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तीन तलाक : इस्लाम की तालीम से अलग कैसे बना ये बीवी को छोड़ने का जरिया

Thu, 09 Aug 2018 05:57 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 09 Aug 2018 05:57 PM IST
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Tripal Talaq: How to Separate against the Training of Islam

तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अब केंद्र सरकार अगले छह महीने में ट्रिपल तलाक पर कानून बनाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई कि केंद्र जो कानून बनाएगा उसमें मुस्लिम संगठनों और शरिया कानून संबंधी चिंताओं का भी खयाल रखा जाएगा। तीन तलाक विधेयक में कुछ संशोधन पर गुरुवार को केंद्रीय कैबिनेट ने मंजूरी दे दी। तीन तलाक और निकाह हलाला संबंधी मुस्लिम महिला विधेयक 2017 में हुए संशोधन के मुताबिक, तीन तलाक के अपराध को गैर जमानती नहीं बनाया गया है, लेकिन अगर मजिस्ट्रेट चाहे तो अपराधी को जमानत दी जा सकती है।

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तीन तलाक मुस्लिम समाज में तलाक का ऐसा जरिया है, जिससे कोई भी मुस्लिम शख्स अपनी बीवी को सिर्फ तीन बार तलाक कहकर अपनी शादी को तोड़ सकता है। इस्लाम में तलाक की एक प्रकिया बताई गई है और इस प्रकिया से होने वाले तलाक स्थिर होते हैं, जिसके बाद शादी का रिश्ता टूट जाता है। 
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तीन तलाक का जिक्र न तो कुरान में कहीं आया है और न ही हदीस में। यानी तीन तलाक इस्लाम का मूल भाग है ही नहीं और सुप्रीम कोर्ट के आज के इस फैसले से पहले भी अगर ट्रिपल तलाक से पीड़ित कोई महिला उच्च अदालत पहुंची है तो अदालत ने कुरान और हदीस की रौशनी में तीन तलाक को गैर इस्लामिक कहा है। तीन तलाक पहले भी गैर इस्लामिक ही था और अदालत के आज के फैसले के बाद भी गैर इस्लामिक है।
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इस्लाम से पहले अरब में औरतों की दशा बहुत खराब थी। वे गुलामों की तरह खरीदी बेची जाती थीं। तलाक भी कई तरह के हुआ करते थे, जिसमें महिलाओं के अधिकार न के बराबर थे। इस दयनीय स्थिति में पैगम्बर हजरत मोहम्मद सब खत्म कराकर तलाक-ए-अहसन लाए।
 

Tripal Talaq: How to Separate against the Training of Islam

इस्लाम की सही समझ

वास्तव में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद आम लोगों में इस्लाम की सही समझ बढ़ेगी और भ्रांतियां दूर होंगी, क्योंकि जिस मुद्दे को इस्लाम का विरोध बताकर प्रचारित किया जा रहा था वह तो वास्तव में इस्लाम है ही नहीं। इस्लाम मानव कल्याण की बात करता है तो वह औरतों के खिलाफ इतने क्रूर तरीके की हिमायत कैसे कर सकता है। आम मुसलमान सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत कर रहे हैं और करना भी चाहिए, क्योंकि जिस तरह सुप्रीम कोर्ट का एक काम संविधान की सही व्याख्या करना है, उसी तर्ज पर आज के फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक पर इस्लाम की व्याख्या की है, जिससे गलतफमियां दूर होंगी।

दरअसल, दीने इब्राहीम की रिवायात के मुताबिक अरब, जाहिलियत के दौर में भी तलाक से अनजान नहीं थे, उनका इतिहास बताता है कि तलाक का कानून उनके यहां भी लगभग वही था, जो अब इस्लाम में है, लेकिन कुछ बिदअतें उन्होंने इसमें भी दाखिल कर दी थी।

जब किसी पति-पत्नी का झगड़ा बढ़ता दिखाई दे, तो अल्लाह ने कुरान में उनके करीबी रिश्तेदारों और उनका भला चाहने वालों को यह हिदायतें दी है कि वो आगे बढ़ें और मामले को सुधारने की कोशिश करें। इसका तरीका कुरान ने यह बतलाया है कि  “एक फैसला करने वाला शौहर के खानदान में से मुकर्रर (नियुक्त) करें और एक फैसला करने वाला बीवी के खानदान में से चुने और वो दोनों पक्ष मिल कर उनमे सुलह कराने की कोशिश करें। इससे उम्मीद है कि जिस झगड़े को पति पत्नी नहीं सुलझा सके वो खानदान के बुज़ुर्ग और दूसरे हमदर्द लोगों के बीच में आने से सुलझ जाए।

Tripal Talaq: How to Separate against the Training of Islam

क्या है लिखित नियम?

इसके बावजूद भी अगर शौहर और बीवी दोनों या दोनों में से किसी एक ने तलाक का फैसला कर ही लिया है, तो शौहर बीवी के खास दिनों के आने का इंतजार करे, और खास दिनों के गुझर जाने के बाद जब बीवी पाक हो जाए तो बिना हम बिस्तर हुए कम से कम दो जुम्मेदार लोगों को गवाह बना कर उनके सामने बीवी को एक तलाक दे,  यानी शौहर हर बीवी से सिर्फ इतना कहे कि ”मैं तुम्हे तलाक देता हूं”।

तलाक हर हाल में एक ही दी जाएगी दो या तीन या सौ नहीं, जो लोग जिहालत की हदें पार करते हुए दो तीन या हजार तलाक बोल देते हैं, यह इस्लाम के बिल्कुल खिलाफ अमल है और बहुत बड़ा गुनाह है। अल्लाह के रसूल (सल्लाहू अलैहि वसल्लम) के फरमान के मुताबिक जो ऐसा बोलता है, वो इस्लामी शरियत और कुरान का मजाक उड़ा रहा होता है।

इस एक तलाक के बाद बीवी 3 महीने यानी 3 तीन हैज (जिन्हें इद्दत कहा जाता है और अगर वो प्रेग्नेंट है तो बच्चा होने तक) शौहर ही के घर रहेगी और उसका खर्च भी शौहर ही के जिम्मे रहेगा, लेकिन उनके बिस्तर अलग रहेंगे, कुरान ने सूरेह तलाक में हुक्म फरमाया है कि इद्दत पूरी होने से पहले ना तो बीवी को ससुराल से निकाला जाए और ना ही वो खुद निकले, इसकी वजह कुरान ने यह बतलाई है कि इससे उम्मीद है कि इद्दत के दौरान शौहर बीवी में सुलह हो जाए और वो तलाक का फैसला वापस लेने को तैयार हो जाएं।

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