उत्तर प्रदेश चुनाव: तहजीब के शहर लखनऊ में क्या गुल खिलाएगा सातों मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड?
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
लखनऊ देश की इकलौती ऐसी राजधानी रही है, जहां से आजादी के बाद से पहली बार एक साथ इतने मंत्री बनाए गए। 2017 की भाजपा सरकार में अकेले लखनऊ से सात मंत्री बनाए जाने के पीछे मंशा यही थी कि आने वाले चुनावों में इसका फायदा मिले। योगी सरकार में यहां से एक उपमुख्यमंत्री, तीन कैबिनेट मंत्री, और तीन राज्य मंत्री बनाए गए जिसमें से दो के पास स्वतंत्र प्रभार है। चौथे चरण में यहां हो रहे मतदान में इन सभी मंत्रियों और उप मुख्यमंत्री समेत कद्दावर नेताओं की इस बार जबरदस्त परीक्षा है।
'नवाबों के शहर' के सातों मंत्रियों की अग्नि परीक्षा
2017 के विधानसभा चुनावों में लखनऊ के मेयर रहे डॉ. दिनेश शर्मा को उत्तर प्रदेश का उप मुख्यमंत्री बनाया गया था। लखनऊ मध्य के विधायक बने बृजेश पाठक को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया था। लखनऊ पूर्व से विधायक बने आशुतोष टंडन को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया था। इसी तरह लखनऊ कैंट की विधायक रीता बहुगुणा जोशी को भी कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। सरोजिनी नगर से पहली बार किस्मत आजमा रहीं स्वाति सिंह विधायक बनी और उनको स्वतंत्र प्रभार का मंत्री बना दिया गया। लखनऊ के ही रहने वाले और असम चुनाव के प्रभारी रहे महेंद्र सिंह को भी इसी सरकार में मंत्री बनाया गया। जबकि लखनऊ ठाकुरगंज के रहने वाले भाजपा के मुस्लिम चेहरे मोहसिन रजा को राज्यमंत्री के पद से नवाजा गया था।
नाराजगी और भितरघात का भी खतरा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2022 में जिस तरह भाजपा ने जिस तरह लखनऊ से मंत्रियों का एक बहुत बड़ा कुनबा तैयार किया था, अब उन सबको 2022 के इन चुनावों में अपना रिजल्ट देना है। ये चुनाव इन सबके लिए एक परीक्षा है। हालांकि इस कुनबे में इस बार थोड़ी बहुत नाराजगी भी दिख रही है। राजनीतिक विश्लेषक जीडी शुक्ला कहते हैं जिस तरह 2017 में उत्तराखंड फैक्टर को साधते हुए रीता बहुगुणा जोशी को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था वह इस बार नाराजगी के चलते पार्टी के लिए चुनौती बनी हुई हैं। खासकर चुनाव से एक रोज पहले जिस तरह रीता बहुगुणा जोशी के बेटे मयंक जोशी की तस्वीर अखिलेश यादव के साथ वायरल हुई वह कम से कम उत्तराखंड के यहां रहने वाले वोटरों पर कुछ न कुछ असर डाल सकती है। क्योंकि मयंक जोशी लखनऊ कैंट सीट से दावेदारी कर रहे थे। उनके नाम पर भाजपा राजी नहीं हुई और टिकट नहीं दिया।
राजनीतिक जानकार बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में 2017 की सरकार बनने के साथ ही सभी जाति वर्ग विशेष के लोगों को साधने के लिए लखनऊ में हाई प्रोफाइल कैबिनेट तैयार की गई। अब यही हाई प्रोफाइल कैबिनेट माहौल बनाकर लखनऊ में चुनावी बागडोर संभाले हुए है। राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर ओपी मिश्रा कहते हैं कि एक शहर से इतने मंत्रियों का कुनबा जब मैदान में होगा तो परिणाम की उम्मीद भी उसी लिहाज से पार्टी करेगी। उनका कहना है कि अब पूरा दारोमदार ऐसे लोगों पर है जिन पर सरकार ने 2017 में अपना दांव लगाया था। ऐसे में इन प्रत्याशियों के सामने न सिर्फ चुनौती है बल्कि उन्हें पांच साल में किए गए कामकाज की बदौलत खुद को बेहतर साबित करना होगा।
राजनीतिक जानकार बताते हैं 2007 में जब बसपा सरकार बनी तो लखनऊ से सिर्फ एक मंत्री बनाया गया था, उससे पहले मुलायम सिंह की 2003 की सरकार में शहर से एक भी मंत्री नहीं बना था। जबकि 2012 में अखिलेश यादव की सरकार में लखनऊ से तीन मंत्री बनाए गए थे।