Tahawwur Rana: राणा पर चिदंबरम ने खोल दिया राज, तब कनाडा भी भारत को खुफिया मदद देने के लिए हुआ तैयार
Tahawwur Rana: यूपीए सरकार में 2011 के दौरान एनआईए की एक तीन सदस्यीय टीम ने अमेरिका जाकर मुंबई हमलों के मुख्य आरोपियों में से एक हेडली से पूछताछ की थी। इस मामले में पहली बड़ी कार्रवाई 11 नवंबर 2009 को हुई, जब एनआईए ने नई दिल्ली में डेविड कोलमैन हेडली (अमेरिकी नागरिक), तहव्वुर राणा (कनाडाई नागरिक) और अन्य के खिलाफ केस दर्ज किया था। यह दावा किया है देश के पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने। उन्होंने और क्या कहा है, आइए जानते हैं।
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पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने तहव्वुर राणा के प्रत्यर्पण को लेकर कई राज खोल दिए हैं। मोदी सरकार इस घटनाक्रम का श्रेय लेने के लिए होड़ में लगी है, जबकि सच्चाई उनके दावों से कोसों दूर है। यूपीए सरकार में 2011 के दौरान एनआईए की एक तीन सदस्यीय टीम ने अमेरिका जाकर मुंबई हमलों के मुख्य आरोपियों में से एक हेडली से पूछताछ की थी। इस मामले में पहली बड़ी कार्रवाई 11 नवंबर 2009 को हुई, जब एनआईए ने नई दिल्ली में डेविड कोलमैन हेडली (अमेरिकी नागरिक), तहव्वुर राणा (कनाडाई नागरिक) और अन्य के खिलाफ केस दर्ज किया था। उसी महीने कनाडा के विदेश मंत्री ने भारत को खुफिया मदद देने की पुष्टि की। पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री चिदंबरम ने कहा, वह यूपीए सरकार की कुशल विदेश नीति का सीधा परिणाम था।
तहव्वुर हुसैन राणा को दिल्ली लाया जा रहा
पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री ने कहा, मुझे खुशी है कि 26/11 मुंबई आतंकवादी हमलों के प्रमुख आरोपियों में से एक तहव्वुर हुसैन राणा को दिल्ली लाया जा रहा है। यह प्रत्यर्पण डेढ़ दशक की कठिन, परिश्रमी और रणनीतिक कूटनीति का परिणाम है, जिसकी शुरुआत, अगुवाई और निरंतरता यूपीए सरकार ने अमेरिका के साथ समन्वय करते हुए सुनिश्चित की थी। कांग्रेस नेता के मुताबिक, एफबीआई ने 2009 में राणा को शिकागो से गिरफ्तार किया, जब वह कोपेनहेगन में एक नाकाम आतंकी हमले की साजिश में लश्कर-ए-तैयबा की मदद कर रहा था। अमेरिकी अदालत ने जून 2011 में उन्हें 26/11 हमले में सीधे शामिल होने के आरोप से बरी कर दिया। हालांकि दूसरे आतंकी हमलों की साजिशों में राणा दोषी साबित हुआ।
नतीजा, उन्हें 14 साल की सजा सुनाई गई। यूपीए सरकार ने इस निर्णय पर सार्वजनिक रूप से निराशा जताई और कूट-नीतिक दबाव बनाए रखा। चिदंबरम ने कहा कि कानूनी अड़चनों के बावजूद, यूपीए सरकार ने संस्थागत कूटनीति और विधिक प्रक्रियाओं के माध्यम से लगातार प्रयास जारी रखा। 2011 में एनआईए की टीम ने अमेरिका में जाकर हेडली से पूछताछ की थी। परस्पर कानूनी सहायता संधि के तहत अमेरिका ने जांच के अहम सबूत भारत को सौंपे थे। बाद में वे सबूत, दिसंबर 2011 में दायर एनआईए की चार्जशीट का हिस्सा बने। एनआईए की विशेष अदालत ने गैर-जमानती वारंट जारी किए और फरार आरोपियों के खिलाफ इंटरपोल रेड नोटिस भी जारी कराया। यूपीए सरकार ने यह सब दिखावे के लिए नहीं, बल्कि गंभीर और अनुशासित कानूनी कूटनीति का हिस्सा था।
