Telangana: राहुल ने चला पूरे साउथ के लिए 'डोसा पॉलिटिक्स' दांव, हल्दी-शक्कर की सियासी पिच पर पक रहा चुनावी रण
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विस्तार
राहुल गांधी ने तेलंगाना में शुक्रवार को ताबड़तोड़ तीन रैलियां, नुक्कड़ सभाएं और जनसभाओं के माध्यम से न सिर्फ तेलंगाना राज्य में सियासी पिच मजबूत की। बल्कि दक्षिण भारत में भी अपने राजनैतिक इशारे और सियासी आगाज के अंदाज भी स्पष्ट कर दिए। तेलंगाना में डोसा बनाकर राहुल गांधी ने दक्षिण भारत में 'डोसा पॉलिटिक्स' के सहारे आने वाले लोकसभा चुनाव का भी एक तरीके से सियासी संदेश दे दिया है। जबकि तेलंगाना में 'हल्दी और शक्कर' के साथ जातिगत जनगणना से आने वाले विधानसभा चुनाव में राजनीतिक पकड़ को मजबूत करने का बड़ा सियासी दांव भी चला है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी ने जिस तरीके से शुक्रवार को तेलंगाना में जनता से मुखातिब होकर अपनी बात कही है, वह सिर्फ विधानसभा ही नहीं बल्कि लोकसभा के चुनावों में भी जारी रहने वाली है।
राहुल गांधी ने शुक्रवार को तेलंगाना में अपनी भारत जोड़ो यात्रा के बढ़े हुए स्वरूप के दौरान डोसा बनाने वाले से मुलाकात कर वहां की सियासी नब्ज को पकड़ा। इस मुलाकात के दौरान राहुल गांधी ने डोसा बनाकर न अपनी रैली में सिर्फ इस बात का जिक्र किया बल्कि लोगों से कहा कि यहां आकर आप लोगों ने मुझे डोसा बनाना भी सिखा दिया है। इस दौरान राहुल गांधी ने अपनी बहन प्रियंका गांधी का जिक्र कर और उनके तेलंगाना आने की बात के साथ स्थानीय लोगों से सीधे तौर पर भावनात्मक रूप से जुड़ने का प्रयास किया। सियासी जानकारों का कहना है कि राहुल गांधी ने अपने भाषण में जिस तरीके से स्थानीय खानपान का जिक्र किया। उसका संबंध सिर्फ तेलंगाना तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। राजनीतिक विश्लेषक हेमेंद्र शर्मा कहते हैं कि अगर शुक्रवार की रैली, नुक्कड़ सभाएं और जनसभाओं को आप बारीकी से अध्ययन करें, तो आपको राहुल गांधी की रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जनता से सीधे जुड़ने वाला पुट नजर आएगा।
शर्मा कहते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जनता से उनके स्थानीय रहन-सहन और खानपान से सीधे जुड़कर अपना एक भावनात्मक कनेक्ट बनाते हैं। वह कहते हैं कि बीते कुछ दिनों में राहुल गांधी की रैलियों, जनसभाओं और नुक्कड़ सभाओं के दौरान उनकी बॉडी लैंग्वेज के साथ-साथ जनता से मुखातिब होने की जो शैली है, वह न सिर्फ दो तरफा संवाद की तरह है बल्कि यह स्थानीयता और भावनात्मकता का पूरा निचोड़ रखती है। राजनीति विश्लेषक हेमेंद्र शर्मा कहते हैं कि राहुल गांधी ने डोसा बनाकर और डोसे का भरी जनसभा में जिक्र करके न सिर्फ तेलंगाना बल्कि दक्षिण भारत के अन्य सभी राज्यों को भी इससे सीधे तौर पर जोड़ने का प्रयास किया है।
राहुल गांधी ने शुक्रवार को सिर्फ डोसा ही नहीं, बल्कि राज्य के किसानों की बड़ी समस्या हल्दी और शुगर फैक्ट्री का भी जिक्र कर कांग्रेस से सीधे जुड़ने की अपील की। उन्होंने इस दौरान किसानों से कहा कि वह हल्दी के उत्पादक किसानों को 12 से 15 हजार रुपये प्रति कुंतल की लागत के साथ उनकी फसल की कीमत दिलवाएंगे। बल्कि अन्य फसलों पर तय एमएसपी से 500 रुपये प्रति कुंतल की ज्यादा रकम भी दिलवाएंगे। राहुल गांधी ने अपनी इस शुक्रवार को तेलंगाना रैली में किसानों को फोकस करते हुए तेलंगाना में बंद पड़ी शुगर फैक्ट्रीज को चालू करवाने की भी बात कही। सियासी जानकारों का कहना है कि तेलंगाना में हल्दी उत्पादक किसानों और शुगर मिल के बंद होने से यहां के लोगों को बड़ा नुकसान हो रहा है। राजनीतिक विश्लेषक ओम प्रकाश मिश्रा कहते हैं कि अगर कांग्रेस पार्टी यहां के किसानों को बंद पड़ी शुगर मिलों के चालू होने के साथ-साथ उनकी फसलों को अच्छी कीमत दिलवाने का भरोसा जीत लेते हैं, तो इस बार के चुनाव में कुछ बदली हुई तस्वीर दिख सकती है।
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार डी. किरण कुमार कहते हैं कि राहुल गांधी ने अपनी छह गारंटियों के साथ-साथ तेलंगाना में एक बार फिर से जातीय जनगणना का बड़ा सियासी दांव चला है। अपनी जनसभा और नुक्कड़ सभाओं के दौरान राहुल गांधी ने जिस तरीके से जातिगत जनगणना को लेकर तेलंगाना में सियासी हुंकार भरी वह सिर्फ विधानसभा ही नहीं बल्कि आने वाले लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस के एजेंडे को भी दिखलाती है। किरण कहते हैं कि तेलंगाना से लेकर दक्षिण भारत के सभी राज्यों में जातिगत जनगणना की बात से एक बड़ा करंट तो पैदा ही हो रहा है। वह कहते हैं कि अगर राहुल गांधी या कांग्रेस पार्टी जातिगत जनगणना के मामले में भी सियासी तौर पर तेलंगाना समेत दक्षिण भारत में मजबूती से अपने पक्ष में माहौल बना लेती है, तो यह सियासी नजरिए से कांग्रेस के लिए बड़ा मुनाफे का सौदा हो सकता है।