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'नौ सितंबर' से क्यों कांपता है तालिबान: जानिए क्या नाता है इस तारीख से, पंजशीर घाटी के 'बाप-बेटों' की बड़ी रोचक है कहानी

Thu, 02 Sep 2021 01:37 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Thu, 02 Sep 2021 01:37 PM IST
सार

दुनिया की सबसे खूबसूरत घाटियों में शुमार अफगानिस्तान की पंजशीर घाटी में नॉर्दन अलायंस के मुखिया रहे अहमद शाह मसूद ने 1996 में भी तालिबानियों को यहां कब्जा नहीं करने दिया था। अब यही काम उनका बेटा कर रहा है। पिता-पुत्र की कहानी से हार रहा तालिबान...

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Taliban is continuously attacking to capture Afghanistan most beautiful but most dangerous valley Panjshir
अहमद शाह मसूद और अहमद मसूद - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

नौ सितंबर आने वाली है और अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज हुए तालिबानियों के पसीने छूट रहे हैं। कहने को तो तालिबानियों का आतंकी समूह अफगानिस्तान की सबसे खूबसूरत लेकिन सबसे खतरनाक घाटी पंजशीर में कब्जा करने के लिए लगातार हमले कर रहा है लेकिन डर रहा है आने वाली नौ सितंबर को लेकर। क्योंकि उसे पता है कि यह तारीख उसके लिए हर साल काल बनकर ही आती है। दरअसल इस घाटी में नौ सितंबर को लेकर अफगानिस्तान की अस्मिता बचाने वाले 'बाप बेटों' की एक ऐसी कहानी है जो 2001 से लेकर 2020 तक हर साल नौ सितंबर को अफगानिस्तान में तालिबानियों पर कहर ही बरपाता आया है। तालिबानी लाख कोशिशों के  बाद भी इस घाटी में पच्चीस साल पहले भी कब्जा नहीं कर पाए थे न ही अब कब्जा कर पा रहे हैं।

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दरअसल यह कहानी है 'लॉयन ऑफ़ पंजशीर' के नाम से मशहूर अफगानिस्तान में सोवियत युद्ध के दौरान प्रमुख मुजाहिदीन कमांडर और अफगानिस्तान के रक्षा मंत्री रहे अहमद शाह मसूद और उनके बेटे अहमद मसूद की। मध्य एशिया के मामलों के जानकार प्रोफेसर डीएस नेगी कहते हैं कि दरअसल 1979 में जब सोवियत संघ में अपनी फौजी अफगानिस्तान में भेजनी शुरू की अहमद शाह मसूद ने पूरे अफगानिस्तान में इसके विरोध में अभियान शुरू कर दिया। सोवियत संघ की फौजी आमद के साथ ही तालिबान का जब जन्म होना शुरू हुआ तो अहमद शाह मसूद ने तालिबानियों का जबरदस्त विरोध किया।
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सोवियत सेनाओं के जाने के बाद 1992 में पेशावर समझौते के तहत उन्हें रक्षा मंत्री नियुक्त किया गया। तब तक अफगानिस्तान में तालिबानियों ने कहर बरपाना शुरू कर दिया था। 1996 में जब तालिबानियों ने अफगानिस्तान में सत्ता पर कब्जा किया तो पंजशीर घाटी में लाख चाहने के बाद भी तालिबानी कब्जा नहीं कर पाए। क्योंकि ताजिक समुदाय से ताल्लुक रखने वाले अहमद शाह मसूद ने अपने लड़ाकों के साथ तालिबानियों को खदेड़ कर पंजशीर घाटी से बाहर कर दिया था। लेकिन नौ सितंबर 2001 में अल-कायदा और तालिबानी आतंकियों ने अहमद शाह मसूद की हत्या कर दी। 9/11 के बाद अमेरिका ने अहमद शाह मसूद के नॉर्दन एलायंस के साथ मिलकर तालिबान को सत्ता से उखाड़ फेंका। यह लड़ाई तब से तालिबानियों की अहमद शाह मसूद से चली आ रही है।

