बहादुर और मिलनसार थे शहीद हरेंद्र, जान पर खेलकर बचाई थी दो बच्चों की जान
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हरेंद्र बहादुर के साथ ही मिलनसार भी थे। उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर दो बच्चों की जान बचाई थी। लोगों का कहा है कि हमें हरेंद्र पर नाज है। पूरा गांव उनकी बहादुरी को सलाम करता है। ग्राम प्रधान पुंजेश सिंह ने बताया कि पिछले होली के त्योहार में छुट्टी लेकर हरेंद्र घर आए थे। हमेशा की तरह होली के दिन गांव में लोगों से मिलने-जुलने के बाद शाम को गांई गांव के रास्ते से होकर गुजर रहे थे। इसी बीच उनकी नजर गांव स्थित राजभर बस्ती के गंगा राजभर की झोपड़ी पर पड़ी। झोपड़ी में आग लगी हुई थी और ग्रामीण आग पर काबू पाने का प्रयास कर रहे थे।
ग्रामीणों के मना करने के बावजूद हरेंद्र जान जोखिम में डालकर आग में कूद पड़े और झोपड़ी में सो रहे गंगाराम के दो नाती और दो बकरियों को सकुशल बाहर निकालने में सफल रहे। आज भी गांव के लोग उनकी बहादुरी को याद करते हैं। ग्राम प्रधान ने बताया कि इस घटना के बाद हरेंद्र पूरे गांव के लिए एक मिसाल कायम कर सबके प्रिय हो गए। जब भी वह घर आते थे, गांव वालों से मिलना-जुलना एवं उनका आशीर्वाद लेना उसके व्यक्तित्व में शामिल था। आज उसके न रहने से कोई मानने को तैयार नहीं है। सबकी निगाहें आंसुओं से सराबोर हैं।
जो ठान लेते थे उसे करके छोड़ते थे
मरदह। हरेंद्र के बचपन के साथी पड़ोसी गांव के वर्तमान ग्राम प्रधान शिवनारायण यादव ने बताया कि उन्होंने हरेंद्र के साथ एक से आठवीं तक की शिक्षा गांव से कुछ दूरी पर स्थित माता तपेश्वरी इंटर कालेज मरदह से ग्रहण की। आठवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वर्ष 2007 दिसंबर माह में पहले प्रयास में ही हरेंद्र ने रायबरेली के मैदान में सेना दौड़ निकालने में सफलता हासिल की और 17वीं बिहार रेजिमेंट में भर्ती हुए। वह शुरू से ही कर्मठ और जुझारू थे। बताया कि वह जो ठान लेते थे, उसको पूरा करके ही दम लेते थे। आज उसके न रहने की खबर सुनकर पूरे क्षेत्र में शोक की लहर व्याप्त है। लोग विश्वास नहीं कर पा रहे हैं कि हरेंद्र अब इस दुनिया में नहीं हैं। सेना में भर्ती के बाद हरेंद्र ने जखनियां क्षेत्र से हाईस्कूल की परीक्षा पास की थी।
शनिवार को ही फोन पर हुई थी पत्नी और भाई से बात
देउपुर पाही निवासी हरेंद्र की शादी वर्ष 2011 में स्थानीय थाना क्षेत्र के कोड़री ( डिल्ला) गांव निवासी विजय नारायण यादव की पुत्री निर्मला यादव के साथ हुई थी। उनके दो पुत्र रोहित (4) एवं राज (2) हैं। पत्नी निर्मला दोनों बच्चों को लेकर जुलाई माह में अपने गई हुईं थी। सोमवार की सुबह घटना की जानकारी मिलने पर वह बच्चों के साथ ससुराल पहुंचीं।
कश्मीर के उड़ी स्थित सेना के बेस कैंप पर रविवार की सुबह आतंकवादियों के हमले में सत्रह जवान शहीद हो गए थे। इसमें मरदह ब्लाक के देउपुर पाही गांव निवासी हरेंद्र यादव भी शहीद हो गए। हरेंद्र की मौत से परिवारीजनों पर गम का पहाड़ टूट पड़ा है। हरेंद्र ने अंतिम बार शनिवार को अपनी पत्नी तथा अपने घर छोटे भाई नरेंद्र से फोन पर बातचीत कर हाल चाल लिया था। इस दौरान सकुशल रहने की बात कही थी। पहली जून को छुट्टी पर घर आए हरेंद्र की वापसी 30 जून को हुई थी। सभी परिवार एवं गांववासियों की नजरों में बसने वाले हरेंद्र खुशी-खुशी छुट्टी बिताकर वापस चले गए। उनके शहीद होने की जानकारी मिलते ही बड़ी संख्या में लोग उनके घर पहुंचकर परिजनों को ढांढस बंधाते रहे।
...तो नहीं जाती रणबांकुरों की जान
जम्मू-कश्मीर के माहौल से कुछ दिन पहले हरेंद्र यादव ने अपने दोस्त को अवगत कराया था। मृतक हरेंद्र के जिगरी दोस्त अजय यादव उर्फ भूषण ने बताया कि हरेंद्र से टेलीफोन पर 13 सितंबर की रात दस बजे बात हुई थी। उन्होंने बताया था कि यहां पर माहौल बहुत गरम है। आए दिन पत्थरबाजी हो रही है। आगे अभी बात चल ही रही थी कि अचानक फोन कट गया। अजय ने कहा कि देश में कहीं ना कहीं सुरक्षा तंत्र की कमी और सरकार के ढुलमुल रवैए के कारण ही मेरे जिगरी दोस्त के साथ देश के 20 जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी।