Politics: ऐसे जुड़ रही हैं 'ग्रैंड अलायंस' की कड़ियां, अखिलेश समेत ये 'तीन नेता' विपक्षी एकता बनाने में जुटे
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विस्तार
जनवरी के दूसरे सप्ताह के बाद तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने हैदराबाद में एक बड़ा कार्यक्रम किया था। रैली में जितने चेहरे थे वह सभी विपक्षी दलों के नेता थे और एक नए बड़े विपक्षी दलों के समूह को एक साथ जोड़ने की शुरुआत कर रहे थे। केसीआर की इस रैली के बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा श्रीनगर में समाप्त हुई। उसमें भी कई नेता शामिल हुए। जिसमें कुछ चेहरे ऐसे थे जो प्रमुख विपक्षी दलों के साथ मिलकर एक बड़ा धड़ा बनाने की तैयारी कर रहे थे। इन दो बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों में विपक्षी नेताओं के जुटान के बाद तीसरा और महत्वपूर्ण आयोजन अभी कुछ दिन पहले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के जन्मदिन का हुआ। जन्म दिवस के आयोजन पर कुछ नेता केसीआर की रैली के थे तो कुछ चेहरे राहुल गांधी के भारत जोड़ो यात्रा के समापन पर मौजूद रहने वाले भी थे। विपक्षी दलों के नेताओं की जुटान का यह कार्यक्रम यही नहीं समाप्त होता है। रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखी गई नौ नेताओं की चिट्ठी और उपरोक्त तीनों कार्यक्रमों में शामिल अलग-अलग नेताओं को अगर कड़ीबद्ध तरीके से जोड़ा जाए जाए तो 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले "ग्रैंड एलाइंस" का एक बड़ा मुकम्मल आधार माना जा रहा है।
सियासी जानकारों का कहना है कि केसीआर की रैली हो या स्टालिन का जन्मदिन या फिर सरकारी एजेंसियों पर नाराजगी जताते हुए विपक्षी नेताओं की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखी गई चिट्ठी। यह सब बताता है कि 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले भले ही अलग-अलग मंच पर अलग-अलग नेता दिखे हों, लेकिन इनकी चाहत एक बड़े ग्रैंड अलायंस की ही दिख रही है। राजनीति विश्लेषक जटाशंकर सिंह कहते हैं कि जनवरी के दूसरे सप्ताह के बाद तेलंगाना में आयोजित की गई केसीआर की रैली में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव शामिल होते हैं। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में आदित्य ठाकरे शामिल होते हैं। श्रीनगर में जब यात्रा का समापन होता है तो फारूक अब्दुल्ला भी मौजूद होते हैं। जटाशंकर सिंह कहते हैं कि ना अखिलेश यादव राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में शामिल होते हैं ना फारूक अब्दुल्ला केसीआर की रैली में शामिल होते हैं। लेकिन स्टालिन का जन्मदिन होता है तो अखिलेश यादव और फारुख अब्दुल्ला दोनों नेता कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे के साथ मंच साझा करते हैं।
जटाशंकर सिंह कहते हैं कि यह राजनीतिक घटनाक्रम बिल्कुल अलग अलग नहीं देखे जा सकते हैं। उनका कहना है कि मंच भले अलग हो लेकिन मकसद सभी विपक्षी दलों का इस वक्त एक नजर आ रहा है। और वह है भारतीय जनता पार्टी से 2024 में मुकाबला करना। राजनीतिक विश्लेषक और दिल्ली विश्वविद्यालय राजनीति शास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर नारायण सिंह कहते हैं कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के साथ राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के समापन और यात्रा के दौरान जिन प्रमुख विपक्षी नेताओं की मौजूदगी रही वह भले एक साथ सभी मंच पर ना आ रहे हो लेकिन सबका सियासी मकसद बिल्कुल स्पष्ट नजर आ रहा है। सिंह कहते हैं कि सियासत में