2012 में तत्कालीन सरकार ने राणा के प्रत्यर्पण की मांग उठायी थी
चिदंबरम ने कहा, 2012 में विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद और विदेश सचिव रंजन माथाई ने अमेरिकी राज्य सचिव हिलेरी क्लिंटन और अंडर सेक्रेटरी वेंडी शेरमन से राणा और हेडली के प्रत्यर्पण की मांग को मजबूती से रखा। जनवरी 2013 तक हेडली और राणा को सजा सुनाई जा चुकी थी। यूपीए सरकार ने हेडली की सज़ा पर नाराजगी जताई। पुरजोर तरीके से उनके प्रत्यर्पण की मांग दोहराई। अमेरिका में भारत की तत्कालीन राजदूत निरुपमा राव ने इस मुद्दे को लगातार अमेरिकी प्रशासन के समक्ष उठाया। यह अंतरराष्ट्रीय न्याय से जुड़े संवेदनशील मामलों को सधे हुए राजनयिक तरीकों से संभालने का आदर्श उदाहरण था।
चिदंबरम के अनुसार, 2014 में केंद्र की सरकार बदल गई। उसके बाद जो भी प्रक्रिया शुरु हुई, वह यूपीए सरकार के समय से ही संस्थागत पहल की वजह से जीवित रही। साल 2015 में हेडली ने सरकारी गवाह बनने की पेशकश की। 2016 में मुंबई की अदालत ने उन्हें क्षमादान दिया, जिससे ज़बीउद्दीन अंसारी उर्फ अबू जुदाल के खिलाफ केस मजबूत हुआ। दिसंबर 2018 में एनआईए की टीम प्रत्यर्पण से जुड़ी कानूनी बाधाएं सुलझाने अमेरिका गई थी। जनवरी 2019 में बताया गया कि राणा को अमेरिका में अपनी सजा पूरी करनी होगी। राणा की रिहाई की तारीख 2023 निर्धारित की गई। इसमें पहले से की गई कैद की अवधि भी जोड़ी गई थी। यह 'मजबूत नेता' की त्वरित कार्रवाई नहीं थी, बल्कि वर्षों की मेहनत से आगे बढ़ रही न्याय की प्रक्रिया थी।
बाइडन प्रशासन ने भारत के अनुरोध का किया समर्थन
जून 2020 में जब राणा को स्वास्थ्य के आधार पर रिहा किया गया तो भारत सरकार ने तुरंत उनका प्रत्यर्पण मांगा। बाइडन प्रशासन ने भारत के अनुरोध का समर्थन किया। मई 2023 में अमेरिकी अदालत ने भारत के अनुरोध को वैध करार दिया। राणा ने इसके खिलाफ कई याचिकाएं दायर कीं, जिनमें हैबियस कॉर्पस और डबल जियोपार्डी के आधार पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी शामिल थी। ये सभी याचिकाएं खारिज कर दी गईं। अंतिम अस्वीकृति 21 जनवरी 2025 को हुई। वह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण का अगला ही दिन था। पी चिदंबरम ने मोदी सरकार पर राणा के प्रत्यर्पण का श्रेय लेने का आरोप लगाया। फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति ट्रंप के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस पूरे मामले का श्रेय लेने की कोशिश करते नजर आए।
सच्चाई यह है कि राणा के प्रत्यर्पण की उपलब्धि वर्षों पुरानी यूपीए सरकार की नींव और लगातार की गई मेहनत का प्रतिफल है। पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा, मोदी सरकार ने इस प्रक्रिया की न तो शुरुआत की, न ही कोई नई सफलता हासिल की। वह केवल उस संस्थागत ढांचे का लाभ उठा रही है, जिसे यूपीए सरकार ने वर्षों की मेहनत, समझदारी और राजनयिक दूरदर्शिता से खड़ा किया था। यह प्रत्यर्पण कोई प्रचार की जीत नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि जब भारतीय राज्य ईमानदारी, गंभीरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ काम करता है, तब वह दुनिया के सबसे जटिल अपराधियों को भी कानून के कठघरे में खड़ा कर सकता है।