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अब एक बार फिर अफगानिस्तान में तालिबानियों का राज है। लेकिन तालिबानियों के दिल में आज भी इस बात की कसक है कि वह पहले मिली सत्ता में भी पंजशीर घाटी पर कब्जा नहीं कर पाए और ना दोबारा मिली सत्ता में पंजशीर घाटी पर कब्जा नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल पहली सत्ता में लड़ाई नॉर्दन एलायंस के अहमद शाह मसूद ने ली तो इस बार उनके बेटे अहमद मसूद तालिबानियों को ललकार कर पंजशीर घाटी में घुसने नहीं दे रहे हैं। रक्षा मामलों के विशेषज्ञ और मध्य एशिया में अपनी सेवाएं दे चुके कर्नल वीके शुक्ला कहते हैं कि तालिबानियों के लिए हर साल नौ सितंबर कहर बनकर टूटता है। क्योंकि नौ सितंबर को ही उनके सबसे बड़े नेता अहमद शाह मसूद तालिबानी और अलकायदा ने मिलकर हत्या कर दी थी।

उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने अहमद शाह मसूद की पुण्यतिथि को 'मसूद दिवस' के नाम से मनाने की नेशनल हॉलिडे घोषित कर दिया था। बस तभी से इसी दिन पंजशीर घाटी में नॉर्दन एलायंस के लड़ाके तालिबानियों के लिए न सिर्फ काल बन जाते हैं बल्कि उनके आतंकी ठिकानों को पूरे अफगानिस्तान में सबसे ज्यादा सलाह भी करते हैं। कर्नल शुक्ला कहते हैं या सिलसिला बीते कई सालों से चलता चला रहा है कि नौ सितंबर को मसूद के लड़ाके तालिबानियों को चुन-चुन कर मारते हैं। इस बार तो हालात बहुत ज्यादा बदले हुए हैं और तालिबानी पंजशीर घाटी में दाखिल होने के लिए बेचैन है। लेकिन नॉर्दन एलायंस के सबसे बड़े नेता अहमद मसूद के नेतृत्व में तालिबानियों को खदेड़ रहे हैं।

कर्नल शुक्ला कहते हैं तालिबानियों को इस बार फिर इस बात का डर सता रहा है कि नौ सितंबर आने वाली है। नॉर्दन एलायंस के पास पहले से ही तालिबानियों से मुकाबला करने के लिए भारी मात्रा में न सिर्फ हथियारों का जखीरा है बल्कि गोला बारूद का भंडार भरा हुआ है। पंजशीर घाटी के नॉर्दन एलायंस में कभी अहमद मसूद के पिता अहमद शाह मसूद के लिए अपनी जान निछावर करने वाले लड़ाके अब उनके बेटे अहमद मसूद के लिए अपनी जान की बाजी लगाकर तालिबानियों से जंग लड़ रहे हैं। विदेश में पढ़ाई करके वापस आए अहमद मसूद भी अपने पिता की तर्ज पर अपनी घाटी को न सिर्फ बचा रहे हैं बल्कि अफगानिस्तान में तालिबानियों की सत्ता को ललकार रहे हैं।

पंजशीर घाटी में नेशनल रजिस्टेंस फ्रंट ऑफ अफगानिस्तान के प्रवक्ता फहीम दस्ती ने कहा तालिबान सिर्फ अफगानिस्तान ही नहीं बल्कि रूस के लिए भी बहुत बड़ा खतरा है। उन्होंने कहा कि रूस के लिए सबसे बड़ा खतरा होने के बावजूद भी रूस तालिबानियों का समर्थन कर रहा है जो सबसे खतरनाक है। अब तालिबानियों के पास अमेरिका के भेजे गए सभी हथियार हैं जो अमेरिका के जाने के बाद भी अफगानिस्तान में ही रह गए।

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