यमंत्री को तुरंत बर्खास्त किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार को मणिपुर में सुरक्षा स्थिति की पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। 
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देश के पूर्व गृह एवं वित्त मंत्री रहे कांग्रेस नेता पी.चिदंबरम ने भी सीएम बीरेन के इस्तीफे की मांग की है। उन्होंने मणिपुर के हालात के लिए बीरेन सिंह को जिम्मेदार ठहराया है। पूर्व गृह मंत्री ने कहा, मणिपुर में पांच हजार जवानों भेजना, प्रदेश के संकट का समाधान नहीं है। हालांकि इस मुद्दे पर मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने चिदंबरम पर पलटवार किया है। बीरेन सिंह ने कहा, राज्य में इस समय जो संकट है उसके मूल कारण चिदंबरम हैं। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान सेना प्रमुख रहे जनरल वेद प्रकाश मलिक ने कहा, मणिपुर में हो रही हिंसा को देखते हुए वहां पर राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए। मणिपुर की स्थिति, वहां पर राष्ट्रपति शासन और राज्यपाल के तहत एक प्रभावी यूनिफाइड कमांड की मांग करती है। 

बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद ने बताया, मणिपुर में पिछले वर्ष जब हिंसा शुरु हुई तो उसी वक्त राज्य सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए था। केंद्र सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए जो कदम उठाए गए हैं, वे पर्याप्त नहीं हैं। केंद्र सरकार ने वहां पर एक सुरक्षा सलाहकार नियुक्त कर दिया। वे वहां के रहने वाले नहीं हैं। उन्हें डे टू डे पुलिस कार्यप्रणाली का नहीं पता, भले ही उन्हें रिपोर्ट की जाती है। पिछले दिनों हुई हिंसा के बाद सरकार ने छह क्षेत्रों में सशस्त्र सेना विशेधाधिकार कानून (अफस्पा) लागू किया है। 

सूद के मुताबिक, केंद्र सरकार को बहुत पहले ही उपद्रव वाले क्षेत्रों में अफस्पा लागू करना चाहिए था। उपद्रवियों के पास पुलिस एवं आईआरबी से लूटे गए हथियार हैं। अगर पहले अफस्पा लागू होता तो सुरक्षा बलों को कहीं पर भी जाकर सर्च करने की पावर मिल जाती। मौजूदा स्थिति में सुरक्षा बलों को वहां से हटाना संभव नहीं है। वहां पर जो खराब हालात बनें हैं, उसके लिए सरकार का इनएक्टिव रहना है। अगर सुरक्षा बलों को हटाते हैं तो दोनों समुदाय, एक दूसरे के क्षेत्रों में जाकर मार काट मचा देंगे। मुख्यमंत्री पर मैतेई और कूकी, दोनों समुदायों का ही विश्वास नहीं है। 

आम लोगों के दिमाग में यह बात बैठ चुकी है कि मणिपुर की मौजूदा स्थिति के लिए वही यानी मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह जिम्मेदार हैं। वे स्थिति को नहीं संभाल पा रहे हैं। वहां पर राष्ट्रपति शासन लागू कर सुरक्षा बलों को सशस्त्र सेना विशेधाधिकार कानून के दायरे में लाया जाए। बाहर से लोग वहां पर आ रहे हैं। इसके लिए सीमा पर मजबूत सुरक्षा घेरे का होना आवश्यक है। बॉर्डर की सुरक्षा के लिए एक नियमित फोर्स लगानी चाहिए। यह तुरंत संभव न हो, लेकिन लंबी अवधि के लिए ये बहुत आवश्यक है। मणिपुर में ड्रग्स के उत्पादन को रोकना होगा। इसकी जगह पर दूसरे उत्पादों का विकल्प देना होगा। वहां रबड़ प्लांटेशन को लेकर रिसर्च की जाए। टी कॉपी का उत्पादन होने की संभावना देखी जा सकती हैं। 

मणिपुर में राष्ट्रपति शासन की स्थिति ... 
—पहली बार राष्ट्रपति शासन 19 जनवरी 1967 से 19 मार्च 1967 यानी 66 दिन तक लगाया गया था। उस समय मणिपुर केंद्र शासित विधानसभा का पहला चुनाव होना था। 
—दूसरी बार 25 अक्तूबर 1967 से 18 फरवरी 1968 तक, 116 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया गया। तब मणिपुर में राजनीतिक संकट आ गया था। उसके बाद किसी दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था। 
—तीसरी बार राज्य में 17 अक्तूबर 1969 से 22 मार्च 1972 तक दो साल 157 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा। उस वक्त पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग के दौरान हिंसा हुई। कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी। 

—चौथी बार 28 मार्च 1973 से 3 मार्च 1974 तक राष्ट्रपति शासन लगा था। उस वक्त विपक्ष के पास इतना कम बहुमत था कि वह स्थायी सरकार नहीं बना सकता था। 
—पांचवीं बार 16 मई 1977 से 28 जून 1977 तक 43 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा। तब दलबदल के चलते सरकार गिर गई थी। 
—छठी बार 14 नवंबर 1979 से 13 जनवरी 1980 तक 60 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा। उस वक्त राजनीतिक कारण जिम्मेदार रहे। जनता पार्टी सरकार के साथ असंतोष और भ्रष्टाचार के आरोप, सरकार की बर्खास्तगी का कारण बना। विधानसभा भंग कर दी गई। 
—सातवीं बार 28 फरवरी 1981 से 18 जून 1981 तक राष्ट्रपति शासन लगा। तब भी राजनीतिक कारणों के चलते राज्य में स्थायी सरकार का गठन नहीं हो सका। 
—आठवीं बार 7 जनवरी 1992 से लेकर 7 अप्रैल 1992 तक 91 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा था। उस वक्त दलबदल के चलते गठबंधन सरकार गिर गई थी। 
—नौंवी बार 31 दिसंबर 1993 से 13 दिसंबर 1994 तक 346 दिन तक राष्ट्रपति शासन लगा रहा। तब इसका कारण नागा और कुकी समुदाय के बीच हिंसा हुई थी। वह हिंसा लंबे समय तक चली, जिसमें सैंकड़ों लोग मारे गए थे। 
—दसवीं बार 2 जून 2001 से 6 मार्च 2002 तक 277 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा था। उस वक्त सरकार ने बहुमत खो दिया था।

 
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