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तिरुपति लड्डू विवाद: जांच आयोग की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, बिना परीक्षण के खरीदा गया 70 लाख किलो घी
Sun, 03 May 2026 09:37 AM IST
निर्मल कांत
पीटीआई, अमरावती।
पीटीआई, अमरावती।
Published by: निर्मल कांत
Updated Sun, 03 May 2026 09:37 AM IST
सार
आंध्र प्रदेश सरकार की एक सदस्यीय आयोग की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि तिरुपति लड्डू बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला घी बिना जरूरी जांच के खरीदा गया। पूरे मामले में कई स्तरों पर निगरानी और प्रशासन की विफलता को मुख्य वजह बताया गया। पढ़िए रिपोर्ट-
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तिरुपति लड्डू मामला (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
आंध्र प्रदेश सरकार के एक सदस्यीय आयोग ने शनिवार को रिपोर्ट में बताया कि तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) ने 70 लाख किलोग्राम से ज्यादा घी बिना अनिवार्य गुणवत्ता जांच के खरीदा। यह घी का प्रसिद्ध तिरुपति लड्डू बनाने में इस्तेमाल हुआ।
आयोग की रिपोर्ट में क्या कहा गया?
रिपोर्ट में कहा गया कि यह प्रशासन की बड़ी विफलता थी, जिसके कारण आपूर्तिकर्ता को मिलावटी घी देने का मौका मिला। अधिकारियों ने सुरक्षा जांच को नजरअंदाज किया और प्रयोगशाला की रिपोर्ट को दबा दिया, जिनमें वनस्पति वसा (वेजिटेबल फैट) की मौजूदगी पाई गई थी।
सीएम ने सेवानिवृत्त आईएएस की अध्यक्षता में बनाया था आयोग
मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के सेवानिवृत्त अधिकारी दिनेश कुमार की अध्यक्षता में यह जांच आयोग बनाया था, जब सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अपनी रिपोर्ट दी थी।
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बिना जांच के कैसे खरीदा गया 70 लाख किलो से अधिक घी?
रिपोर्ट के अनुसार, टीटीडी के अधिकारियों ने पहले भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के बीटा-सिटोस्टेरोल परीक्षण को अनिवार्य करने की योजना बनाई थी, जिसे 1 जुलाई 2022 से लागू होना था। लेकिन बाद में इसे बदल दिया गया और आपूर्तिकर्ताओं को छूट दे दी गई। इसके कारण 70 लाख किलो से अधिक घी बिना जरूरी जांच के खरीदा गया।
सही तरीके से लागू नहीं किए गए निविदा नियम
आयोग ने कहा, यह पूरी प्रक्रिया में प्रशासनिक विफलता थी। निविदा (टेंडर) के नियमों को सही तरीके से लागू नहीं किया गया और सुरक्षा मानक धीरे-धीरे कमजोर कर दिए गए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ अहम लैब रिपोर्ट को दबा दिया गया,जिनमें मिलावट की पुष्टि थी, उन्हें और खरीद के फैसले बिना सही निगरानी के लिए गए।
जांच में पाया गया कि निविदा समिति के सदस्यों ने बिना पूरी मंजूरी के नियमों में ढील दी और कम कीमत वाली बोलियों को बिना जांच के स्वीकार किया। 2019 में तय किए गए पात्रता नियमों को भी कुछ महीनों में कमजोर कर दिया गया, जिससे कुछ ऐसी कंपनियां भी आपूर्तिकर्तां में शामिल हो गईं, जिनके पास जरूरी उत्पादन क्षमता नहीं थी।
लैब की रिपोर्ट को दबा दिया गया
प्रयोगशाला में एक परीक्षण में अगस्त 2022 में यह भी पाया गया कि घी में वनस्पति तेल की मिलावट है। लेकिन रिपोर्ट को दबा दिया गया और संबंधित कंपनियों को काली सूची में नहीं रखा गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ कंपनियों को एफएसएसएआई परीक्षण से छूट दी गई, जिससे बड़े पैमाने पर बिना जांच के घी की खरीद हुई। आपूर्तिकर्ताओं ने बोली की प्रक्रिया में बहुत कम कीमतें देकर अनुबंध हासिल किए। कुछ मामलों में अयोग्य कंपनियों को भी ठेके दिए गए, जबकि उनकी उत्पादन क्षमता सही नहीं थी।
ये भी पढ़ें: नसरापुर नाबालिग दुष्कर्म-हत्या कांड: पुणे के श्मशान घाट पर भारी सुरक्षा, अंतिम संस्कार से पहले पुलिस अलर्ट
टीटीडी की प्रयोगशाला में भी आधुनिक जांच उपकरण नहीं थे और उसका अपग्रेड तीन साल तक टलता रहा। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि जांच और निरीक्षण समितियों में वही लोग शामिल थे, जिससे स्वतंत्र निगरानी कमजोर हुई। कई शिकायतों और गुणवत्ता निगरानी प्रणाली को भी नजरअंदाज किया गया। भोले बाबा ऑर्गेनिक डेयरी जैसी कुछ कंपनियों पर आरोप है कि उन्होंने मिलावटी घी की आपूर्ति जारी रखी और सिंथेटिक केमिकल का इस्तेमाल किया।
प्रीमियर एग्री फूड्स जैसी प्रमुख आपूर्तिकर्ता कंपनियों को भी मिलावट के बावजूद ऑर्डर मिलते रहे। एक अन्य कंपनी एआर डेयरी फूड ने उत्पादन के गलत आंकड़े दिए, लेकिन फिर भी आपूर्ति कर्ता बनी रही। आयोग ने टीटीडी बोर्ड, खरीद समिति के सदस्यों और अधिकारियों को इस पूरी गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार ठहराया है।
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आयोग की रिपोर्ट में क्या कहा गया?
