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जॉर्ज फर्नांडीस की मां की उंगली पकड़कर राजनीति की राह पर उतरी थीं सुषमा स्वराज

Thu, 08 Aug 2019 01:24 AM IST
आसिम खान विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली
विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली Published by: आसिम खान Updated Thu, 08 Aug 2019 01:24 AM IST
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Sushma Swaraj started political career by holding finger of George Fernandes mother
सुषमा स्वराज - फोटो : PTI

हरियाणा के अंबाला शहर से निकलकर देश की राजनीति और लोगों के दिलों में छा जाने वाली सुषमा स्वराज की पैतृक पारिवारिक पृष्ठभूमि राष्टीय स्वंयसेवक संघ से जुड़ी होने के बावजूद उनको राजनीति में लाने वाले समाजवादी नेता मधु लिमए और जॉर्ज फर्नांडीस थे और राजनीति की डगर पर सुषमा ने पहला कदम जॉर्ज फर्नांडीस की मां की उंगली पकड़कर रखा था। 

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यही वजह थी कि जिस भाजपा में सुषमा शिखर तक पहुंची, अपने प्रारंभिक राजनीतिक जीवन में वह जनता पार्टी में उन नेताओं के साथ खड़ी थीं जो दोहरी सदस्यता के सवाल को लेकर भाजपा के पूर्ववर्ती घटक जनसंघ के खिलाफ खड़े थे। दिलचस्प यह है कि 1977 में जब सुषमा को 26 साल की उम्र में सबसे कम आयु के मंत्री पद की शपथ राज्य सरकार में दिलाई गई तब तक हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री देवीलाल उन्हें जानते तक नहीं थे।
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यह जानकारी देते हुए जॉर्ज फर्नांडीस के बेहद करीबी सहयोगी रहे समाजवादी आंदोलन के वरिष्ठ नेता विजय नारायण सिंह बताते हैं कि अक्टूबर 1976 में जार्ज फर्नांडीस के खिलाफ चल रहे डाइनामाइट कांड के मुकदमे में उनके वकील के रूप में पैरवी करने के लिए समाजवादी नेता सुरेंद्र मोहन अंबाला से सुषमा के पति स्वराज कौशल को दिल्ली लेकर आए थे। कौशल तब चंडीगढ़ हाईकोर्ट में वकालत करते थे।
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जार्ज के बचाव के लिए वकीलों की जो टीम बनाई गई थी, स्वराज कौशल को उसमें शामिल किया गया। स्वराज कौशल और सुषमा की तब नई-नई शादी हुई थी और सरकारी सेवाओं की परीक्षा देने की तैयारी के लिए सुषमा अपने पति के साथ दिल्ली आ गईं। इसके बाद 1977 के लोकसभा चुनावों में जब जार्ज फर्नांडीस बिहार के मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़ रहे थे, तब जार्ज की मां के साथ सुषमा उनके प्रचार के लिए वहां गईं और उन्होंने धुआंधार प्रचार किया।

छात्र जीवन में बेहद शानदार डिबेटर रही सुषमा का चुनावी राजनीति से यह पहला साबका था। अपनी भाषण शैली से न सिर्फ जॉर्ज के लिए वोट जुटाए बल्कि जॉर्ज और मधु लिमए जैसे वरिष्ठ नेताओं को बेहद प्रभावित भी किया। विजय नारायण बताते हैं कि जब हरियाणा विधानसभा चुनाव हुए तो जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड ने जिसमें जॉर्ज और लिमए दोनों ही थे, उन्हें विधानसभा चुनाव में पार्टी का उम्मीदवार बना दिया। 

सुषमा चुनाव जीत गईं और जॉर्ज व लिमए के सरकार कहने पर उन्हें देवीलाल सरकार में मंत्री बनाया गया। सिंह के मुताबिक जब सुषमा ने मंत्री पद की शपथ लेने जा रही थीं तब विधिवत उनका परिचय मुख्यमंत्री देवीलाल से हुआ। उसके कुछ महीनों बाद ही देवीलाल किसी बात को लेकर सुषमा से नाराज हो गए और उन्होंने उनसे मंत्रीपद से इस्तीफा ले लिया। लेकिन जल्दी ही फिर जार्ज और लिमए के कहने पर जनता पार्टी नेतृत्व ने सुषमा को फिर मंत्री बनवा दिया। 

