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Tribhuvan Cooperative University: वैश्विक ज्ञान का केंद्र बन सकता है संस्थान; सहकारिता का भविष्य जाएगा बदल
Fri, 11 Apr 2025 05:40 AM IST
शुभम कुमार
क्षेत्रीय निदेशक, इंटरनेशनल कोऑपरेटिव एलायंस एशिया एंड पैसिफिक बालासुब्रमण्यम अय्यर
क्षेत्रीय निदेशक, इंटरनेशनल कोऑपरेटिव एलायंस एशिया एंड पैसिफिक बालासुब्रमण्यम अय्यर
Published by: शुभम कुमार
Updated Fri, 11 Apr 2025 05:40 AM IST
सार
त्रिभुवन सहकारी यूनिवर्सिटी ऐसा केंद्र बनेगा, जहां शिक्षा, नीति निर्माता और सहकारिता से जुड़े नए पथ ईजाद होंगे। भारत के पहले राष्ट्रीय सहकारी यूनिवर्सिटी लिए विधेयक का संसद में पारित होना भारतीय सहकारी आंदोलन की यात्रा में मील का पत्थर है।
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संसद
- फोटो : ANI
विस्तार
भारत के पहले राष्ट्रीय सहकारी यूनिवर्सिटी, त्रिभुवन सहकारी यूनिवर्सिटी के लिए विधेयक का संसद में पारित होना भारतीय सहकारी आंदोलन की यात्रा में मील का पत्थर है। इसका अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष में संपन्न होना, इसके महत्व को और बढ़ाता है। जैसा कि केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा, यह यूनिवर्सिटी सहकार से समृद्धि के दृष्टिकोण को साकार करने में शक्तिशाली माध्यम बनने को तैयार है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े सहकारी आंदोलन का घर है, जिसमें 8 लाख से ज्यादा सहकारी समितियां और 28.7 करोड़ सदस्य शामिल हैं। रोटी, कपड़ा से लेकर मकान तक की जरूरतों के लिए दैनिक जीवन में गहराई से समाहित सहकारी समितियां सिर्फ आर्थिक संस्थाएं नहीं हैं, वे समुदाय-संचालित विकास, आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। 2021 में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना ने इस क्षेत्र के लिए एक नई राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का संकेत दिया, जिसका उद्देश्य इसकी पहुंच का विस्तार करना, दक्षता में सुधार करना और समावेशी विकास की आधारशिला के रूप में एकीकृत करना है।
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अपने विस्तार और पहुंच के बावजूद, सहकारी क्षेत्र में शिक्षा और प्रशिक्षण की अवरचना आंशिक, अविकसित और असमान रूप से वितरित है। प्रबंधकीय और प्रशासनिक से लेकर तकनीकी और परिचालन तक योग्य पेशेवरों की मांग आपूर्ति से कहीं अधिक है। मौजूदा कर्मचारियों और बोर्ड के सदस्यों की क्षमता निर्माण में निवेश करने की आवश्यकता भी महत्वपूर्ण है। इन कर्मचारियों में से कई के पास नियमित प्रशिक्षण या शिक्षा के अवसरों तक पहुंच नहीं है।
मानकीकृत पाठ्यक्रम, गुणवत्ता आश्वासन और संस्थागत सामंजस्य के बिना, यह क्षेत्र अपनी क्षमता का पूरी तरह से लाभ नहीं ले सकता है या अपने विकास को बनाए नहीं रख सकता है। सहकारी आंदोलन में नई और युवा पीढ़ियों को आकर्षित करने की भी सख्त जरूरत है-ऐसे व्यक्ति जो न केवल पेशेवर हों, बल्कि सहकारी मूल्यों से प्रेरित हों और क्षेत्र में नवाचार करने के लिए आतुर हों। यहां, त्रिभुवन यूनिवर्सिटी परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकता है: शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुसंधान के लिए एक केंद्र के रूप में सेवा करके, जो नई पीढ़ी के सहकारी नेताओं को बढ़ावा देते हुए सभी स्तरों पर क्षमता का निर्माण कर सकेगा।
अमूल मॉडल के वास्तुकार, दूरदर्शी त्रिभुवनदास पटेल के नाम पर, और भारत की डेयरी सहकारी क्रांति के उद्गम स्थल आणंद में स्थित यह यूनिवर्सिटी एक प्रतीकात्मक श्रद्धांजलि है। साथ ही रणनीतिक हस्तक्षेप भी है। दशकों से सहकारी प्रबंधन शिक्षा में अग्रणी भूमिका निभाने वाले ग्रामीण प्रबंधन संस्थान आणंद का इस यूनिवर्सिटी की नींव के रूप में चयन व्यावहारिक और प्रेरणादायक दोनों है।
यूनिवर्सिटी का विजन सिर्फ औपचारिक प्रबंधन डिग्री तक सीमित न होकर काफी विस्तृत है। यह प्राथमिक और माध्यमिक सहकारी समितियों के बोर्ड सदस्यों, सहकारी क्षेत्र में कार्य कर रहे कर्मचारियों, और नैतिक, सस्टेनेबल और समावेशी व्यवसाय मॉडल में रुचि रखने वाले युवाओं की नई पीढ़ी तक अपनी पहुंच बढ़ाएगा। इसके लिए, यूनिवर्सिटी लचीले शिक्षण मॉड्यूल, प्रमाणन कार्यक्रम, डिग्री कार्यक्रम, डिजिटल पहुंच प्रदान करेगा और क्षेत्र-आधारित ऐसे शोध का जरिया बनेगा, जिनसे स्व-सहायता, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पारस्परिक जिम्मेदारी के सहकारी मूल्यों का लाभ सभी को मिल सकेगा।
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राष्ट्रीय ज्ञान का मंच
