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कश्मीर घाटी में उर्दू बोलते नजर आएंगे 'भगवान राम', नवंबर से पढ़ाएंगे शांति का पाठ

Mon, 02 Sep 2019 04:16 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला
अमित शर्मा, अमर उजाला Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 02 Sep 2019 04:16 PM IST
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Urdu ramleela based on Imam e hind ram will play in kashmir after article 370 aborted
imam e hind ram - फोटो : AmarUjala
लोकप्रिय गीत ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ लिखनेवाले उर्दू के मशहूर शायर अल्लामा इकबाल भी भगवान राम को ‘इमाम-ए-हिंद’ कहते हैं और लिखते हैं- है राम के वजूद पे हिंदोस्तां को नाज, अहले नजर समझते हैं उसको इमामे हिंद। इकबाल के ‘इमाम-ए-हिंद’ भगवान राम अब उर्दू में नाट्य मंचन के जरिये कश्मीर घाटी में लोगों को शांति का सन्देश देंगे। अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद के बाद से वहां हालात तनावपूर्ण लेकिन काबू में हैं। 
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नवंबर माह से होगी शुरुआत

इस नए तरीके में राम अब उर्दू जुबान बोलते नजर आयेंगे, जिससे उनके शांति के संदेश सीधे कश्मीरियों के दिल में उतर सके। नवंबर माह से कश्मीर में शुरू होने जा रही इस कोशिश में जल्द ही देश के 100 अन्य प्रमुख शहरों को भी शामिल किया जायेगा। ‘इमाम-ए-हिंद: राम, सबके राम’ पुस्तक के लेखक मोहम्मद अलीम ने बताया कि राम के जीवन से जुड़े इन नाटकों का मंचन ऐसे समय में आयोजित किया जा रहा है, जब सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर मामले की सुनवाई चल रही है।  
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उर्दू कवियों के लिखे राम गीत भी शामिल

मोहम्मद अलीम ने अमर उजाला को बताया कि यह पुस्तक उर्दू भाषा में नाट्य शैली में लिखी गई है। शेक्सपिरियन स्टाइल में उर्दू में लिखी राम से जुड़ी इस तरह की यह पहली साहित्यिक कोशिश है। इसमें वाल्मीकि रामायण से लेकर आज तक के राम से जुड़े सभी प्रमुख ग्रंथों के तथ्य जुटाए गये हैं। इस पुस्तक में उर्दू के कवियों के लिखे राम गीतों को भी शामिल किया गया है। इनमें द्वारका प्रसाद, ब्रज नारायण और अल्लामा इकबाल शामिल हैं। इस तरह यह एक गायन नाट्य कला से मिश्रित मंचन होगा, जो आम लोगों की जुबान में होगा जिससे इसके भाव सीधे लोगों तक पहुंच सकें।
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राम के आदर्शों को बताये जाने की जरूरत

जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी से जुड़े हिंदी और उर्दू भाषा के विद्वान मोहम्मद अलीम का कहना है कि अल्लामा इकबाल ने राम को इमाम-ए-हिंद इसलिए कहा था क्योंकि वे मानते थे कि अगर सम्पूर्ण भारत के नेता के तौर पर अगर किसी को प्रतिष्ठित किया जा सकता है, तो वे केवल राम ही हो सकते हैं। यही वजह है कि उन्होंने अपनी पुस्तक का नाम भी इमाम-ए-हिंद से जोड़कर दिया है। उनके मुताबिक राम समाज के हित के लिए निजी स्वार्थों के त्याग की प्रतिमूर्ति हैं। किसी भी समाज का आदर्श इस विचार के आसपास ही गढ़ा जा सकता है और हमारा आदर्श इससे हटकर नहीं हो सकता। यही कारण है कि आज राम के आदर्शों को लोगों को बताये जाने की जरूरत है। 

राम को मानने वाले अनेक मुस्लिम विद्वान

क्या अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से जुड़ा फैसला आने के बाद देश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है, इसके जवाब में अलीम का कहना है कि इसी जमीन में राम को मानने वाले अनेक मुस्लिम विद्वान हुए हैं। इससे यह साबित होता है कि मुस्लिम समाज को राम के महत्व को स्वीकार करने में कभी कोई परेशानी नहीं रही। यह कुछ लोगों की राजनीतिक मजबूरी का विषय हो सकता है कि वे इस मुद्दे को विवाद का विषय बनाएं। उन्होंने कहा कि राम के अस्तित्व में हमेशा ये ताकत रही है कि वे दो विविध समाज को अपने साथ जोड़कर चल सकें, इसलिए राम की शिक्षाओं को आज के दौर में प्रचारित-प्रसारित किये जाने की जरूरत है। 
 
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