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डिजिटल दुनिया में निजता का अधिकार पूर्ण नहीं हो सकता : सुप्रीम कोर्ट

Wed, 19 Jul 2017 09:29 PM IST
amarujala.com- presented by: संदीप भट्ट
amarujala.com- presented by: संदीप भट्ट Updated Wed, 19 Jul 2017 09:29 PM IST
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The right to privacy can not be fulfilled says Supreme Court on

हम डिजिटल दुनिया में रह रहे हैं। ऐसे में निजता का अधिकार ‘पूर्ण’ नहीं हो सकता है। इस पर तार्किक पाबंदियां लगाई जा सकती हैं। अगर हम निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार करार देते हैं, तो समलैंगिकता के खिलाफ दिया गया हमारा आदेश दोषपूर्ण हो जाएगा।

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ऐसें में कोई भी इसका हवाला देकर यौन प्राथमिकता को अपनी निजता बता सकता है। निजता मौलिक अधिकार है या नहीं, इस मसले का परीक्षण कर रही सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने यह टिप्पणी की।
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पीठ ने कहा कि निजता के अधिकार को परिभाषित करने के प्रयास में फायदे से ज्यादा नुकसान हो सकता है। जहां तक नागरिकों की निजी जानकारी के संरक्षण का सवाल है, तो इसके लिए वैधानिक तरीके अपनाए जा सकते हैं।
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अगर निजता को परिभाषित करना जरूरी है, तब हम तार्किक पाबंदी के साथ इसका पैमाना तय कर सकते हैं, लेकिन क्या यह अतिरेक नहीं होगा कि हम राज्य को नीति बनाने से रोके। यौन प्राथमिकता भी निजता का अधिकार हो सकता है।

अगर हम इसे सही ठहराते हैं, तो नाज फाउंडेशन मामले में हमारे द्वारा समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखने का फैसला दोषपूर्ण हो जाएगा। चीफ जस्टिस जे एस खेहर की अध्यक्षता वाली इस संविधान पीठ में जस्टिस जे चेलमेश्वर, एस ए बोबडे, आर के अग्रवाल, रोहिंगटन फली नरीमन, अभय मनोहर सप्रे, डी वाई चंद्रचूड़, संजय किशन कौल और एस अब्दुल नजीर शामिल हैं। याचियों की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल, सोली सोराबजी, श्याम दीवान और अरविंद दातार ने अपनी दलीलें पेश कीं। सुनवाई बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी।

स्वतंत्रता के अधिकार में निहित है निजता

The right to privacy can not be fulfilled says Supreme Court on
सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष निजता के अधिकार पर ऐतिहासिक सुनवाई के दौरान याचियों के वकीलों ने जोरदार दलीलें पेश कीं। याचियों की ओर से पेश चारों वकीलों का कहना था कि संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों में ही निजता का अधिकार निहित है।

अगर निजता को मौलिक अधिकार करार नहीं दिया गया तो बाकी मौलिक अधिकार बेमतलब हो जाएंगे। जीने और स्वतंत्रता के अधिकार प्राकृतिक अधिकारों की श्रेणी में आते हैं और किसी संवैधानिक व्यवस्था के कायम होने के पहले से अस्तित्व में हैं। संविधान प्रदत्त सभी मौलिक अधिकारों के संदर्भ में निजता के अधिकार के बिना जीने के अधिकार का अनुभव नहीं किया जा सकता है।  

याचियों की ओर से पेश गोपाल सुब्रह्मणयम ने कहा कि निजता सिर्फ बेडरूम तक सीमित नहीं है बल्कि यह व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार में अंतर्निहित है। स्वाधीनता के अधिकार का मतलब निजी पसंद है और इसके लिए निजता का अधिकार जरूरी है।

सोली सोराबजी के अनुसार संविधान में प्रेस की आजादी का भी जिक्र नहीं है। यह तर्क के द्वारा निकाला गया है। निजता के अधिकार की भी वहीं स्थिति है। यह अंतर्निहित है। श्याम दीवान की दलील थी कि निजता में शारीरिक अंखडता भी शामिल है। सिर्फ निरंकुश शासन में ही नागरिक का शरीर उनका अपना नहीं रहता।

उन्होंने16 मार्च, 2016 के वित्त मंत्री केउस बयान का भी जिक्र किया जिसमें कहा गया था कि निजता संभवत: मौलिक अधिकार है और यह व्यक्ति की स्वाधीनता का हिस्सा है। अरविंद दातार ने कहा कि निजता न केवल संविधान के अनुच्छेद-21 (जीने का अधिकार) में बल्कि अनुच्छेद-19 (स्वतंत्रता का अधिकार) में भी अंतर्निहित है। 

बड़ी पीठ क्यों
आधार कार्ड की अनिवार्यता के संदर्भ में निजता के अधिकार मामले की सुनवाई कर रही तीन जजों की पीठ ने 2015 में इस मामले को बड़ी पीठ को भेज दिया था। पांच जजों की बेंच ने जब इस पर सुनवाई शुरू की तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह आई कि 1950 में एम पी शर्मा बनाम सतीश चंद्र मामले में आठ जजों की पीठ और 1962 में खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश मामले में छह जजों की पीठ ने इसे मौलिक अधिकार नहीं माना था। इसलिए, इस मामले में मंगलवार को नौ जजों की संविधान पीठ गठित किया गया।

आधार की वैधता को चुनौती

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सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति के एस पुत्तस्वामी सहित 20 याचियों ने सुप्रीम कोर्ट में आधार स्कीम को चुनौती दी है। इनका मुख्य तर्क यह है कि इस स्कीम के कारण उनके निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि निजता मौलिक अधिकार नहीं है। 

क्या हैं आशंकाएं
- सरकार आधार के जरिए आम नागरिक की हर गतिविधि पर नजर रख सकती है। वह कहां जाता है, किससे मिलता है, किससे फोन पर क्या बात करता है।
- इसका राजनीतिक दुरुपयोग उन लोगों को पहचानने और परेशान करने के लिए किया जा सकता है जिनके विचारों को सरकार पसंद नहीं करती है
- यह भी पता किया जा सकता है कि आप क्या खाते हैं, क्या खरीदते हैं और कहां घूमने जाते हैं। कंपनियां इस डाटा का इस्तेमाल मार्केटिंग में कर सकती है।
- नागरिकों से संबंधित यह संवेदनशील डाटा कभी भी चोरी हो सकती है और इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। रिलायंस जियो के मामले में ऐसा हो चुका है।
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