रिपोर्ट में कहा गया कि यह प्रशासन की बड़ी विफलता थी, जिसके कारण आपूर्तिकर्ता को मिलावटी घी देने का मौका मिला। अधिकारियों ने सुरक्षा जांच को नजरअंदाज किया और प्रयोगशाला की रिपोर्ट को दबा दिया, जिनमें वनस्पति वसा (वेजिटेबल फैट) की मौजूदगी पाई गई थी।
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सीएम ने सेवानिवृत्त आईएएस की अध्यक्षता में बनाया था आयोग
मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के सेवानिवृत्त अधिकारी दिनेश कुमार की अध्यक्षता में यह जांच आयोग बनाया था, जब सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अपनी रिपोर्ट दी थी।
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बिना जांच के कैसे खरीदा गया 70 लाख किलो से अधिक घी?
रिपोर्ट के अनुसार, टीटीडी के अधिकारियों ने पहले भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के बीटा-सिटोस्टेरोल परीक्षण को अनिवार्य करने की योजना बनाई थी, जिसे 1 जुलाई 2022 से लागू होना था। लेकिन बाद में इसे बदल दिया गया और आपूर्तिकर्ताओं को छूट दे दी गई। इसके कारण 70 लाख किलो से अधिक घी बिना जरूरी जांच के खरीदा गया।
सही तरीके से लागू नहीं किए गए निविदा नियम
आयोग ने कहा, यह पूरी प्रक्रिया में प्रशासनिक विफलता थी। निविदा (टेंडर) के नियमों को सही तरीके से लागू नहीं किया गया और सुरक्षा मानक धीरे-धीरे कमजोर कर दिए गए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ अहम लैब रिपोर्ट को दबा दिया गया,जिनमें मिलावट की पुष्टि थी, उन्हें और खरीद के फैसले बिना सही निगरानी के लिए गए।
जांच में पाया गया कि निविदा समिति के सदस्यों ने बिना पूरी मंजूरी के नियमों में ढील दी और कम कीमत वाली बोलियों को बिना जांच के स्वीकार किया। 2019 में तय किए गए पात्रता नियमों को भी कुछ महीनों में कमजोर कर दिया गया, जिससे कुछ ऐसी कंपनियां भी आपूर्तिकर्तां में शामिल हो गईं, जिनके पास जरूरी उत्पादन क्षमता नहीं थी।
लैब की रिपोर्ट को दबा दिया गया
प्रयोगशाला में एक परीक्षण में अगस्त 2022 में यह भी पाया गया कि घी में वनस्पति तेल की मिलावट है। लेकिन रिपोर्ट को दबा दिया गया और संबंधित कंपनियों को काली सूची में नहीं रखा गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ कंपनियों को एफएसएसएआई परीक्षण से छूट दी गई, जिससे बड़े पैमाने पर बिना जांच के घी की खरीद हुई। आपूर्तिकर्ताओं ने बोली की प्रक्रिया में बहुत कम कीमतें देकर अनुबंध हासिल किए। कुछ मामलों में अयोग्य कंपनियों को भी ठेके दिए गए, जबकि उनकी उत्पादन क्षमता सही नहीं थी।
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टीटीडी की प्रयोगशाला में भी आधुनिक जांच उपकरण नहीं थे और उसका अपग्रेड तीन साल तक टलता रहा। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि जांच और निरीक्षण समितियों में वही लोग शामिल थे, जिससे स्वतंत्र निगरानी कमजोर हुई। कई शिकायतों और गुणवत्ता निगरानी प्रणाली को भी नजरअंदाज किया गया। भोले बाबा ऑर्गेनिक डेयरी जैसी कुछ कंपनियों पर आरोप है कि उन्होंने मिलावटी घी की आपूर्ति जारी रखी और सिंथेटिक केमिकल का इस्तेमाल किया।
प्रीमियर एग्री फूड्स जैसी प्रमुख आपूर्तिकर्ता कंपनियों को भी मिलावट के बावजूद ऑर्डर मिलते रहे। एक अन्य कंपनी एआर डेयरी फूड ने उत्पादन के गलत आंकड़े दिए, लेकिन फिर भी आपूर्ति कर्ता बनी रही। आयोग ने टीटीडी बोर्ड, खरीद समिति के सदस्यों और अधिकारियों को इस पूरी गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार ठहराया है।
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