कुछ भी स्थाई नहीं होता है। राजनीतिक दुश्मनी कम से कम विपक्षी नेताओं और दलों में तो बिल्कुल नहीं मानी जाती है। वह भी तब जब सत्ता पक्ष लगातार जीत के झंडे गाड़ रहा होता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे में श्रीनगर से लेकर तमिलनाडु और तेलंगाना से लेकर लखनऊ तक बड़े विपक्षी सियासी दल एक "ग्रैंड अलायंस" की ओर बढ़ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है की केसीआर की रैली में अरविंद केजरीवाल शामिल होते हैं और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव भी शामिल होते हैं। फिर अखिलेश यादव तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के साथ जन्मदिन पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम में शामिल होते हैं। इसमें केजरीवाल तो नहीं शामिल होते हैं लेकिन फारूक अब्दुल्ला से लेकर मलिकार्जुन खरगे तक शामिल होते हैं। सियासी जानकारों का कहना है कि माना यही जा रहा है कि अखिलेश यादव और फारुख अब्दुल्ला समेत उद्धव ठाकरे मिलकर एक बड़े विपक्षी दलों के गुट को जोड़ रहे हैं। सियासी जानकारों का मानना है कि उद्धव ठाकरे, फारूक अब्दुल्ला और स्टालिन की जहां कांग्रेस के साथ अच्छी पैठ है। वहीं अखिलेश यादव की केसीआर और स्टालिन के साथ मजबूत जोड़ी बन रही है। क्योंकि स्टालिन के जन्मदिन पर यह तीनों नेता एक साथ थे। अब जब इतवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी गई तो जिन नेताओं ने उस पर दस्तखत किए थे उसमें ये नेता भी शामिल थे। सियासी जानकारों का कहना है कि ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, शरद पवार और तेजस्वी यादव के अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ मतभेद को यह नेता खतम करवाने में बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषक जीडी शुक्ला कहते हैं कि जिस तरीके के हालात बने हैं उससे अंदाजा यहीं लगाया जा रहा है कि सभी राजनीतिक विपक्षी दल एक साथ मिलकर 2024 में एक छतरी के नीचे आ सकते हैं। हालांकि इसमें अभी कुछ सियासी पेंच जरूर फंसा हुआ है। लेकिन विपक्षी दल उसको भी दुरुस्त करने में लगे हैं। क्योंकि जितने बड़े राजनैतिक दल एक साथ विपक्षी ग्रैंड अलायंस बनाने की तैयारी कर रहे हैं उन सभी दलों के मुखिया को उनकी पार्टी के नेता प्रधानमंत्री की रेस का सबसे बड़ा दावेदार मानते हैं। और यही सबसे बड़ा पेड़ विपक्षी नेताओं के एक बड़े संगठन को तैयार करने में बाधा भी डाल रखा है।
हालांकि कुछ प्रमुख विपक्षी पार्टियों के बड़े नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री का चेहरा तो बाद में तय कर लिया जाएगा लेकिन सबसे पहले बड़े विपक्षी दलों को एकजुट होकर 2024 की रणनीति तो बनानी ही होगी। अब जब इतवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग पर चिट्ठी लिखी गई तो उसमें शामिल विपक्षी दलों में समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, बीआरएस, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, फारूक अब्दुल्लाह की जेकेएनसी, शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) शामिल है। सियासी जानकारों का कहना है कि जिन पार्टियों ने यह चिट्ठी लिखी है उसमें कांग्रेस और जेडीयू जैसे प्रमुख विपक्षी दल शामिल नहीं है। हालांकि सूत्रों का कहना है सियासी समीकरणों को देखते हुए एक बड़े विपक्षी दलों के संगठन को साथ लेकर चलने के पक्ष में नजर आ रही है। ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले दिनों में विपक्षी दलों का एक ग्रैंड अलायंस 2024 में भारतीय जनता पार्टी से लड़ने के लिए एक साझा मंच तैयार कर सकते हैं।