सुषमा पर समाजावादी संस्कारों का असर था

1979 में जब जनता पार्टी टूटी तो जॉर्ज और लिमए तो चौधरी चरण सिंह के साथ लोकदल में चले गए, लेकिन सुषमा चंद्रशेखर की अध्यक्षता वाली जनता पार्टी में ही बनीं रहीं, क्योंकि उनके पति स्वराज कौशल को दिल्ली लाने वाले सुरेंद्र मोहन जनता पार्टी में ही थे और इस वजह से स्वराज दंपत्ति वहीं रहे। लेकिन 1980 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बाद जनता पार्टी अपना जनाधार खो चुकी थी और पूर्ववर्ती जनसंघ घटक ने भी अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का गठन कर लिया था।

हरियाणा में तब न भाजपा का कोई विशेष जनाधार था और न ही जनता पार्टी का। भजनलाल पूरी सरकार के साथ कांग्रेस में शामिल हो चुके थे और देवीलाल लोकदल में थे। विजय नारायण सिंह कहते हैं कि सुषमा छात्र जीवन में विद्यार्थी परिषद में सक्रिय रहीं थीं, लेकिन पति के साथ बाद में समाजवादियों के संपर्क में आ गईं थीं। उनके पैतृक परिवार का नाता राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से था।

अपने राजनीतिक भविष्य की तलाश कर रहीं सुषमा स्वराज की जान पहचान भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी से अच्छी हो गई थी और उनकी प्रेरणा से ही उन्होंने भाजपा को अपना सियासी ठिकाना बनाया और फिर वह भाजपा में शिखर तक पहुंची। सिंह कहते हैं कि यह शुरुआती समाजावादी संस्कारों का ही असर था कि भाजपा में रहने के बावजूद उनके भीतर खांटी संघी नेताओं वाली कट्टरता नहीं थी। 

भाजपा और संघ के मूल मुद्दों के प्रति निष्ठा में कोई संदेह नहीं था, लेकिन कभी भी उन्होंने सामाजिक और सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने वाला कोई बयान कभी नहीं दिया। यहां तक कि लाल कृष्ण आडवाणी से बेहद निकटता के बावजूद तब भी जब आडवाणी सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा निकाल रहे थे और पूरी भाजपा और संघ परिवार के अन्य संगठन उग्र हिंदुत्व की आग को लगातार गरम कर रहे थे, तब भी सुषमा स्वराज राम मंदिर निर्माण का समर्थन करते हुए भी अपने भाषणों में संयम से काम लेती रहीं। 

सुषमा की सर्व स्वीकार्यता और लोकप्रियता की वजह एक बार भाजपा अध्यक्ष के लिए उनका नाम भी चला लेकिन उनकी गैर संघी पृष्ठभूमि उनके रास्ते का रोड़ा बन गई। पार्टी में वह भले ही आडवाणी की बेहद विश्वस्त मानी जाती थीं और जब 2013में आडवाणी भाजपा में अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहे थे, तब जहां उनके पुराने सारे भरोसेमंदों ने साथ छोड़ दिया था, लेकिन सुषमा स्वराज आखिर तक उनके साथ खड़ी रहीं और गोवा में पार्टी कार्यकारिणी में दिल्ली में नाराज बैठे आडवाणी को मनाने के लिए पूरा जोर लगाती रहीं। जब उनकी नहीं चलीं तो वह कार्यकारिणी के संवाददाता सम्मेलन से पहले ही अकेले दिल्ली लौट आईं थी। 

आडवाणी से निकटता के बावजूद उनकी राजनीति की शैली अटल बिहारी वाजपेयी वाली थी। भाजपा कार्यकर्ता ही नहीं आम लोग भी उन्हें अटल का उत्तराधिकारी मानते थे। उनमें प्रधानमंत्री बनने की पूरी योग्यता थी, लेकिन भाजपा की अंदरूनी राजनीति के चक्रव्यूह को भेदने में वह नाकाम रहीं। भले ही सुषमा स्वराज अटल की तरह प्रधानमंत्री निवास तक नहीं पहुंच सकी, लेकिन वह अटल की ही तरह आम जन के दिलों पर राज जरूर करती रहीं।
 
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