तीन तलाक कानून ने बनाया आरिफ मोहम्मद खान के लिए राजभवन का रास्ता, आज लेंगे शपथ
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मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक-2017 ने केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के लिए राजभवन का रास्ता बनाया। आरिफ मोहम्मद खान त्रिवेन्द्रम पहुंच चुके हैं और आज राज्यपाल के तौर पर पद और गोपनीयता की शपथ लेंगे। अमर उजाला से अपने नई दिल्ली स्थित आवास पर विशेष बातचीत के दौरान आरिफ मोहम्मद खान ने माना कि अस्सी के दशक में तीन तलाक मुद्दे ने उनके राजनीतिक जीवन में उथल-पुथल पैदा कर दी थी।
इसी तीन तलाक ने सितंबर-अक्टूबर 2017 को फिर नई चुनौती दी। समय का चक्र देखिए कि तीन तलाक की कुप्रथा रोकने के लिए संसद ने 2019 में मंजूरी दे दी, राष्ट्रपति ने विधेयक पर हस्ताक्षर कर दिया और इसके कुछ ही सप्ताह बाद उन्हें केरल का राज्यपाल बनाए जाने की घोषणा हो गई।
तीन तलाक विधेयक में अहम भूमिका
दरअसल तीन तलाक बिल पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ आरिफ मोहम्मद खान की चर्चा, तीन तलाक के विधेयक निर्माण में खान की भूमिका और इसके लिए उनके द्वारा उठाई गई आवाज ने फिर से जीवंत बना दिया। आरिफ मोहम्मद खान प्रधानमंत्री मोदी के करीब आते चले गए। माना जाता है कि तीन तलाक विधेयक में सजा का प्रावधान भी उन्हीं की सलाह है। खान ने ही इस विषय पर कई विशेष तर्क दिए हैं।
2010 में लिखी बेस्ट सेलर किताब
आरिफ मोहम्मद खान ने अस्सी के दशक में राजीव गांधी मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के बाद धार्मिक विचारों को सुधारने में सक्रिय भूमिका निभाने लगे। कुरान एंड कंटेंपरेरी चैलेंज उनकी 2010 की बेस्ट सेलर किताबों में है। आरिफ मोहम्मद खान के लेख लगातार सुधार की आवाज उठाते रहे हैं। वह कहते हैं कि तीन तलाक मुस्लिम समाज में औरत को जिंदा दफन कर देने जैसा है। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में जन्मे आरिफ मोहम्मद खान सातवीं, आठवीं, नौवीं और 12वीं लोकसभा के सदस्य रहे।
एएमयू छात्र संघ के अध्यक्ष पद से शुरू हुआ राजनीतिक जीवन
आरिफ मोहम्मद खान 1972-73 में अलीगढ़ मुस्लिम विद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए और यहीं से उन्होंने राजनीति में सीढ़ियां चढ़ने की शुरुआत की। हालांकि इससे पहले 1971-72 में उन्होंने स्याना विधानसभा क्षेत्र बुलंदशहर से भारतीय क्रांति दल के टिकट पर चुनाव भी लड़ा था। इस चुनाव में वह हार गए थे। 1977 में वह फिर जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े और इस बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुन लिए गए और राज्य सरकार में मंत्री बने। लेकिन जल्द ही लखनऊ में हुए शिया-सुन्नी दंगों से आहत होकर मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया। आरिफ मोहम्मद खान तब महज 26 साल के थे।
2004 में बने थे भाजपाई, तीन साल बाद कहा अलविदा
इसके बाद खान ने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ले ली और इंदिरा गांधी के बेहद करीब हो गए। 1980 में कांग्रेस के टिकट से कानपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा, जीत गए और इंदिरा गांधी ने उन्हें अपनी सरकार में उप मंत्री बनाया। 1984 में बहराइच से लोकसभा के लिए चुने गए और राजीव सरकार में कैबिनेट मंत्री बने, लेकिन 1986 में शाहबानो मामले में राजीव गांधी से मतभेद के बाद मंत्री पद से इस्तीफा देकर बाद में विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ कांग्रेस छोड़ दी। 1989 के चुनाव में जनता दल के टिकट से चुनाव लड़े और जीत हासिल कर केंद्र में नागरिक उड्डयन, फिर ऊर्जा मंत्री बने। बाद में खान ने जनता दल छोड़कर बसपा की सदस्यता ले ली।
बाद में, 1998 में बहराइच से लोकसभा का चुनाव लड़े, जीत गए। 2004 में आरिफ मोहम्मद खान फिर भाजपा में शामिल हो गए और कैसरगंज से लोकसभा का चुनाव लड़े लेकिन हार गए। 2007 में भाजपा के साथ सक्रिय राजनीति को भी अलविदा कह दिया।