कश्मीर से जम्मू शिफ्ट होते दहशतगर्द, हिमाचल-पंजाब के लिए क्यों है खतरे की घंटी; आर्मर पियर्सिंग से लैस आतंकी
कश्मीर से जम्मू की तरफ शिफ्ट हो रहे आतंकियों ने कठुआ, उधमपुर, किश्तवार में मुठभेड़ों के दौरान हथियार बरामद किए। सुरक्षा विशेषज्ञों ने हिमाचल और पंजाब के लिए भी चेतावनी दी है।
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विस्तार
कश्मीर में मौजूद दहशतगर्द अब जम्मू डिवीजन की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में खासतौर पर कठुआ, सांबा, उधमपुर, रियासी, पुंछ, राजौरी और किश्तवार में आतंकी गतिविधियां सामने आई हैं। दो-तीन सप्ताह में कठुआ, उधमपुर और किश्तवार में लगभग दर्जनभर आतंकी मुठभेड़ हो चुकी हैं। पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन 'जैश-ए-मोहम्मद' के चार आतंकवादी मारे गए हैं। बड़े पैमाने पर सर्च अभियान चल रहा है। कठुआ जिले के बिलावर इलाके में कई आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया गया है। उधमपुर के जंगलों में प्राकृतिक गुफा से भारी मात्रा में हथियार, गोला बारूद एवं दूसरा सामान बरामद हुआ है।
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि जम्मू क्षेत्र में शिफ्ट होता आतंकवाद, हिमाचल प्रदेश और पंजाब के लिए खतरे की घंटी है। कठुआ, दक्षिण-पूर्व में पंजाब, उत्तर-पूर्व में हिमाचल प्रदेश, उत्तर/उत्तर पश्चिम में डोडा व उधमपुर जिले, पश्चिम में जम्मू और दक्षिण-पश्चिम में पाकिस्तान की सीमा से लगता है। जम्मू क्षेत्र में आतंकियों के कब्जे से यूएस निर्मित एम4 कारबाइन और चीन में बनी 'आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी' यानी स्टील बुलेट बरामद हुई हैं।
लांचिंग पैड पर 125 से ज्यादा दहशतगर्द ...
जम्मू-कश्मीर की खुफिया इकाई से जुड़े सूत्र बताते हैं, अगर तीन-चार वर्षों के दौरान हुई आतंकी घटनाओं का विश्लेषण करें तो मालूम पड़ता है कि आतंकी, कश्मीर से जम्मू की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में अभी करीब चार दर्जन पाकिस्तानी आतंकवादी छिपे हैं। लोकल आतंकियों की बात करें तो वह संख्या उक्त आंकड़े की तुलना में आधी भी नहीं है। लोकल आतंकियों की संख्या का ग्राफ अब तेजी से गिर रहा है। वजह, नई भर्ती नहीं हो पा रही। हालांकि इस बीच आतंकियों के मददगार 'ओवर ग्राउंड वर्कर' की संख्या में कम ही सही, मगर बढ़ोतरी देखने को मिली है। सीमा पार के लांचिंग पैड पर 125 से ज्यादा दहशतगर्द, घुसपैठ करने के लिए तैयार बैठे हैं। अब इन सभी का फोकस 'जम्मू' क्षेत्र पर है।
जम्मू क्षेत्र में प्राकृतिक गुफाओं की भरमार ...
जेकेपी के पूर्व महानिदेशक एसपी वैद्य का कहना है, ये बात सही है कि कुछ वर्षों से आतंकवाद, कश्मीर से जम्मू की तरफ शिफ्ट हो रहा है। पड़ोसी मुल्क, पाकिस्तान और चीन भी यही चाहते हैं कि आतंकवाद जम्मू के रास्ते भारत के दूसरे प्रदेशों तक पहुंच जाए। अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद कश्मीर में हालात बेहतर हुए हैं। विकास ने रफ्तार पकड़ी है। गुमराह हुए अधिकांश युवा भी अब मुख्यधारा में लौट चुके हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो धीरे-धीरे जेएंडके में आतंकवाद, हार की तरफ अग्रसर है। इसके चलते चीन और पाकिस्तान, दोनों मुल्कों में बौखलाहट है। नतीजा, उन्होंने दहशतगर्दों का फोकस जम्मू की तरफ कर दिया है। कश्मीर प्लेन क्षेत्र था, वहां पर रोड नेटवर्क अच्छा है। इसके विपरित जम्मू क्षेत्र में सभी जगहों पर अभी वैसा नहीं है। यहां पर सुरक्षा बलों को बहुत ज्यादा पैदल चलना पड़ता है। पहाड़ और जंगल भी खूब हैं। गांवों के बीच की दूरी अधिक है। दहशतगर्दों को छिपने की पर्याप्त जगह मिल जाती है। प्राकृतिक गुफाओं की भरमार है।
आगे आ रहे हैं पाकिस्तानी दहशतगर्द ...