यह यूनिवर्सिटी सहकारी विकास के लिए राष्ट्रीय और वैश्विक ज्ञान केंद्र बन सकता है, एक ऐसा स्थान, जहां प्रयोग और नीति का संगम हो और जहां नेतृत्व सीख से प्रेरित हो। नई दिल्ली में वैश्विक सहकारी सम्मेलन, 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सहकारी समितियों को एकजुट करने, साझा मंच बनाने, आम चुनौतियों से निपटने और सामूहिक रूप से आगे का रास्ता तय करने में वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करने का आह्वान किया। राष्ट्रीय यूनिवर्सिटी ऐसा ही एक मंच प्रदान करता है-जो संवाद को बढ़ावा देने, सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने और सहकारी समितियों के बीच दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मजबूत करने में सक्षम है।
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भारत दुनिया के सबसे बड़े सहकारी आंदोलन का घर है, जिसमें 8 लाख से ज्यादा सहकारी समितियां और 28.7 करोड़ सदस्य शामिल हैं। रोटी, कपड़ा से लेकर मकान तक की जरूरतों के लिए दैनिक जीवन में गहराई से समाहित सहकारी समितियां सिर्फ आर्थिक संस्थाएं नहीं हैं, वे समुदाय-संचालित विकास, आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। 2021 में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना ने इस क्षेत्र के लिए एक नई राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का संकेत दिया, जिसका उद्देश्य इसकी पहुंच का विस्तार करना, दक्षता में सुधार करना और समावेशी विकास की आधारशिला के रूप में एकीकृत करना है।
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अपने विस्तार और पहुंच के बावजूद, सहकारी क्षेत्र में शिक्षा और प्रशिक्षण की अवरचना आंशिक, अविकसित और असमान रूप से वितरित है। प्रबंधकीय और प्रशासनिक से लेकर तकनीकी और परिचालन तक योग्य पेशेवरों की मांग आपूर्ति से कहीं अधिक है। मौजूदा कर्मचारियों और बोर्ड के सदस्यों की क्षमता निर्माण में निवेश करने की आवश्यकता भी महत्वपूर्ण है। इन कर्मचारियों में से कई के पास नियमित प्रशिक्षण या शिक्षा के अवसरों तक पहुंच नहीं है।
मानकीकृत पाठ्यक्रम, गुणवत्ता आश्वासन और संस्थागत सामंजस्य के बिना, यह क्षेत्र अपनी क्षमता का पूरी तरह से लाभ नहीं ले सकता है या अपने विकास को बनाए नहीं रख सकता है। सहकारी आंदोलन में नई और युवा पीढ़ियों को आकर्षित करने की भी सख्त जरूरत है-ऐसे व्यक्ति जो न केवल पेशेवर हों, बल्कि सहकारी मूल्यों से प्रेरित हों और क्षेत्र में नवाचार करने के लिए आतुर हों। यहां, त्रिभुवन यूनिवर्सिटी परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकता है: शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुसंधान के लिए एक केंद्र के रूप में सेवा करके, जो नई पीढ़ी के सहकारी नेताओं को बढ़ावा देते हुए सभी स्तरों पर क्षमता का निर्माण कर सकेगा।
अमूल मॉडल के वास्तुकार, दूरदर्शी त्रिभुवनदास पटेल के नाम पर, और भारत की डेयरी सहकारी क्रांति के उद्गम स्थल आणंद में स्थित यह यूनिवर्सिटी एक प्रतीकात्मक श्रद्धांजलि है। साथ ही रणनीतिक हस्तक्षेप भी है। दशकों से सहकारी प्रबंधन शिक्षा में अग्रणी भूमिका निभाने वाले ग्रामीण प्रबंधन संस्थान आणंद का इस यूनिवर्सिटी की नींव के रूप में चयन व्यावहारिक और प्रेरणादायक दोनों है।
यूनिवर्सिटी का विजन सिर्फ औपचारिक प्रबंधन डिग्री तक सीमित न होकर काफी विस्तृत है। यह प्राथमिक और माध्यमिक सहकारी समितियों के बोर्ड सदस्यों, सहकारी क्षेत्र में कार्य कर रहे कर्मचारियों, और नैतिक, सस्टेनेबल और समावेशी व्यवसाय मॉडल में रुचि रखने वाले युवाओं की नई पीढ़ी तक अपनी पहुंच बढ़ाएगा। इसके लिए, यूनिवर्सिटी लचीले शिक्षण मॉड्यूल, प्रमाणन कार्यक्रम, डिग्री कार्यक्रम, डिजिटल पहुंच प्रदान करेगा और क्षेत्र-आधारित ऐसे शोध का जरिया बनेगा, जिनसे स्व-सहायता, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पारस्परिक जिम्मेदारी के सहकारी मूल्यों का लाभ सभी को मिल सकेगा।
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राष्ट्रीय ज्ञान का मंच
यह यूनिवर्सिटी सहकारी विकास के लिए राष्ट्रीय और वैश्विक ज्ञान केंद्र बन सकता है, एक ऐसा स्थान, जहां प्रयोग और नीति का संगम हो और जहां नेतृत्व सीख से प्रेरित हो। नई दिल्ली में वैश्विक सहकारी सम्मेलन, 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सहकारी समितियों को एकजुट करने, साझा मंच बनाने, आम चुनौतियों से निपटने और सामूहिक रूप से आगे का रास्ता तय करने में वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करने का आह्वान किया। राष्ट्रीय यूनिवर्सिटी ऐसा ही एक मंच प्रदान करता है-जो संवाद को बढ़ावा देने, सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने और सहकारी समितियों के बीच दक्षिण-दक्षिण सहयोग को मजबूत करने में सक्षम है।