बतौर एसपी वैद्य, एलओसी पर घुसपैठ के प्रयास भी होते रहते हैं। इसके लिए कठुआ, पुंछ और राजौरी जैसे क्षेत्र, दहशतगर्दों को रास आते हैं। साथ ही इन क्षेत्रों में जनसंख्या का स्वरूप मिला-जुला है। अनुच्छेद 370 के खत्म होने के बाद जो नेरेटिव बना था, उसे आतंकी अब जम्मू में काउंटर करना चाहते हैं। जम्मू में तो 15 साल से हालात नॉमर्ल थे। यहां पर तो स्थानीय आतंकी भी सक्रिय नहीं थे। अब यहां पर पाकिस्तानी दहशतगर्दों को आगे किया जा रहा है। कई वर्षों के दौरान कठुआ, उधमपुर, डोडा, किश्तवार, पुंछ, राजौरी और दूसरे इलाकों में हुई मुठभेड़ में जितने आतंकी मारे गए हैं, उनमें ज्यादातर पाकिस्तानी हैं। कश्मीर में आतंकियों को लोकल स्पोर्ट मिलना आम बात थी। जम्मू में ऐसा संभव नहीं था, लेकिन अब जम्मू क्षेत्र में भी आतंकियों के मददगार सामने आ रहे हैं। आतंकी संगठन, 'ओवर ग्राउंड वर्कर' तैयार कर रहे हैं। पैसा, विचार या डर, ये बातें, लोगों को मदद के लिए आगे ला रही हैं। अब कठुआ से आगे हिमाचल प्रदेश और पंजाब की तरफ ये आतंकी बढ़ते हैं तो सुरक्षा बलों के लिए एक नई और खतरनाक चुनौती खड़ी हो सकती है। हिमाचल प्रदेश में पहाड़ और जंगल हैं तो पंजाब में पाकिस्तान के आतंकी संगठन, अपनी जड़ें जमाने के प्रयासों में लगे हैं।
जम्मू को सॉफ्ट टारगेट मान रहे हैं दहशतगर्द ...
जेंएडके के रक्षा विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर (रिटा) कहते हैं, पाकिस्तान अब जम्मू को टारगेट कर रहा है। वहां के आतंकी संगठन, जम्मू को सॉफ्ट टारगेट मान रहे हैं। घुसपैठ की ज्यादा संभावना भी इस क्षेत्र में है। ऐसे में सेना और बीएसएफ को यह प्रयास करना होगा कि इस क्षेत्र में घुसपैठ का कोई भी मामला न हो। ड्रोन व टनल आदि पर नजर रखनी पड़ेगी। यहां मौजूद दहशतगर्द, चीन के संचार उपकरण इस्तेमाल करते हैं। वे सायफर भाषा में संदेशों का आदान प्रदान करते हैं। इन्हें ट्रैक करना आसान नहीं है। अपनी पहचान छिपाने व खुफिया एजेंसियों को गुमराह करने के लिए आतंकी, संचार प्रक्रिया में सांकेतिक नामों का इस्तेमाल करते हैं। टेलीग्राम भी बातचीत करने का अत्यंत सुरक्षित माध्यम है। इस एप के चैट को डिकोड से निकालना आसान नहीं है। सिफरटेक्स्ट एक एन्क्रिप्टेड टेक्स्ट है, जिसे एन्क्रिप्शन एल्गोरिदम के उपयोग से प्लेनटेक्स्ट में बदला जाता है। सिफरटेक्स्ट को तब तक नहीं पढ़ा जा सकता, जब तक इसे कुंजी के साथ प्लेनटेक्स्ट में परिवर्तित (डिक्रिप्ट) न कर दिया जाए।
'आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी' और एम4 से लैस आतंकी ...
2017 में पुलवामा के लेथपोरा में स्थित सीआरपीएफ कैंप पर हुए हमले में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने 'आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी' यानी स्टील बुलेट इस्तेमाल की थी। स्टील की गोली का वार झेलने की क्षमता 'लेवल-4' बुलेटप्रूफ कवच में होती है। चीन में निर्मित इस गोली को पाकिस्तान में लाया जाता है। वहां से ये गोलियां, जम्मू कश्मीर में मौजूद आतंकियों तक पहुंचती हैं। जानकारों का कहना है कि आर्मी या किसी अन्य फोर्स में 'आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी' का इस्तेमाल, गैर-कानूनी है। यहां तक कि 'नाटो' ने भी स्टील की गोलियों पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। चीन और पाकिस्तान में ये गोलियां प्रयोग में लाई जा रही हैं। पुंछ का आतंकी हमला, जिसमें सेना के पांच जवान शहीद हुए थे, आतंकियों ने इन्हीं गोलियों का इस्तेमाल किया था। 7.62 एमएम स्टील कोर की गोलियों की मारक क्षमता तीन सौ मीटर तक बताई गई है। हालांकि आतंकी, इनका इस्तेमाल निकट की लड़ाई में करते हैं। महज कुछ मीटर दूरी से एके-47 या इसी सीरिज की किसी दूसरी राइफल से इसका फायर किया जाता है।
हर जगह नहीं है 'लेवल-4' बुलेटप्रूफ कवच …
ज्यादातर बुलेटप्रूफ वाहन, मोर्चा, जैकेट और पटका 'लेवल 3' श्रेणी वाले होते हैं। अगर इन पर स्टील की गोलियां दागी जाती हैं तो वे आर-पार चली जाती हैं। यानी उसे किसी वाहन, मोर्चा या बुलेटप्रूफ जैकेट पहने व्यक्ति पर चलाते हैं तो वह उसे भेदते हुए दूसरे सिरे से बाहर निकल जाती है। अभी देश में हर जगह पर 'लेवल-4' बुलेटप्रूफ कवच नहीं है। इस कवच को केवल चुनींदा ऑपरेशनों में ही इस्तेमाल किया जाता है। 2017 में लेथपोरा स्थित सीआरपीएफ कैंप पर हुए हमले में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने इन्हीं गोलियों का इस्तेमाल कर सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया था। कई जवानों, जिन्होंने बुलेटप्रूफ जैकेट पहन रखी थी, उसे 'आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी' ने भेद दिया था। इसके अलावा वहां लगे मोर्चे भी उसकी मार को नहीं झेल सके थे।
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